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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.39 (30 verses)
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Chapter 3.39

भगवञ्श्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः विस्तरेण कथामेतां यथास्त्राण्युपलब्धवान्
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भगवत् + श्रु | इच्छामि | पार्थ + अक्लिष्ट + कर्मन्
कथं | समभवद् | द्रोणः | कथं | च + अस्त्र + अवाप्
कथं पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनंजयः वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत्
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तं | च + अपि | पुरुष + व्याघ्र | बाहु + वीर्य | पाण्डवः
वनं | कण्टकितं | घोरं | निर्मनुष्यम् | अभूत + वत्
किं तेन कृतं तत्र वसता ब्रह्मवित्तम कथं भगवान्स्थाणुर्देवराजश्च तोषितः
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किं | मया | न | कृतं | तत्र | यद् + इदम् | कर्मणः | फलम्
कथं | च | भगवान् | स्थाणुर् | देव + राज | च | तोषितः
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद्द्विजोत्तम त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं मानुषं चैव वेत्थ
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एतद् | इष् + मद् | श्रोतुं | विस्तरेण | द्विजोत्तम
त्वं | हि | सर्व + ज्ञ | दिव्यं | च | मानुषं | च + एव | वेत्थ | ह
अत्यद्भुतं महाप्राज्ञ रोमहर्षणमर्जुनः भवेन सह संग्रामं चकाराप्रतिमं किल पुरा प्रहरतां श्रेष्ठः संग्रामेष्वपराजितः
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अति + अद्भुत | महत् + प्राज्ञ | रोमहर्षणम् | अर्जुनः
भवेन | सह | संग्रामं | कृ + अप्रतिम | किल
पुरा | प्रहरतां | श्रेष्ठः | संग्राम + अपराजित
यच्छ्रुत्वा नरसिंहानां दैन्यहर्षातिविस्मयात् शूराणामपि पार्थानां हृदयानि चकम्पिरे
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यद् + श्रु | नर + सिंह | दैन्य + हर्ष + अति + विस्मय
शूराणाम् | अपि | पार्थानां | हृदयानि | चकम्पिरे
यद्यच्च कृतवानन्यत्पार्थस्तदखिलं वद ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षये चरितं तस्य शूरस्य तन्मे सर्वं प्रकीर्तय
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यद् | यद् + च | कृतवान् | अन्यत् | पार्थस् | तद् | अखिलं | वद
न | हि + इदम् | निन्दितं | जिष्णोः | सु + सूक्ष्म | अपि | लक्षये
चरितं | तस्य | शूरस्य | तन् | मे | सर्वं | प्रकीर्तय
कथयिष्यामि ते तात कथामेतां महात्मनः दिव्यां कौरवशार्दूल महतीमद्भुतोपमाम्
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हन्त | ते | कथयिष्यामि | कथाम् | एतां | मनोरमाम्
दिव्यां | कौरव + शार्दूल | महतीम् | अद्भुत + उपम
गात्रसंस्पर्शसंबन्धं त्र्यम्बकेण सहानघ पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक्समागमम्
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गात्र + संस्पर्श + सम्बन्ध | त्र्यम्बकेण | सह + अनघ
पार्थस्य | देवदेवेन | शृणु | सम्यक् | समागमम्
युधिष्ठिरनियोगात्स जगामामितविक्रमः शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं शंकरम्
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युधिष्ठिर + नियोग | स | गम् + अमित + विक्रम
शक्रं | सुर + ईश्वर | द्रष्टुं | देवदेवं | च | शंकरम्
दिव्यं तद्धनुरादाय खड्गं पुरुषर्षभः महाबलो महाबाहुरर्जुनः कार्यसिद्धये दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति
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दिव्यं | तद् | धनुर् | आदाय | खड्गं | च | पुरुष + ऋषभ
महत् + बल | महत् + बाहु | अर्जुनः | कार्य + सिद्धि
दिशं | हि + उदञ्च् | कौरव्यो | हिमवन्त् + शिखर | प्रति
ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन्सर्वलोकमहारथः त्वरया परया युक्तस्तपसे धृतनिश्चयः वनं कण्टकितं घोरमेक एवान्वपद्यत
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ऐन्द्रिः | स्थिर + मनस् | राजन् | सर्व + लोक + महत् + रथ
त्वरया | परया | युक्तस् | तपसे | धृ + निश्चय
वनं | कण्टकितं | घोरम् | एक | एव + अनुपद्
नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम्
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नित्य + पुष्प + फल + उपे | नाना + द्विज + गण + आयुत
ततो | मेघ + घन + प्रख्या | सिद्ध + चारण + सेव्
ततः प्रयाते कौन्तेये वनं मानुषवर्जितम् शङ्खानां पटहानां शब्दः समभवद्दिवि
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ततः | सम्प्राप्य | कौन्तेया | नगरं | वारणावतम्
शङ्खानां | पटहानां | च | शब्दः | समभवद् | दिवि
पुष्पवर्षं सुमहन्निपपात महीतले मेघजालं विततं छादयामास सर्वतः
