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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.34 (85 verses)
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Chapter 3.34

याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः निःश्वसन्नुपसंगम्य क्रुद्धो राजानमब्रवीत्
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तस्य | तद् | वचनं | श्रुत्वा | भीमसेनो | ऽत्यमर्षणः
निःश्वसन्न् | उपसंगम्य | क्रुद्धो | राजानम् | अब्रवीत्
राज्यस्य पदवीं धर्म्यां व्रज सत्पुरुषोचिताम् धर्मकामार्थहीनानां किं नो वस्तुं तपोवने
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राज्यस्य | पदवीं | धर्म्यां | व्रज | सत् + पुरुष + उचित
धर्म + काम + अर्थ + हा | किं | नो | वस्तुं | तपस् + वन
नैव धर्मेण तद्राज्यं नार्जवेन चौजसा अक्षकूटमधिष्ठाय हृतं दुर्योधनेन नः
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न + एव | धर्मेण | तद् | राज्यं | न + आर्जव | न | च + ओजस्
अक्ष + कूट | अधिष्ठाय | हृतं | दुर्योधनेन | नः
गोमायुनेव सिंहानां दुर्बलेन बलीयसाम् आमिषं विघसाशेन तद्वद्राज्यं हि नो हृतम्
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गोमायु + इव | सिंहानां | दुर्बलेन | बलीयसाम्
आमिषं | विघस + आश | तद्वद् | राज्यं | हि | नो | हृतम्
धर्मलेशप्रतिच्छन्नः प्रभवं धर्मकामयोः अर्थमुत्सृज्य किं राजन्दुर्गेषु परितप्यसे
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धर्म + लेश + प्रतिच्छद् | प्रभवं | धर्म + काम
अर्थम् | उत्सृज्य | किं | राजन् | दुर्गेषु | परितप्यसे
भवतोऽनुविधानेन राज्यं नः पश्यतां हृतम् अहार्यमपि शक्रेण गुप्तं गाण्डीवधन्वना
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भवतो | ऽनुविधानेन | राज्यं | नः | पश्यतां | हृतम्
अहार्यम् | अपि | शक्रेण | गुप्तं | गाण्डीवधन्वना
कुणीनामिव बिल्वानि पङ्गूनामिव धेनवः हृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवतः कृते
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कुणीनाम् | इव | बिल्वानि | पङ्गूनाम् | इव | धेनवः
हृतम् | ऐश्वर्यम् | अस्माकं | जीवतां | भवतः | कृते
भवतः प्रियमित्येवं महद्व्यसनमीदृशम् धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत
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भवतः | प्रियम् | इति + एवम् | महद् | व्यसनम् | ईदृशम्
धर्म + काम | प्रतीतस्य | प्रतिपन्नाः | स्म | भारत
कर्शयामः स्वमित्राणि नन्दयामश्च शात्रवान् आत्मानं भवतः शास्त्रे नियम्य भरतर्षभ
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कर्शयामः | स्व + मित्र | नन्दयामश् | च | शात्रवान्
कच्चिद् | व्यसनिनं | शत्रुं | निशम्य | भरत + ऋषभ
यद्वयं तदैवैतान्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि भवतः शास्त्रमादाय तन्नस्तपति दुष्कृतम्
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यद् | वयं | न | तदा + एव + एतद् | धार्तराष्ट्रान्
भवतः | शास्त्रम् | आदाय | तन् | नस् | तपति | दुष्कृतम्
अथैनामन्ववेक्षस्व मृगचर्यामिवात्मनः अवीराचरितां राजन्न बलस्थैर्निषेविताम्
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अथ + एनद् | अन्ववेक्षस्व | मृगचर्याम् | इव + आत्मन्
अवीर + आचर् | राजन् | न | बलस्थैर् | निषेविताम्
यां कृष्णो बीभत्सुर्नाभिमन्युर्न सृञ्जयः चाहमभिनन्दामि माद्रीसुतावुभौ
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यां | न | कृष्णो | न | बीभत्सुर् | न + अभिमन्यु | न | सृञ्जयः
न | च + मद् | अभिनन्दामि | न | च | माद्री + सुत + उभ्
