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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.25 (26 verses)
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Chapter 3.25

ततस्तेषु प्रयातेषु कौन्तेयः सत्यसंगरः अभ्यभाषत धर्मात्मा भ्रातॄन्सर्वान्युधिष्ठिरः
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ततस् | तेषु | प्रयातेषु | कौन्तेयः | सत्य + संगर
अभ्यगच्छत | धर्म + आत्मन् | धर्मपुत्रं | युधिष्ठिरम्
द्वादशेमाः समास्माभिर्वस्तव्यं निर्जने वने समीक्षध्वं महारण्ये देशं बहुमृगद्विजम्
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द्वादशन् + इदम् | समा + मद् | वस्तव्यं | निर्जने | वने
समीक्षध्वं | महत् + अरण्य | देशं | बहु + मृग + द्विज
बहुपुष्पफलं रम्यं शिवं पुण्यजनोचितम् यत्रेमाः शरदः सर्वाः सुखं प्रतिवसेमहि
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बहु + पुष्प + फल | रम्यं | शिवं | पुण्य + जन + उचित
यत्र + इदम् | शरदः | सर्वाः | सुखं | प्रतिवसेमहि
एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनंजयः गुरुवन्मानवगुरुं मानयित्वा मनस्विनम्
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एवम् | उक्तः | प्रत्युवाच | धर्मराजो | युधिष्ठिरः
गुरु + वत् | मानव + गुरु | मानयित्वा | मनस्विनम्
भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किंचन
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विनीतो | ऽसि | महत् + प्राज्ञ | वृद्धानां | पर्युपासिता
अज्ञातं | मानुषे | लोके | भवतो | न + अस् | किंचन
त्वया ह्युपासिता नित्यं ब्राह्मणा भरतर्षभ द्वैपायनप्रभृतयो नारदश्च महातपाः
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त्वया | हि + उपास् | नित्यं | ब्राह्मणा | भरत + ऋषभ
द्वैपायन + प्रभृति | नारदश् | च | महत् + तपस्
यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशी देवलोकाद्ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि
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इमानि | लोक + द्वार | यो | वै | संचरते | सदा
देव + लोक | ब्रह्मन् + लोक | संचरन् | पुण्य + कृत् | वशी
सर्वा गतीर्विजानासि ब्राह्मणानां संशयः प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव
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सर्वा | गतीर् | विजानासि | ब्राह्मणानां | न | संशयः
प्रभावांश् | च + एव | वेत्थ | त्वं | सर्वेषाम् | एव | पार्थिव
त्वमेव राजञ्जानासि श्रेयःकारणमेव यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे
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त्वम् | एव | राजञ् | जानासि | श्रेयस् + कारण | एव | च
यत्र + इष् | महत् + राज | निवासं | तत्र | कुर्महे
इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजनोचितम् बहुपुष्पफलं रम्यं नानाद्विजनिषेवितम्
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इदं | द्वैतवनं | नाम | सरः | पुण्य + जन + उचित
बहु + पुष्प + फल | रम्यं | शिवं | पुण्य + जन + उचित
अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये यदि तेऽनुमतं राजन्किं वान्यन्मन्यते भवान्
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अत्र + इदम् | द्वादश | समा | विहृ + इति | रोचये
यदि | ते | ऽनुमतं | राजन् | किं | वा + अन्य | मन्यते | भवान्
ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत्समुदाहृतम् गच्छाम पुण्यं विख्यातं महद्द्वैतवनं सरः
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मद् + अपि | एतन् | मतं | पार्थ | त्वया | यत् | समुदाहृतम्
गच्छाम | पुण्यं | विख्यातं | महद् | द्वैतवनं | सरः
ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं पुण्यं द्वैतवनं सरः
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ततस् + तद् | कौरवाः | सर्वे | विना | भीमं | च | पाण्डवाः
ब्राह्मणैर् | बहुभिः | सार्धं | पुण्यं | द्वैतवनं | सरः
ब्राह्मणाः साग्निहोत्राश्च तथैव निरग्नयः स्वाध्यायिनो भिक्षवश्च सजपा वनवासिनः
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ब्राह्मणान् | सिद्ध + मन्त्र + च | सर्वतो | वै | न्यवेशयत्
स्वाध्यायिनो | भिक्षवश् | च | सजपा | वनवासिनः
बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् तपस्विनः सत्यशीलाः शतशः संशितव्रताः
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बहवो | ब्राह्मणास् | तत्र | परिवव्रुर् | युधिष्ठिरम्
तपस्विनः | सत्य + शील | शतशः | संशित + व्रत
ते यात्वा पाण्डवास्तत्र बहुभिर्ब्राह्मणैः सह पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः
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ते | यात्वा | पाण्डवास् | तत्र | बहुभिर् | ब्राह्मणैः | सह
बन्ध् + तूण | विविशुर् | भरत + ऋषभ
तच्छालतालाम्रमधूकनीप; कदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं; महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श
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तद् + शाल + ताल + आम्र + मधूक + नीप + कदम्ब + सर्ज + अर्जुन + कर्णिकार
तपात्यये | पुष्प + धर | उपेतं | महत् + वन | राष्ट्र + पति | ददर्श
महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थु;र्मनोरमां वाचमुदीरयन्तः मयूरदात्यूहचकोरसंघा;स्तस्मिन्वने काननकोकिलाश्च
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महत् + द्रुम | शिखरेषु | तस्थुर् | मनोरमां | वाचम् | उदीरयन्तः
मयूर + दात्यूह + चकोर + संघ | तस्मिन् | वने | कानन + कोकिल | च
करेणुयूथैः सह यूथपानां; मदोत्कटानामचलप्रभाणाम् महान्ति यूथानि महाद्विपानां; तस्मिन्वने राष्ट्रपतिर्ददर्श
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करेणु + यूथ | सह | यूथपानां | मद + उत्कट | अचल + प्रभा
महान्ति | यूथानि | महत् + द्विप | तस्मिन् | वने | राष्ट्र + पति | ददर्श
मनोरमां भोगवतीमुपेत्य; धृतात्मनां चीरजटाधराणाम् तस्मिन्वने धर्मभृतां निवासे; ददर्श सिद्धर्षिगणाननेकान्
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मनोरमां | भोगवतीम् | उपेत्य | धृ + आत्मन् | चीर + जटा + धर
तस्मिन् | वने | धर्म + भृत् | निवासे | ददर्श | सिद्ध + ऋषि + गण | अनेकान्
ततः यानादवरुह्य राजा; सभ्रातृकः सजनः काननं तत् विवेश धर्मात्मवतां वरिष्ठ;स्त्रिविष्टपं शक्र इवामितौजाः
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ततः | स | यानाद् | अवरुह्य | राजा | स + भ्रातृक | स + जन | काननं | तत्
विवेश | धर्म + आत्मवत् | वरिष्ठस् | त्रिविष्टपं | शक्र | इव + अमित + ओजस्
तं सत्यसंधं सहिताभिपेतु;र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसंघाः वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं; मनस्विनं संपरिवार्य तस्थुः
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तं | सत्य + संधा | सहित + अभिपत् | दिदृक्षवश् | चारण + सिद्ध + संघ
वनौकसश् | च + अपि | नरेन्द्र + सिंह | मनस्विनं | संपरिवार्य | तस्थुः
तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वा;न्प्रत्यर्चितो राजवद्देववच्च विवेश सर्वैः सहितो द्विजाग्र्यैः; कृताञ्जलिर्धर्मभृतां वरिष्ठः
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स | तत्र | सिद्धान् | अभिवाद्य | सर्वान् | प्रत्यर्चितो | राजन् + वत् | देव + वत् + च
विवेश | सर्वैः | सहितो | द्विज + अग्र्य | कृताञ्जलिर् | धर्म + भृत् | वरिष्ठः
पुण्यशीलः पितृवन्महात्मा; तपस्विभिर्धर्मपरैरुपेत्य प्रत्यर्चितः पुष्पधरस्य मूले; महाद्रुमस्योपविवेश राजा
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स | पुण्य + शील | पितृ + वत् | महात्मा | तपस्विभिर् | धर्म + पर | उपेत्य
प्रत्यर्चितः | पुष्प + धर | मूले | महत् + द्रुम + उपविश् | राजा
भीमश्च कृष्णा धनंजयश्च; यमौ ते चानुचरा नरेन्द्रम् विमुच्य वाहानवरुह्य सर्वे; तत्रोपतस्थुर्भरतप्रबर्हाः
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भीमश् | च | कृष्णा | च | धनंजयश् | च | यमौ | च | ते | च + अनुचर | नर + इन्द्र
विमुच्य | वाहान् | अवरुह्य | सर्वे | तत्र + उपस्था | भरत + प्रबर्ह
लतावतानावनतः पाण्डवै;र्महाद्रुमः पञ्चभिरुग्रधन्विभिः बभौ निवासोपगतैर्महात्मभि;र्महागिरिर्वारणयूथपैरिव
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लता + अवतान + अवनम् | स | पाण्डवैर् | महत् + द्रुम | पञ्चभिर् | उग्र + धन्विन्
बभौ | निवास + उपगम् | महात्मभिर् | महत् + गिरि | वारण + यूथप | इव