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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.47 (12 verses)
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Chapter 3.47

यदिदं शोचितं राज्ञा धृतराष्ट्रेण वै मुने प्रव्राज्य पाण्डवान्वीरान्सर्वमेतन्निरर्थकम्
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यद् | इदं | शोचितं | राज्ञा | धृतराष्ट्रेण | वै | मुने
प्रव्राज्य | पाण्डवान् | वीरान् | सर्वम् | एतन् | निरर्थकम्
कथं हि राजा पुत्रं स्वमुपेक्षेताल्पचेतसम् दुर्योधनं पाण्डुपुत्रान्कोपयानं महारथान्
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कथं | हि | राजा | पुत्रं | स्वम् | उपेक्ष् + अल्प + चेतस्
यदृच्छया | तान् | अपश्यत् | पाण्डु + पुत्र | महत् + रथ
किमासीत्पाण्डुपुत्राणां वने भोजनमुच्यताम् वानेयमथ वा कृष्टमेतदाख्यातु मे भवान्
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मध्यमः | पाण्डु + पुत्र | निकृत्या | संनिहन्यताम्
वानेयम् | अथवा | कृष्टम् | एतद् | आख्यातु | मे | भवान्
वानेयं मृगांश्चैव शुद्धैर्बाणैर्निपातितान् ब्राह्मणानां निवेद्याग्रमभुञ्जन्पुरुषर्षभाः
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वानेयं | च | मृग + च + एव | शुद्धैर् | बाणैर् | निपातितान्
ब्राह्मणानां | निवेदय् + अग्र | अभुञ्जन् | पुरुष + ऋषभ
तांस्तु शूरान्महेष्वासांस्तदा निवसतो वने अन्वयुर्ब्राह्मणा राजन्साग्नयोऽनग्नयस्तथा
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तांस् | तु | शूरान् | महत् + इष्वास | तदा | निवसतो | वने
अन्वयुर् | ब्राह्मणा | राजन् | स + अग्नि | अन् + अग्नि | तथा
ब्राह्मणानां सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् दश मोक्षविदां तद्वद्यान्बिभर्ति युधिष्ठिरः
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वर्चस्विनां | ब्राह्मणानां | स्नातकानां | परिच्छदान्
त्रिंशत् + दासीक | एकैको | यान् | बिभर्ति | युधिष्ठिरः
रुरून्कृष्णमृगांश्चैव मेध्यांश्चान्यान्वनेचरान् बाणैरुन्मथ्य विधिवद्ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयत्
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रुरून् | कृष्णमृगांश् | च + एव | मेध्यांश् | च + अन्य | वनेचरान्
बाणैर् | उन्मथ्य | विधिवद् | ब्राह्मणेभ्यो | न्यवेदयत्
तत्र कश्चिद्दुर्वर्णो व्याधितो वाप्यदृश्यत कृशो वा दुर्बलो वापि दीनो भीतोऽपि वा नरः
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न | तत्र | कश्चिद् | दुर्वर्णो | व्याधितो | वा + अपि + दृश्
कृशो | वा | दुर्बलो | वा + अपि | दीनो | भीतो | ऽपि | वा | नरः
पुत्रानिव प्रियाञ्ज्ञातीन्भ्रातॄनिव सहोदरान् पुपोष कौरवश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः
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पुत्रान् | इव | प्रियाञ् | ज्ञातीन् | भ्रातॄन् | इव | सहोदरान्
ततो | निमित्ते | कस्मिंश्चिद् | धर्मराजो | युधिष्ठिरः
पतींश्च द्रौपदी सर्वान्द्विजांश्चैव यशस्विनी मातेव भोजयित्वाग्रे शिष्टमाहारयत्तदा
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पति + च | द्रौपदी | सर्वान् | द्विजांश् | च + एव | यशस्विनी
मातृ + इव | भोजय् + अग्र | शिष्टम् | आहारयत् | तदा
प्राचीं राजा दक्षिणां भीमसेनो; यमौ प्रतीचीमथ वाप्युदीचीम् धनुर्धरा मांसहेतोर्मृगाणां; क्षयं चक्रुर्नित्यमेवोपगम्य
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प्राचीं | राजा | दक्षिणां | भीमसेनो | यमौ | प्रतीचीम् | अथ | वा + अपि + उदञ्च्
धनुस् + धर | मांस + हेतु | मृगाणां | क्षयं | चक्रुर् | नित्यम् | एव + उपगम्
तथा तेषां वसतां काम्यके वै; विहीनानामर्जुनेनोत्सुकानाम् पञ्चैव वर्षाणि तदा व्यतीयु;रधीयतां जपतां जुह्वतां
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तथा | तेषां | वसतां | काम्यके | वै | विहीनानाम् | अर्जुन + उत्सुक
पञ्चन् + एव | वर्षाणि | तदा | व्यतीयुर् | अधीयतां | जपतां | जुह्वतां | च