भवान्धर्मो धर्म इति सततं व्रतकर्शितः कच्चिद्राजन्न निर्वेदादापन्नः क्लीबजीविकाम्
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भवान् | धर्मो | धर्म | इति | सततं | व्रत + कर्शय्
कच्चिद् | राजन् | न | निर्वेदाद् | आपन्नः | क्लीब + जीविका
दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं सर्वघातिनम् अशक्ताः श्रियमाहर्तुमात्मनः कुर्वते प्रियम्
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दुर्मनुष्या | हि | निर्वेदम् | अफलं | सर्व + घातिन्
अशक्ताः | श्रियम् | आहर्तुम् | आत्मनः | कुर्वते | प्रियम्
भवान्दृष्टिमाञ्शक्तः पश्यन्नात्मनि पौरुषम् आनृशंस्यपरो राजन्नानर्थमवबुध्यसे
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स | भवान् | दृष्टिमाञ् | शक्तः | पश्यन्न् | आत्मनि | पौरुषम्
आनृशंस्य + पर | राजन् | न + अनर्थ | अवबुध्यसे
अस्मानमी धार्तराष्ट्राः क्षममाणानलं सतः अशक्तानेव मन्यन्ते तद्दुःखं नाहवे वधः
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अस्मान् | अमी | धार्तराष्ट्राः | क्षममाणान् | अलं | सतः
अशक्तान् | एव | मन्यन्ते | तद् + दुःख | न + आहव | वधः
तत्र चेद्युध्यमानानामजिह्ममनिवर्तिनाम् सर्वशो हि वधः श्रेयान्प्रेत्य लोकाँल्लभेमहि
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तत्र | चेद् | युध्यमानानाम् | अजिह्मम् | अनिवर्तिनाम्
सर्वशो | हि | वधः | श्रेयान् | प्रेत्य | लोक + लभ्
अथ वा वयमेवैतान्निहत्य भरतर्षभ आददीमहि गां सर्वां तथापि श्रेय एव नः
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अथवा | वयम् | एव + एतद् | निहत्य | भरत + ऋषभ
आददीमहि | गां | सर्वां | तथा + अपि | श्रेय | एव | नः
सर्वथा कार्यमेतन्नः स्वधर्ममनुतिष्ठताम् काङ्क्षतां विपुलां कीर्तिं वैरं प्रतिचिकीर्षताम्
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सर्वथा | कार्यम् | एतन् | नः | स्वधर्मम् | अनुतिष्ठताम्
काङ्क्षतां | विपुलां | कीर्तिं | वैरं | प्रतिचिकीर्षताम्
आत्मार्थं युध्यमानानां विदिते कृत्यलक्षणे अन्यैरपहृते राज्ये प्रशंसैव गर्हणा
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आत्मन् + अर्थ | युध्यमानानां | विदिते | कृत्य + लक्षण
अन्यैर् | अपहृते | राज्ये | प्रशंसा + एव | न | गर्हणा
कर्शनार्थो हि यो धर्मो मित्राणामात्मनस्तथा व्यसनं नाम तद्राजन्न धर्मः कुधर्म तत्
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कर्शन + अर्थ | हि | यो | धर्मो | मित्राणाम् | आत्मनस् | तथा
व्यसनं | नाम | तद् | राजन् | न | स | धर्मः | कुधर्म | तत्
सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुषं धर्मदुर्बलम् जहतस्तात धर्मार्थौ प्रेतं दुःखसुखे यथा
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सर्वथा | धर्म + नित्य | तु | पुरुषं | धर्म + दुर्बल
जहतस् | तात | धर्म + अर्थ | प्रेतं | दुःख + सुख | यथा
यस्य धर्मो हि धर्मार्थं क्लेशभाङ्न पण्डितः धर्मस्य वेदार्थं सूर्यस्यान्धः प्रभामिव
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यस्य | धर्मो | हि | धर्म + अर्थ | क्लेश + भाज् + न | स | पण्डितः
न | स | धर्मस्य | विद् + अर्थ | सूर्य + अन्ध | प्रभाम् | इव
यस्य चार्थार्थमेवार्थः नार्थस्य कोविदः रक्षते भृतकोऽरण्यं यथा स्यात्तादृगेव सः
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यस्य | च + अर्थ | एव + अर्थ | स | च | न + अर्थ | कोविदः
रक्षते | भृतको | ऽरण्यं | यथा | स्यात् | तादृग् | एव | सः
अतिवेलं हि योऽर्थार्थी नेतरावनुतिष्ठति वध्यः सर्वभूतानां ब्रह्महेव जुगुप्सितः
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अतिवेलं | हि | यो | अर्थ + अर्थिन् | न + इतर + अनुष्ठा
