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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.62 (43 verses)
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Chapter 3.62

सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा अगच्छत्तेन वै सार्धं भर्तृदर्शनलालसा
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सा | तद् + श्रु + अनवद्याङ्ग | सार्थवाह + वचस् + तदा
दमयन्ती + इति | विख्यातां | भर्तृ + दर्शन + लालस
अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत्
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अथ | काले | बहुतिथे | वने | महति | दारुणे
तडागं | सर्वतोभद्रं | पद्म + सौगन्धिक | महत्
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् बहुमूलफलोपेतं नानापक्षिगणैर्वृतम्
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ददृशुर् | वणिजो | रम्यं | प्रभू + यवस + इन्धन
नाना + पुष्प + फल + उपे | नाना + पक्षिन् + निषेव्
तं दृष्ट्वा मृष्टसलिलं मनोहरसुखावहम् सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः
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तं | दृष्ट्वा | मृष्ट + सलिल | मनोहर + सुख + आवह
सु + परिश्रम् + वाह | ते | निवेशाय | मनो | दधुः
संमते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् उवास सार्थः सुमहान्वेलामासाद्य पश्चिमाम्
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संमते | सार्थवाहस्य | विविशुर् | वनम् | उत्तमम्
उवास | सार्थः | सु + महत् | वेलाम् | आसाद्य | पश्चिमाम्
अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम्
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अथ + अर्धरात्र + समय | निःशब्द + स्तिमित | तदा
सुप्ते | सार्थे | परिश्रान्ते | हस्तिन् + यूथ | उपागमत्
पानीय + अर्थ | गिरि + नदी | मद + प्रस्रवण + आविल
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् सुप्तं ममर्द सहसा चेष्टमानं महीतले
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मार्गं | संरुध्य | संसुप्तं | पद्मिन्याः | सार्थम् | उत्तमम्
सुप्तं | ममर्द | सहसा | चेष्टमानं | मही + तल
हाहारवं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा महतो भयात् केचिद्दन्तैः करैः केचित्केचित्पद्भ्यां हता नराः
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हाहा + रव | प्रमुञ्चन्तः | सार्थिकाः | शरण + अर्थिन्
वन + गुल्म | च | धावन्तो | निद्रा + अन्ध | महतो | भयात्
केचिद् | दन्तैः | करैः | केचित् | केचित् | पद्भ्यां | हता | नराः
गोखरोष्ट्राश्वबहुलं पदातिजनसंकुलम् भयार्तं धावमानं तत्परस्परहतं तदा
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रथ + नाग + अश्व + कलिल | पदाति + ध्वज + संकुल
भय + आर्त | धावमानं | तत् | परस्पर + हन् | तदा
घोरान्नादान्विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले वृक्षेष्वासज्य संभग्नाः पतिता विषमेषु तथा तन्निहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम्
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घोरान् | नादान् | विमुञ्चन्तो | निपेतुर् | धरणी + तल
वृक्ष + आसञ्ज् | संभग्नाः | पतिता | विषमेषु | च
तथा | तद् + निहन् | सर्वं | समृद्धं | सार्थ + मण्डल
अथापरेद्युः संप्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा वनगुल्माद्विनिष्क्रम्य शोचन्तो वैशसं कृतम् भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं जनाधिप
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अथ + अपरेद्युस् | सम्प्राप्ते | हन् + शिष् | जन + तदा
वन + गुल्म + विनिष्क्रम् | शोचन्तो | वैशसं | कृतम्
भ्रातरं | पितरं | पुत्रं | सखि + इदम् | च | जनाधिप
अशोचत्तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये संप्राप्तोऽयं जनार्णवः हतोऽयं हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तु
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अशोचत् | तत्र | वैदर्भी | किं | नु | मे | दुष्कृतं | कृतम्
यो | ऽपि | मे | निर्जने | ऽरण्ये | सम्प्राप्तो | ऽयं | जनार्णवः
हतो | ऽयं | हस्तिन् + यूथ | मन्दभाग्यान् | मद् + एव | तु
प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं मया नूनमसंशयम् नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम्
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प्राप्तव्यं | सुचिरं | दुःखं | मया | नूनम् | असंशयम्
न + अप्राप्तकाल | म्रियते | श्रुतं | वृद्ध + अनुशासन
