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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.58 (34 verses)
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Chapter 3.58

ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः पुष्करेण हृतं राज्यं यच्चान्यद्वसु किंचन
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ततस् | तु | याते | वार्ष्णेये | पुण्यश्लोकस्य | दीव्यतः
हिरण्यं | मम | यद् + च + अन्य | वसु | किंचन | विद्यते
हृतराज्यं नलं राजन्प्रहसन्पुष्करोऽब्रवीत् द्यूतं प्रवर्ततां भूयः प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव
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हृ + राज्य | नलं | राजन् | प्रहसन् | पुष्करो | ऽब्रवीत्
द्यूतं | प्रवर्ततां | भूयः | प्रतिपाणो | ऽस्ति | क + त्वद्
शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यद्धृतं मया दमयन्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे
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शिष्टा | ते | दमयन्ती + एक | सर्वम् | अन्य + हृ | मया
दमयन्त्याः | पणः | साधु | वर्ततां | यदि | मन्यसे
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना व्यदीर्यतेव हृदयं चैनं किंचिदब्रवीत्
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पुष्कर + एवम् | उक्तस्य | पुण्यश्लोकस्य | मन्युना
विदृ + इव | हृदयं | न | च + एनद् | किंचिद् | अब्रवीत्
ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूषणानि महायशाः
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ततः | पुष्करम् | आलोक्य | नलः | परम + मन्युमत्
उत्सृज्य | सर्व + गात्र | भूषणानि | महत् + यशस्
एकवासा असंवीतः सुहृच्छोकविवर्धनः निश्चक्राम तदा राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम्
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एक + वासस् | असंवीतः | सुहृद् + शोक + विवर्धन
निश्चक्राम | तदा | राजा | त्यक्त्वा | सु + विपुल | श्रियम्
दमयन्त्येकवस्त्रा तं गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वियात् तया बाह्यतः सार्धं त्रिरात्रं नैषधोऽवसत्
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दमयन्ती + एक + वस्त्र | तं | गच्छन्तं | पृष्ठतो | ऽन्वियात्
स | तया | बाह्यतः | सार्धं | त्रि + रात्र | नैषधो | ऽवसत्
पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे नले यः सम्यगातिष्ठेत्स गच्छेद्वध्यतां मम
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पुष्करस् | तु | महत् + राज | घोषयामास | वै | पुरे
नले | यः | सम्यग् | आतिष्ठेत् | स | गच्छेद् | वध्यतां | मम
पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन पौरा तस्मिन्सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर
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पुष्करस्य | तु | वाक्येन | तस्य | विद्वेषणेन | च
पौरा | न | तस्मिन् | सत्कारं | कृतवन्तो | युधिष्ठिर
तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो सत्कृतः त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन्
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स | तथा | नगर + अभ्याश | सत्कार + अर्ह | न | सत्कृतः
तृषिताः | क्षुध् + पिपासा + आर्त | जल + मात्र | वर्तयन्
क्षुधा संपीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि अपश्यच्छकुनान्कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान्
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क्षुधा | सम्पीड्यमानस् | तु | नलो | बहुतिथे | ऽहनि
पश् + शकुन | कश्चित् + हिरण्य + सदृश + छद
चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली अस्ति भक्षो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति
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स | चिन्तयामास | तदा | निषध + अधिपति | बली
अस्ति | भक्षो | मद् + अद्य + इदम् | वसु | च + इदम् | भविष्यति
ततस्तानन्तरीयेण वाससा समवास्तृणोत् तस्यान्तरीयमादाय जग्मुः सर्वे विहायसा
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ततस् | तान् | अन्तरीयेण | वाससा | समवास्तृणोत्
तद् + अन्तरीय | आदाय | जग्मुः | सर्वे | विहायसा
उत्पतन्तः खगास्ते तु वाक्यमाहुस्तदा नलम् दृष्ट्वा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम्
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उत्पतन्तः | खगास् | ते | तु | वाक्यम् | आहुस् | तदा | नलम्
दृष्ट्वा | दिग्वाससं | भूमौ | स्थितं | दीनम् | अधोमुखम्
वयमक्षाः सुदुर्बुद्धे तव वासो जिहीर्षवः आगता हि नः प्रीतिः सवाससि गते त्वयि
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वयम् | अक्षाः | सु + दुर्बुद्धि | तव | वासो | जिहीर्षवः
आगता | न | हि | नः | प्रीतिः | स + वासस् | गते | त्वयि
तान्समीक्ष्य गतानक्षानात्मानं विवाससम् पुण्यश्लोकस्ततो राजा दमयन्तीमथाब्रवीत्
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तान् | समीक्ष्य | गतान् | अक्षान् | आत्मानं | च | विवाससम्
पुण्यश्लोकस् | ततो | राजा | दमयन्तीम् | अथ + ब्रू