स | वध्यः | सर्व + भूत | ब्रह्मन् + हन् + इव | जुगुप्सितः
सततं यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थाभ्यां हीयते
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अतिवेलं | हि | यो | अर्थ + अर्थिन् | न + इतर + अनुष्ठा
तस्मात् | सत्यं | ब्रुवन् | साक्षी | धर्म + अर्थ | न | हीयते
तस्य धर्मार्थहीनस्य कामान्ते निधनं ध्रुवम् कामतो रममाणस्य मीनस्येवाम्भसः क्षये
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तस्य | धर्म + अर्थ + हा | काम + अन्त | निधनं | ध्रुवम्
कामतो | रममाणस्य | मीन + इव + अम्भस् | क्षये
तस्माद्धर्मार्थयोर्नित्यं प्रमाद्यन्ति पण्डिताः प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणिर्यथा
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तस्माद् | धर्म + अर्थ | नित्यं | न | प्रमाद्यन्ति | पण्डिताः
प्रकृतिः | सा | हि | कामस्य | पावक + अरणि | यथा
सर्वथा धर्ममूलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः इतरेतरयोनी तौ विद्धि मेघोदधी यथा
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सर्वथा | धर्म + मूल | ऽर्थो | धर्मश् | च + अर्थ + परिग्रह
इतरेतर + योनि | तौ | विद्धि | मेघ + उदधि | यथा
द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरुपजायते कामश्चित्तसंकल्पः शरीरं नास्य विद्यते
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द्रव्य + अर्थ + स्पर्श + संयोग | या | प्रीतिर् | उपजायते
स | कामश् | चित्त + संकल्प | शरीरं | न + इदम् | विद्यते
अर्थार्थी पुरुषो राजन्बृहन्तं धर्ममृच्छति अर्थमृच्छति कामार्थी कामादन्यमृच्छती
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अर्थ + अर्थिन् | पुरुषो | राजन् | बृहन्तं | धर्मम् | ऋच्छति
अर्थम् | ऋच्छति | काम + अर्थिन् | न | काम + अन्य + ऋछ्
हि कामेन कामोऽन्यः साध्यते फलमेव तत् उपयोगात्फलस्येव काष्ठाद्भस्मेव पण्डितः
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न | हि | कामेन | कामो | ऽन्यः | साध्यते | फलम् | एव | तत्
उपयोगात् | फल + इव | काष्ठाद् | भस्मन् + इव | पण्डितः
इमाञ्शकुनिकान्राजन्हन्ति वैतंसिको यथा एतद्रूपमधर्मस्य भूतेषु विहिंसताम्
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इदम् + शकुनिक | राजन् | हन्ति | वैतंसिको | यथा
एतद् | रूपम् | अधर्मस्य | भूतेषु | च | विहिंसताम्
कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रवृत्तिं यो पश्यति वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह दुर्मतिः
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काम + लोभ + च | धर्मस्य | प्रवृत्तिं | यो | न | पश्यति
अप्रियः | सर्व + भूत | सो | अमुत्र + इह | च | नश्यति
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूयसीम्
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व्यक्तं | ते | विदितो | राजन्न् | अर्थो | द्रव्य + परिग्रह
प्रकृतिं | च + अपि | विद् + इदम् | विकृतिं | च + अपि | भूयसीम्
तस्य नाशं विनाशं वा जरया मरणेन वा अनर्थमिति मन्यन्ते सोऽयमस्मासु वर्तते
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तस्य | नाशं | विनाशं | वा | जरया | मरणेन | वा
अनर्थम् | इति | मन्यन्ते | सो | ऽयम् | अस्मासु | वर्तते
इन्द्रियाणां पञ्चानां मनसो हृदयस्य विषये वर्तमानानां या प्रीतिरुपजायते काम इति मे बुद्धिः कर्मणां फलमुत्तमम्
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इन्द्रियाणां | च | पञ्चानां | मनसो | हृदयस्य | च
विषये | वर्तमानानां | या | प्रीतिर् | उपजायते