यन्नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते
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यन् | न + मद् | अद्य | मृदिता | हस्तिन् + यूथ | दुःखिता
न | हि | तीव्रतरं | किंचिद् | अनृताद् | इह | विद्यते
मे बालभावेऽपि किंचिद्व्यपकृतं कृतम् कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम्
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न | च | मे | बाल + भाव | ऽपि | किंचिद् | व्यपकृतं | कृतम्
कर्मणा | मनसा | वाचा | स्थिरा | यदि | जनेश्वर
मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः नूनं तेषां प्रभावेन वियोगं प्राप्तवत्यहम्
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बाल + वृद्ध | ऋते | सर्वे | महीपालाः | समागताः
प्रत्याख्याता | मया | तत्र | नल + अर्थ | देवताः
नूनं | तेषां | प्रभावेन | वियोगं | प्राप् + मद्
एवमादीनि दुःखानि सा विलप्य वराङ्गना हतशिष्टैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः अगच्छद्राजशार्दूल दुःखशोकपरायणा
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एवमादीनि | दुःखानि | सा | विलप्य | वर + अङ्गना
स | विनिश्चित्य | धर्म + ज्ञ | ब्राह्मणैर् | वेदपारगैः
अगच्छद् | राजन् + शार्दूल | दुःख + शोक + परायण
गच्छन्ती सा चिरात्कालात्पुरमासादयन्महत् सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यवादिनः वस्त्रार्धकर्तसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम्
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गच्छन्ती | सा | चिरात् | कालात् | पुरम् | आसादयन् | महत्
सार्थो | ऽयं | चेदि + राज | सुबाहोः | सत्य + वादिन्
त्वरितं | घूर्णिका | गत्वा | प्रविवेश | पुर + उत्तम
तां विवर्णां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जनाम् उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशुः पुरवासिनः
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तां | विवर्णां | कृशां | दीनां | मुक्तकेशीम् | अमार्जनाम्
उन्मत्ताम् | इव | गच्छन्तीं | ददृशुः | पुर + वासिन्
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा अनुजग्मुस्ततो बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात्
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प्रविशन्तीं | तु | तां | दृष्ट्वा | चेदि + राजन् + पुरी | तदा
अनुजग्मुस् | ततो | बाला | ग्रामिन् + पुत्र | कुतूहलात्
सा तैः परिवृतागच्छत्समीपं राजवेश्मनः तां प्रासादगतापश्यद्राजमाता जनैर्वृताम्
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सा | तैः | परिवृ + गम् | समीपं | राजन् + वेश्मन्
तां | प्रासाद + गम् + पश् | राजन् + मातृ | जनैर् | वृताम्
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् आरोप्य विस्मिता राजन्दमयन्तीमपृच्छत
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सा | जनं | वारयित्वा | तं | प्रासाद + तल | उत्तमम्
आरोप्य | विस्मिता | राजन् | दमयन्तीम् | अपृच्छत
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा
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एवम् | अपि + असुख + आविश् | बिभर्षि | परमं | वपुः
भासि | विद्युद् | इव + अभ्र | शंस | मे | क + अस् | कस्य | वा
हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे
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न | हि | ते | मानुषं | रूपं | भूषणैर् | अपि | वर्जितम्
असहाया | नरेभ्यश् | च | न + उद्विज् + अमर + प्रभा
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम्
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तद् + श्रु | वचनं | तेषां | पाण्डुर् | वचनम् | अब्रवीत्
मानुषीं | मां | विजानीत | यूयं | सर्वे | तपोधनाः
सैरन्ध्रीं जातिसंपन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम्
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सैरन्ध्रीं | जाति + सम्पद् | भुजिष्यां | काम + वासिन्
फल + मूल + अशन | एकां | यत्रसायम्प्रतिश्रयाम्
असंख्येयगुणो भर्ता मां नित्यमनुव्रतः भर्तारमपि तं वीरं छायेवानपगा सदा
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असंख्येय + गुण | भर्ता | मां | च | नित्यम् | अनुव्रतः
भर्तारम् | अपि | तं | वीरं | छाया + इव + अनपग | सदा
तस्य दैवात्प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं स्म देवने द्यूते निर्जितश्चैव वनमेकोऽभ्युपेयिवान्
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तस्य | दैवात् | प्रसङ्गो | ऽभूद् | अतिमात्रं | स्म | देवने