येषां प्रकोपादैश्वर्यात्प्रच्युतोऽहमनिन्दिते प्राणयात्रां विन्दे दुःखितः क्षुधयार्दितः
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येषां | प्रकोपाद् | ऐश्वर्यात् | प्रच्युतो | ऽहम् | अनिन्दिते
प्राणयात्रां | न | विन्दे | च | दुःखितः | क्षुधा + अर्दय्
येषां कृते सत्कारमकुर्वन्मयि नैषधाः इमे शकुना भूत्वा वासोऽप्यपहरन्ति मे
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येषां | कृते | न | सत्कारम् | अकुर्वन् | मयि | नैषधाः
त | इमे | शकुना | भूत्वा | वासो | अपि + अपहृ | मे
वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः भर्ता तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मनः
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वैषम्यं | परमं | प्राप्तो | दुःखितो | गम् + चेतन
भर्ता | ते | ऽहं | निबुध् + इदम् | वचनं | हितम् | आत्मनः
एते गच्छन्ति बहवः पन्थानो दक्षिणापथम् अवन्तीमृक्षवन्तं समतिक्रम्य पर्वतम्
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एते | गच्छन्ति | बहवः | पन्थानो | दक्षिणापथम्
अवन्तीम् | ऋक्षवन्तं | च | समतिक्रम्य | पर्वतम्
एष विन्ध्यो महाशैलः पयोष्णी समुद्रगा आश्रमाश्च महर्षीणाममी पुष्पफलान्विताः
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एष | विन्ध्यो | महत् + शैल | पयोष्णी | च | समुद्रगा
आश्रम + च | महत् + ऋषि | अमी | पुष्प + फल + अन्वित
एष पन्था विदर्भाणामयं गच्छति कोसलान् अतः परं देशोऽयं दक्षिणे दक्षिणापथः
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एष | पन्था | विदर्भाणाम् | अयं | गच्छति | कोसलान्
अतः | परं | च | देशो | ऽयं | दक्षिणे | दक्षिणापथः
ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वचः
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ततो | बाष्प + कल | वाचं | दमयन्ती | शुचि + स्मित
उवाच | दमयन्ती | तं | नैषधं | करुणं | वचः
उद्वेपते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः
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उद्वेपते | मे | हृदयं | सद् + अङ्ग | सर्वशः
तव | पार्थिव | संकल्पं | चिन्तयन्त्याः | पुनः | पुनः
हृतराज्यं हृतधनं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम् कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां विजने वने
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हृ + राज्य | हृ + धन | विवस्त्रं | क्षुध् + श्रम + अन्वित
कथम् | उत्सृज्य | गच्छेयम् | अहं | त्वां | विजने | वने
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत्सुखम् वने घोरे महाराज नाशयिष्यामि ते क्लमम्
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श्रान्तस्य | ते | क्षुध् + आर्त | चिन्तयानस्य | तत् | सुखम्
वने | घोरे | महत् + राज | नाशयिष्यामि | ते | क्लमम्
भार्यासमं किंचिद्विद्यते भिषजां मतम् औषधं सर्वदुःखेषु सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
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न | च | भार्या + सम | किंचिद् | विद्यते | भिषजां | मतम्
औषधं | सर्व + दुःख | सत्यम् | एतद् | ब्रवीमि | ते
एवमेतद्यथात्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम्
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एवम् | एतद् | यथा + अह् | त्वं | हिडिम्बे | न + अत्र | संशयः
न + अस् | भार्या + सम | मित्रं | नर + आर्त | भेषजम्
चाहं त्यक्तुकामस्त्वां किमर्थं भीरु शङ्कसे त्यजेयमहमात्मानं त्वेव त्वामनिन्दिते
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न | च + मद् | त्यक्तु + काम | त्वां | क + अर्थ | भीरु | शङ्कसे
त्यजेयम् | अहम् | आत्मानं | न | तु + एव | त्वाम् | अनिन्दिते
यदि मां त्वं महाराज विहातुमिहेच्छसि तत्किमर्थं विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते
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यदि | त्वं | च | महत् + राज | राजन् + वंश + चर्
तत् | क + अर्थ | विदर्भाणां | पन्थाः | समुपदिश्यते
अवैमि चाहं नृपते त्वं मां त्यक्तुमर्हसि चेतसा त्वपकृष्टेन मां त्यजेथा महापते
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स | त्वं | नृपति + शार्दूल | न | पुत्रं | त्यक्तुम् | अर्हसि
चेतसा | तु + अपकृष्ट | मां | त्यजेथा | महत् + पति
पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि नरसत्तम अतोनिमित्तं शोकं मे वर्धयस्यमरप्रभ
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पन्थानं | हि | मद् + अभीक्ष्ण | आख्यासि | नर + सत्तम
अतोनिमित्तं | शोकं | मे | वर्धय् + अमर + प्रभा
यदि चायमभिप्रायस्तव राजन्व्रजेदिति सहितावेव गच्छावो विदर्भान्यदि मन्यसे
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यदि | च + इदम् | अभिप्रायस् | तव | राजन् | व्रजेद् | इति
वनम् | आदाय | भद्रं | ते | गच्छावो | यदि | मन्यसे
विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद तेन त्वं पूजितो राजन्सुखं वत्स्यसि नो गृहे
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विदर्भ + राज | तत्र | त्वां | पूजयिष्यति | मानद
तेन | त्वं | पूजितो | राजन् | सुखं | वत्स्यसि | नो | गृहे