स | काम | इति | मे | बुद्धिः | कर्मणां | फलम् | उत्तमम्
एवमेव पृथग्दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः कामपरमो वा स्यात्सर्वान्सेवेत सर्वदा
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एवम् | एव | पृथग् | दृष्ट्वा | धर्म + अर्थ | कामम् | एव | च
न | धर्म + पर | एव | स्यान् | न | च + अर्थ + परम | नरः
न | काम + परम | वा | स्यात् | सर्वान् | सेवेत | सर्वदा
धर्मं पूर्वं धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत् अहन्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः
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धर्मं | पूर्वं | धनं | मध्ये | जघन्ये | कामम् | आचरेत्
अहर् + अनुचर् | एवम् | एष | शास्त्र + कृ | विधिः
कामं पूर्वं धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् वयस्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः
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धर्मं | पूर्वं | धनं | मध्ये | जघन्ये | कामम् | आचरेत्
अहर् + अनुचर् | एवम् | एष | शास्त्र + कृ | विधिः
धर्मं चार्थं कामं यथावद्वदतां वर विभज्य काले कालज्ञः सर्वान्सेवेत पण्डितः
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धर्मे | च + अर्थ | च | कामे | च | ख्यातिं | लोके | गमिष्यति
उवाच | वचनं | काले | काल + ज्ञ | सर्व + धर्म + विद्
मोक्षो वा परमं श्रेय एष राजन्सुखार्थिनाम् प्राप्तिर्वा बुद्धिमास्थाय सोपायं कुरुनन्दन
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मोक्षो | वा | परमं | श्रेय | एष | राजन् | सुख + अर्थिन्
प्राप्तिर् | वा | बुद्धिम् | आस्थाय | स + उपाय | कुरु + नन्दन
तद्वाशु क्रियतां राजन्प्राप्तिर्वाप्यधिगम्यताम् जीवितं ह्यातुरस्येव दुःखमन्तरवर्तिनः
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तद् | वा + आशु | क्रियतां | राजन् | प्राप्तिर् | वा + अपि + अधिगम्
जीवितं | हि + आतुर + इव | दुःखम् | अन्तर + वर्तिन्
विदितश्चैव ते धर्मः सततं चरितश्च ते जानते त्वयि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम्
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विदितश् | च + एव | ते | धर्मः | सततं | चरितश् | च | ते
जानते | त्वयि | शंसन्ति | सुहृदः | कर्मन् + चोदन
दानं यज्ञः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम् एष धर्मः परो राजन्फलवान्प्रेत्य चेह
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दानं | यज्ञः | सतां | पूजा | वेद + धारण | आर्जवम्
एष | धर्मः | परो | राजन् | फलवान् | प्रेत्य | च + इह | च
एष नार्थविहीनेन शक्यो राजन्निषेवितुम् अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे
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एष | न + अर्थ + विहा | शक्यो | राजन् | निषेवितुम्
अखिलाः | पुरुष + व्याघ्र | गुणाः | स्युर् | यदि + अपि + इतर
धर्ममूलं जगद्राजन्नान्यद्धर्माद्विशिष्यते धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन्निषेवितुम्
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धर्म + मूल | जगद् | राजन् | न + अन्य + धर्म | विशिष्यते
एष | न + अर्थ + विहा | शक्यो | राजन् | निषेवितुम्
चार्थो भैक्षचर्येण नापि क्लैब्येन कर्हिचित् वेत्तुं शक्यः सदा राजन्केवलं धर्मबुद्धिना
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न | च + अर्थ | भैक्ष + चर्या | न + अपि | क्लैब्येन | कर्हिचित्
वेत्तुं | शक्यः | सदा | राजन् | केवलं | धर्म + बुद्धि
प्रतिषिद्धा हि ते याच्ञा यया सिध्यति वै द्विजः तेजसैवार्थलिप्सायां यतस्व पुरुषर्षभ