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पुष्प + वर्ष | च | सु + महत् | निपपात | मही + तल
मेघ + जाल | च | विततं | छादयामास | सर्वतः
अतीत्य वनदुर्गाणि संनिकर्षे महागिरेः शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा
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अतीत्य | वन + दुर्ग | संनिकर्षे | महत् + गिरि
शुशुभे | हिमवन्त् + पृष्ठ | वसमानो | ऽर्जुनस् | तदा
तत्रापश्यद्द्रुमान्फुल्लान्विहगैर्वल्गु नादितान् नदीश्च बहुलावर्ता नीलवैडूर्यसंनिभाः
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तत्र + पश् | द्रुमान् | फुल्लान् | विहगैर् | वल्गु + नादय्
नदीश् | च | बहुल + आवर्त | नील + वैडूर्य + संनिभ
हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चबर्हिणनादिताः
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हंस + कारण्डव + उद्गा | सारस + अभिरु | तथा
पुंस्कोकिल + रु | च + एव | क्रौञ्च + बर्हिण + नादय्
मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः पुण्यशीतामलजलाः पश्यन्प्रीतमनाभवत्
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मनोहर + वन + उपे | तस्मिन्न् | अतिरथो | ऽर्जुनः
पुण्य + शीत + अमल + जल | पश्यन् | प्री + मनस् + भू
रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः
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रमणीये | वन + उद्देश | बहु + पादप + संवृ
तपस् + उग्र | वर्तमान | उग्र + तेजस् | महामनाः
दर्भचीरं निवस्याथ दण्डाजिनविभूषितः पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः द्विगुणेनैव कालेन द्वितीयं मासमत्यगात्
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दर्भ + चीर | निवस् + अथ | दण्ड + अजिन + विभूषय्
पूर्णे | पूर्णे | त्रि + रात्र | तु | मासम् | एकं | फल + अशन
द्विगुण + एव | कालेन | द्वितीयं | मासम् | अत्यगात्
तृतीयमपि मासं पक्षेणाहारमाचरन् शीर्णं पतितं भूमौ पर्णं समुपयुक्तवान्
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तृतीयम् | अपि | मासं | स | पक्ष + आहार | आचरन्
शीर्णं | च | पतितं | भूमौ | पर्णं | समुपयुक्तवान्
चतुर्थे त्वथ संप्राप्ते मासि पूर्णे ततः परम् वायुभक्षो महाबाहुरभवत्पाण्डुनन्दनः ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः
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चतुर्थे | तु + अथ | सम्प्राप्ते | मासि | पूर्णे | ततः | परम्
योग्यां | चक्रे | महत् + बाहु | धनुषा | पाण्डु + नन्दन
ऊर्ध्व + बाहु | निरालम्बः | पाद + अङ्गुष्ठ + अग्र + विष्ठा
सदोपस्पर्शनाच्चास्य बभूवुरमितौजसः विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः
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सदा + उपस्पर्शन + च + इदम् | बभूवुर् | अमित + ओजस्
विद्युत् + अम्भोरुह + निभ | जटास् | तस्य | महात्मनः
ततो महर्षयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् शितिकण्ठं महाभागं प्रणिपत्य प्रसाद्य सर्वे निवेदयामासुः कर्म तत्फल्गुनस्य
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ततो | जानपदाः | सर्वे | आजग्मुर् | नगरं | प्रति
शितिकण्ठं | महाभागं | प्रणिपत्य | प्रसाद्य | च
सर्वे | निवेदयामासुः | कर्म | तत् | फल्गुनस्य | ह
एष पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमाश्रितः उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमाययन्दिशः
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एष | पार्थो | महत् + तेजस् | हिमवन्त् + पृष्ठ | आश्रितः
उग्रे | तपसि | दुष्पारे | स्थितो | दिशः
तस्य देवेश वयं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् संतापयति नः सर्वानसौ साधु निवार्यताम्
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तस्य | देवेश | न | वयं | विद्मः | सर्वे | चिकीर्षितम्
संतापयति | नः | सर्वान् | असौ | साधु | निवार्यताम्
शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः अहमस्य विजानामि संकल्पं मनसि स्थितम्
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शीघ्रं | गच्छत | संहृष्टा | यथागतम् | अतन्द्रिताः
अहम् | अस्य | विजानामि | संकल्पं | मनसि | स्थितम्
नास्य स्वर्गस्पृहा काचिन्नैश्वर्यस्य चायुषः यत्त्वस्य काङ्क्षितं सर्वं तत्करिष्येऽहमद्य वै
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न + इदम् | स्वर्ग + स्पृहा | काचिन् | न + ऐश्वर्य | न | च + आयुस्
यत् | तु + इदम् | काङ्क्षितं | सर्वं | तत् | करिष्ये | ऽहम् | अद्य | वै
ते श्रुत्व शर्ववचनमृषयः सत्यवादिनः प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथास्वं पुनराश्रमान्
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वेदे | षडङ्गे | निरताः | शुचयः | सत्य + वादिन्
प्रययुर् | हृष् + मनस् | इन्द्रप्रस्थं | पुर + उत्तम