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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.6 (22 verses)
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Chapter 3.6

पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः प्रययुर्जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः
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राजन् + पुत्र + तथा + एव + अन्य | समेत्य | भरत + ऋषभ
प्रययुर् | जाह्नवी + कूल | कुरुक्षेत्रं | सह + अनुग
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां निषेव्य ते ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्
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सरस्वती + दृषद्वती | यमुनां | च | निषेव्य | ते
ययुर् | वन + एव | वनं | सततं | पश्चिमां | दिशम्
ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम्
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ततः | सरस्वती + कूल | समेषु | मरु + धन्वन्
काम्यकं | नाम | ददृशुर् | वनं | मुनि + जन + प्रिय
तत्र ते न्यवसन्वीरा वने बहुमृगद्विजे अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत
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तत्र | ते | न्यवसन् | राजन् | संवत्सर + गण | बहून्
अन्वास्यमाना | मुनिभिः | सान्त्व्यमानाश् | च | भारत
विदुरस्त्वपि पाण्डूनां तदा दर्शनलालसः जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत्
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विदुरस् | तु + अपि | पाण्डूनां | तदा | दर्शन + लालस
गम् + एक + रथ + एव | काम्यकं | वनम् | ऋद्धिमत्
ततो यात्वा विदुरः काननं त;च्छीघ्रैरश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन ददर्शासीनं धर्मराजं विविक्ते; सार्धं द्रौपद्या भ्रातृभिर्ब्राह्मणैश्च
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ततो | यात्वा | विदुरः | काननं | तच् | छीघ्रैर् | अश्वैर् | वाहिना | स्यन्दनेन
दृश् + आस् | धर्मराजं | विविक्ते | सार्धं | द्रौपद्या | भ्रातृभिर् | ब्राह्मणैश् | च
ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारा;दभ्यायान्तं सत्यसंधः राजा अथाब्रवीद्भ्रातरं भीमसेनं; किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य
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ततो | ऽपश्यद् | विदुरं | तूर्णम् | आराद् | अभ्यायान्तं | सत्य + संधा | स | राजा
अथ + ब्रू | भ्रातरं | भीमसेनं | किं | नु | क्षत्ता | वक्ष्यति | नः | समेत्य
कच्चिन्नायं वचनात्सौबलस्य; समाह्वाता देवनायोपयाति कच्चित्क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि; जेष्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम्
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कच्चिन् | न + इदम् | वचनात् | सौबलस्य | समाह्वाता | देवन + उपया
कच्चित् | क्षुद्रः | शकुनिर् | न + आयुध | जेष्यत्य् | अस्मान् | पुनर् | एव + अक्षवती
समाहूतः केनचिदाद्रवेति; नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम् गाण्डीवे वा संशयिते कथंचि;द्राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः
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समाहूतः | केनचिद् | आद्रु + इति | न + मद् | शक्तो | भीमसेन + अपया
गाण्डीवे | वा | संशयिते | कथंचिद् | राज्य + प्राप्ति | संशयिता | भवेन् | नः
तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः; प्रत्यगृह्णन्नृपते सर्व एव तैः सत्कृतः तानाजमीढो; यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेयात्
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तत | उत्थाय | विदुरं | पाण्डवेयाः | प्रत्यगृह्णन् | नृपते | सर्व | एव
तैः | सत्कृतः | स | च | तान् | आजमीढो | यथोचितं | पाण्डु + पुत्र | समेयात्
समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभा;स्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम् चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस; यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽऽम्बिकेयः
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समाश्वस्तं | विदुरं | ते | नर + ऋषभ | ततो | ऽपृच्छन्न् | आगमनाय | हेतुम्
स | च + अपि | तेभ्यो | विस्तरतः | शशंस | यथावृत्तो | धृतराष्ट्रो | ऽम्बिकेयः
अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्त;मजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य एवं गते समतामभ्युपेत्य; पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि
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वच् + मद् | धृतराष्ट्रो | ऽनुगुप्तम् | अजात + शत्रु | परिग्रह् + अभिपूजय्
समश् | च | त्वं | संमतः | कौरवाणां | पथ्यं | च + इदम् | मम | च + एव | ब्रवीहि
मयाप्युक्तं यत्क्षमं कौरवाणां; हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव तद्वै पथ्यं तन्मनो नाभ्युपैति; ततश्चाहं क्षममन्यन्न मन्ये
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मद् + अपि + वच् | यत् | क्षमं | कौरवाणां | हितं | पथ्यं | धृतराष्ट्रस्य | च + एव
तद् | वै | पथ्यं | तद् + मनस् | न + अभ्युपे | ततश् | च + मद् | क्षमम् | अन्य + न | मन्ये
परं श्रेयः पाण्डवेया मयोक्तं; मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः यथातुरस्येव हि पथ्यमन्नं; रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्
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परं | श्रेयः | पाण्डवेया | मद् + वच् | न | मे | तच् | च | श्रुतवान् | आम्बिकेयः
यथा + आतुर + इव | हि | पथ्यम् | अन्नं | न | रोचते | स्म + इदम् | तद् | उच्यमानम्
श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो; स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा ब्रुवन्न रुच्यै भरतर्षभस्य; पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः
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न | श्रेयसे | नीयते | मन्द + बुद्धि | स्त्री | श्रोत्रिय + इव | गृहे | प्रदुष्टा
ध्रुवं | न | रोचेद् | भरत + ऋषभ | पतिः | कुमार्या | इव | षष्टि + वर्ष
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां; वै श्रेयो धृतराष्ट्रः परैति यथा पर्णे पुष्करस्येव सिक्तं; जलं तिष्ठेत्पथ्यमुक्तं तथास्मिन्
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ध्रुवं | विनाशो | नृप | कौरवाणां | न | वै | श्रेयो | धृतराष्ट्रः | परैति
यथा | पर्णे | पुष्कर + इव | सिक्तं | जलं | न | तिष्ठेत् | पथ्यम् | उक्तं | तथा + इदम्
ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां; यत्र श्रद्धा भारत तत्र याहि नाहं भूयः कामये त्वां सहायं; महीमिमां पालयितुं पुरं वा
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ततः | क्रुद्धो | धृतराष्ट्रो | ऽब्रवीन् | मां | यत्र | श्रद्धा | भारत | तत्र | याहि
न + मद् | भूयः | कामये | त्वां | सहायं | महीम् | इमां | पालयितुं | पुरं | वा
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राजं;स्त्वां शासितुमुपयातस्त्वरावान् तद्वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां; तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूयः
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सो | ऽहं | त्यक्तो | धृतराष्ट्रेण | राजंस् | त्वां | शासितुम् | उपयातस् | त्वरावान्
तद् | वै | सर्वं | यन् | मद् + वच् | सभायां | तद् | धार्यतां | यत् | प्रवक्ष्यामि | भूयः
क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः; क्षमां कुर्वन्कालमुपासते यः सं वर्धयन्स्तोकमिवाग्निमात्मवा;न्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव
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क्लेशैस् | तीव्रैर् | युज्यमानः | सपत्नैः | क्षमां | कुर्वन् | कालम् | उपासते | यः
संवर्धयन् | स्तोकम् | इव + अग्नि | आत्मवान् | स | वै | भुङ्क्ते | पृथिवीम् | एक | एव
यस्याविभक्तं वसु राजन्सहायै;स्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहायाः सहायानामेष संग्रहणेऽभ्युपायः; सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः
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यद् + अविभक्त | वसु | राजन् | सहायैस् | तस्य | दुःखे | ऽप्य् | अंश + भाज् | सहायाः
सहायानाम् | एष | संग्रहणे | ऽभ्युपायः | सहाय + आप्ति | पृथिवी + प्राप्ति | आहुः
सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव निष्प्रलापं; तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः आत्मा चैषामग्रतो नातिवर्ते;देवंवृत्तिर्वर्धते भूमिपालः
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सत्यं | श्रेष्ठं | पाण्डव | निष्प्रलापं | तुल्यं | च + अन्न | सह | भोज्यं | सहायैः
आत्मा | च + इदम् | अग्रतो | न + अतिवृत् | एवंवृत्तिर् | वर्धते | भूमिपालः
एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि; परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं; तद्वै वाच्यं तत्करिष्यामि कृत्स्नम्
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एवं | करिष्यामि | यथा | ब्रवीषि | परां | बुद्धिम् | उपगम् + अप्रमत्त
यद् + च + अपि | अन्यद् | देश + काल + उपपद् | तद् | वै | वाच्यं | तत् | करिष्यामि | कृत्स्नम्