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प्रतिषिद्धा | हि | ते | याच्ञा | यया | सिध्यति | वै | द्विजः
तेजस् + एव + अर्थ + लिप्सा | यतस्व | पुरुष + ऋषभ
भैक्षचर्या विहिता विट्शूद्रजीविका क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम्
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भैक्ष + चर्या | न | विहिता | न | च | विश् + शूद्र + जीविका
क्षत्रियस्य | विशेषेण | धर्मस् | तु | बलम् | औरसम्
उदारमेव विद्वांसो धर्मं प्राहुर्मनीषिणः उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमर्हसि
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उदारम् | एव | विद्वांसो | धर्मं | प्राहुर् | मनीषिणः
उदारं | प्रतिपद्यस्व | न + अवर | स्थातुम् | अर्हसि
अनुबुध्यस्व राजेन्द्र वेत्थ धर्मान्सनातनान् क्रूरकर्माभिजातोऽसि यस्मादुद्विजते जनः
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अनुबुध्यस्व | राजन् + इन्द्र | वेत्थ | धर्मान् | सनातनान्
क्रूर + कर्मन् + अभिजन् | ऽसि | यस्माद् | उद्विजते | जनः
प्रजापालनसंभूतं फलं तव गर्हितम् एष ते विहितो राजन्धात्रा धर्मः सनातनः
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प्रजा + पालन + सम्भू | फलं | तव | न | गर्हितम्
एष | ते | विहितो | राजन् | धात्रा | धर्मः | सनातनः
तस्माद्विचलितः पार्थ लोके हास्यं गमिष्यसि स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं प्रशस्यते
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तस्माद् | विचलितः | पार्थ | लोके | हास्यं | गमिष्यसि
स्वधर्म + हि | मनुष्याणां | चलनं | न | प्रशस्यते
क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः वीर्यमास्थाय कौन्तेय धुरमुद्वह धुर्यवत्
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स | क्षात्रं | हृदयं | कृत्वा | त्यज् + इदम् | शिथिलं | मनः
वीर्यम् | आस्थाय | कौन्तेय | धुरम् | उद्वह | धुर्य + वत्
हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन पार्थिवो व्यजयद्राजन्न भूतिं पुनः श्रियम्
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न | हि | केवल + धर्म + आत्मन् | पृथिवीं | जातु | कश्चन
पार्थिवो | व्यजयद् | राजन् | न | भूतिं | न | पुनः | श्रियम्
जिह्वां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम् निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः
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जिह्वां | दत्त्वा | बहूनां | हि | क्षुद्राणां | लुभ् + चेतस्
निकृत्या | लभते | राज्यम् | आहारम् | इव | शल्यकः
भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्धाश्च सर्वशः निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पाण्डवर्षभ
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भ्रातरः | पूर्व + जन् + च | सु + समृध् | च | सर्वशः
निकृत्या | निर्जिता | देवैर् | असुराः | पाण्डव + ऋषभ
एवं बलवतः सर्वमिति बुद्ध्वा महीपते जहि शत्रून्महाबाहो परां निकृतिमास्थितः
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एवं | बलवतः | सर्वम् | इति | बुद्ध्वा | महीपते
जहि | शत्रून् | महत् + बाहु | परां | निकृतिम् | आस्थितः
ह्यर्जुनसमः कश्चिद्युधि योद्धा धनुर्धरः भविता वा पुमान्कश्चिन्मत्समो वा गदाधरः
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न | हि + अर्जुन + सम | कश्चिद् | युधि | योद्धा | धनुर्धरः
भविता | वा | पुमान् | कश्चित् + मद् + समा | वा | गदा + धर
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुबलवानपि प्रमाणेन नोत्साहात्सत्त्वस्थो भव पाण्डव
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सत्त्वेन | कुरुते | युद्धं | राजन् | सु + बलवत् | अपि