द्यूते | स | निर्जितश् | च + एव | वनम् | एको | ऽभ्युपेयिवान्
तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् आश्वासयन्ती भर्तारमहमन्वगमं वनम्
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तम् | एक + वसन | वीरम् | उन्मत्तम् | इव | विह्वलम्
आश्वासयन्ती | भर्तारम् | अहम् | अन्वगमं | वनम्
कदाचिद्वने वीरः कस्मिंश्चित्कारणान्तरे क्षुत्परीतः सुविमनास्तदप्येकं व्यसर्जयत्
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स | कदाचिद् | वने | वीरः | कस्मिंश्चित् | कारण + अन्तर
क्षुध् + परी | सुविमनास् | तद् | अपि + एक | व्यसर्जयत्
तमेकवसनं नग्नमुन्मत्तं गतचेतसम् अनुव्रजन्ती बहुला स्वपामि निशाः सदा
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तम् | एक + वसन | नग्नम् | उन्मत्तं | गम् + चेतस्
अनुव्रजन्ती | बहुला | न | स्वपामि | निशाः | सदा
ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान्मामनागसम्
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ततो | बहुतिथे | काले | सुप्ताम् | उत्सृज्य | मां | क्वचित्
वाससो | ऽर्धं | परिच्छिद्य | त्यक्तवान् | माम् | अनागसम्
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिनक्षपाः विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणधनेश्वरम्
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तं | मार्गमाणा | भर्तारं | दह्यमाना | दिन + क्षपा
न | विद् + अमर + प्रख्या | प्रियं | प्राण + धन + ईश्वर
तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु राजमाताब्रवीदार्तां भैमीमार्ततरा स्वयम्
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अदृश्यन्ती + अश्रु + पूर्ण + अक्ष | शृण्वन्ती | तम् | उवाच | ह
राजन् + मातृ + ब्रू | आर्तां | भैमीम् | आर्ततरा | स्वयम्
वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे त्वयि वर्तते मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम
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वसस्व | मयि | कल्याणि | प्रीतिर् | मे | त्वयि | वर्तते
मृगयिष्यन्ति | ते | भद्रे | भर्तारं | पुरुषा | मम
अथ वा स्वयमागच्छेत्परिधावन्नितस्ततः इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे
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अथ | वा | स्वयम् | आगच्छेत् | परिधावन्न् | इतस् | ततः
इह + एव | वसती | भद्रे | भर्तारम् | उपलप्स्यसे
राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि
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तद् | वचनं | श्रुत्वा | कुन्ती | वचनम् | अब्रवीत्
समय + उत्सह् | वस्तुं | त्वयि | वीर + प्रजायिनी
उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां कुर्यां पादधावनम् चाहं पुरुषानन्यान्संभाषेयं कथंचन
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उच्छिष्टं | न + एव | भुञ्जीयां | न | कुर्यां | पाद + धावन
न | च + मद् | पुरुषान् | अन्यान् | संभाषेयं | कथंचन
प्रार्थयेद्यदि मां कश्चिद्दण्ड्यस्ते पुमान्भवेत् भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम्
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प्रार्थयेद् | यदि | मां | कश्चिद् | दण्ड्यस् | ते | स | पुमान् | भवेत्
भर्तुर् | अन्वेषण + अर्थ | तु | पश्येयं | ब्राह्मणान् | अहम्
यद्येवमिह कर्तव्यं वसाम्यहमसंशयम् अतोऽन्यथा मे वासो वर्तते हृदये क्वचित्
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यदि + एवम् | इह | कर्तव्यं | वस् + मद् | असंशयम्
अतो | ऽन्यथा | न | मे | वासो | वर्तते | हृदये | क्वचित्
तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् सर्वमेतत्करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम्
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अ + प्रहृष् | मनसा | राजसूये | महत् + क्रतु
सर्वम् | एतत् | करिष्यामि | दिष्ट्या | ते | व्रतम् | ईदृशम्
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशां पते उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत
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एवम् | उक्त्वा | ततो | भीष्मं | तं | माता | प्रत्यभाषत
वच् + इदम् | दुहितरं | सुनन्दां | नाम | भारत
सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः स्वयम्
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सैरन्ध्रीम् | अभिजानीष्व | सुनन्दे | देव + रूपिन्
एतया | सह | मोदस्व | निरुद्विग्न + मनस् | स्वयम्