न | प्रमाणेन | न + उत्साह | सत्त्व + स्थ | भव | पाण्डव
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी
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सत्त्वं | हि | मूलम् | अर्थस्य | वितथं | यद् | अतस् + अन्यथा
न | तु | प्रसक्तं | भवति | वृक्ष + छाया + इव | हैमनी
अर्थत्यागो हि कार्यः स्यादर्थं श्रेयांसमिच्छता बीजौपम्येन कौन्तेय मा ते भूदत्र संशयः
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अर्थ + त्याग | हि | कार्यः | स्याद् | अर्थं | श्रेयांसम् | इच्छता
बीज + औपम्य | कौन्तेय | मा | ते | भूद् | अत्र | संशयः
अर्थेन तु समोऽनर्थो यत्र लभ्येत नोदयः तत्र विपणः कार्यः खरकण्डूयितं हि तत्
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अर्थेन | तु | सम + अनर्थ | यत्र | लभ्येत | न + उदय
न | तत्र | विपणः | कार्यः | खरकण्डूयितं | हि | तत्
एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वाल्पकं नरः बृहन्तं धर्ममाप्नोति बुद्ध इति निश्चितः
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एवम् | एव | मनुष्य + इन्द्र | धर्मं | त्यज् + अल्पक | नरः
श्रेयान् | स्वधर्म + अनपग | न | क्रुद्ध | इति | निश्चितम्
अमित्रं मित्रसंपन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिताः भिन्नैर्मित्रैः परित्यक्तं दुर्बलं कुरुते वशे
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अमित्रं | मित्र + सम्पद् | मित्रैर् | भिन्दन्ति | पण्डिताः
भिन्नैर् | मित्रैः | परित्यक्तं | दुर्बलं | कुरुते | वशे
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुबलवानपि नोद्यमेन होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः
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सत्त्वेन | कुरुते | युद्धं | राजन् | सु + बलवत् | अपि
न + उद्यम | न | होत्राभिः | सर्वाः | स्वीकुरुते | प्रजाः
सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव
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सर्वथा | संहतैर् | एव | दुर्बलैर् | बलवान् | अपि
अमित्रः | शक्यते | हन्तुं | मधुहा | भ्रमरैर् | इव
यथा राजन्प्रजाः सर्वाः सूर्यः पाति गभस्तिभिः अत्ति चैव तथैव त्वं सवितुः सदृशो भव
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यथा | राजन् | प्रजाः | सर्वाः | सूर्यः | पाति | गभस्तिभिः
अत्ति | च + एव | तथा + एव | त्वं | सवितुः | सदृशो | भव
एतद्ध्यपि तपो राजन्पुराणमिति नः श्रुतम् विधिना पालनं भूमेर्यत्कृतं नः पितामहैः
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एतद् | वृत्तं | महत् + राज | पाण्डवान् | प्रति | नः | श्रुतम्
विधिना | पालनं | भूमेर् | यत् | कृतं | नः | पितामहैः
अपेयात्किल भाः सूर्याल्लक्ष्मीश्चन्द्रमसस्तथा इति लोको व्यवसितो दृष्ट्वेमां भवतो व्यथाम्
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अपेयात् | किल | भाः | सूर्य + लक्ष्मी | चन्द्रमसस् | तथा
इति | लोको | व्यवसितो | दृश् + इदम् | भवतो | व्यथाम्
भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य कथायुक्ताः परिषदः पृथग्राजन्समागताः
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भवत् + च | प्रशंसाभिर् | निन्दाभिर् | इतरस्य | च
कथा + युज् | परिषदः | पृथग् | राजन् | समागताः
इदमभ्यधिकं राजन्ब्राह्मणा गुरवश्च ते समेताः कथयन्तीह मुदिताः सत्यसंधताम्
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इदम् | अभ्यधिकं | राजन् | ब्राह्मणा | गुरवश् | च | ते
समेताः | कथय् + इह | मुदिताः | सत्यसंधताम्
यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भयादपि अनृतं किंचिदुक्तं ते कामान्नार्थकारणात्
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यत् + न | मोह + न | कार्पण्य + न | लोभ + न | भय + अपि
अनृतं | किंचिद् | उक्तं | ते | न | काम + न + अर्थ + कारण
यदेनः कुरुते किंचिद्राजा भूमिमवाप्नुवन् सर्वं तन्नुदते पश्चाद्यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः
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यद् | एनः | कुरुते | किंचिद् | राजा | भूमिम् | अवाप्नुवन्
सर्वं | तद् + नुद् | पश्चाद् | यज्ञैर् | विपुल + दक्षिणा
ब्राह्मणेभ्यो ददद्ग्रामान्गाश्च राजन्सहस्रशः मुच्यते सर्वपापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमाः
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ब्राह्मणेभ्यो | ददद् | ग्रामान् | गो + च | राजन् | सहस्रशः
मुच्यते | सर्व + पाप | राहुणा | चन्द्रमा | यथा
पौरजानपदाः सर्वे प्रायशः कुरुनन्दन सवृद्धबालाः सहिताः शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर
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सहितः | सर्व + सैन्य | प्रामथत् | कुरु + नन्दन
स + वृद्ध + बाल | सहिताः | शंसन्ति | त्वां | युधिष्ठिर
श्वदृतौ क्षीरमासक्तं ब्रह्म वा वृषले यथा सत्यं स्तेने बलं नार्यां राज्यं दुर्योधने तथा
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श्वन् + दृति | क्षीरम् | आसक्तं | ब्रह्म | वा | वृषले | यथा
सत्यं | स्तेने | बलं | नार्यां | राज्यं | दुर्योधने | तथा
इति निर्वचनं लोके चिरं चरति भारत अपि चैतत्स्त्रियो बालाः स्वाध्यायमिव कुर्वते
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राजन् | मानुषे | लोके | चिरं | वत्स्यति | भारत
अपि | च + एतद् + स्त्री | बालाः | स्वाध्यायम् | इव | कुर्वते
भवान्रथमास्थाय सर्वोपकरणान्वितम् त्वरमाणोऽभिनिर्यातु चिरमर्थोपपादकम्
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स | भवान् | रथ + आस्था | सर्व + उपकरण + अन्वित
त्वरमाणो | ऽभिनिर्यातु | चिरम् | अर्थ + उपपादक
वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठानद्यैव गजसाह्वयम् अस्त्रविद्भिः परिवृतो भ्रातृभिर्दृढधन्विभिः आशीविषसमैर्वीरैर्मरुद्भिरिव वृत्रहा
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वाचयित्वा | द्विज + श्रेष्ठ | प्रणम्य | शिरस् + आहुक
अस्त्र + विद् | परिवृतो | भ्रातृ + दृढ + धन्विन्
आशीविष + सम | वीरैर् | मरुत् + इव | वृत्रहा
अमित्रांस्तेजसा मृद्नन्नसुरेभ्य इवारिहा श्रियमादत्स्व कौन्तेय धार्तराष्ट्रान्महाबल
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अमित्रांस् | तेजसा | मृद् + असुर | इव + अरि + हन्
ततो | दुर्योधन + आदि + तद् | धार्तराष्ट्रान् | महत् + यशस्
हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम् स्पर्शमाशीविषाभानां मर्त्यः कश्चन संसहेत्
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न | हि | गाण्डीव + मुच् | शराणां | गार्ध्र + वासस्
स्पर्शम् | आशीविष + आभ | मर्त्यः | कश्चन | संसहेत्
वीरो मातङ्गो सदश्वोऽस्ति भारत यः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संयुगे
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न | स | वीरो | न | मातंगो | न | अस् + अश्व | भारत
यः | सहेत | गदा + वेग | मम | क्रुद्धस्य | संयुगे
सृञ्जयैः सह कैकेयैर्वृष्णीनामृषभेण कथं स्विद्युधि कौन्तेय राज्यं प्राप्नुयामहे
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विसृष्टा | सर्व + वृष्णि | ऋषभेण | च | सोदरा
कथम् + स्विद् | युधि | कौन्तेय | राज्यं | न | प्राप्नुयामहे