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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.21 (38 verses)
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Chapter 3.21

आनर्तनगरं मुक्तं ततोऽहमगमं तदा महाक्रतौ राजसूये निवृत्ते नृपते तव
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आनर्त + नगर | मुक्तं | ततो | ऽहम् | अगमं | तदा
महत् + क्रतु | राजसूये | निवृत्ते | नृपते | तव
अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम् निःस्वाध्यायवषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम्
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अपश्यं | द्वारकां | च + मद् | महत् + राज | हन् + त्विष्
निःस्वाध्यायवषट्कारां | निर्भूषण + वर + स्त्री
अनभिज्ञेयरूपाणि द्वारकोपवनानि दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम्
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अनभिज्ञेय + रूप | द्वारका + उपवन | च
दृष्ट्वा | शङ्का + उपपद् | ऽहम् | अपृच्छं | हृदिक + आत्मज
अस्वस्थनरनारीकमिदं वृष्णिपुरं भृशम् किमिदं नरशार्दूल श्रोतुमिच्छामहे वयम्
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अस्वस्थ + नर + नारीका | इदं | वृष्णि + पुर | भृशम्
प्राधान्य + अपि | नामानि | श्रोतुम् | इच्छामहे | वयम्
एवमुक्तस्तु मया विस्तरेणेदमब्रवीत् रोधं मोक्षं शाल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम
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एवम् | वच् + तु | स | मुनिर् | भार्यां | वचनम् | अब्रवीत्
रोधं | मोक्षं | च | शाल्वेन | हार्दिक्यो | राजन् + सत्तम
ततोऽहं कौरवश्रेष्ठ श्रुत्वा सर्वमशेषतः विनाशे शाल्वराजस्य तदैवाकरवं मतिम्
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ततो | ऽहं | कौरव + श्रेष्ठ | श्रुत्वा | सर्वम् | अशेषतः
विनाशे | शाल्व + राज | तदा + एव + कृ | मतिम्
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ समाश्वास्य पुरे जनम् राजानमाहुकं चैव तथैवानकदुन्दुभिम् सर्ववृष्णिप्रवीरांश्च हर्षयन्नब्रुवं तदा
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ततो | ऽहं | कौरव + श्रेष्ठ | श्रुत्वा | सर्वम् | अशेषतः
राजानम् | आहुकं | च + एव | तथा + एव + आनकदुन्दुभि
सर्व + वृष्णि + प्रवीर | च | हर्षयन्न् | अब्रुवं | तदा
अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः शाल्वराजविनाशाय प्रयातं मां निबोधत
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अप्रमादः | सदा | कार्यो | नगरे | यादव + ऋषभ
शाल्व + राजन् + विनाश | प्रयातं | मां | निबोधत
नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति सशाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टास्मि वः पुनः त्रिसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणी
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न + अहत्वा | तं | निवर्तिष्ये | पुरीं | द्वारवतीं | प्रति
सशाल्वं | सौभ + नगर | हत्वा | द्रष्टास्मि | वः | पुनः
त्रिसामा | हन्यताम् | एषा | दुन्दुभिः | शत्रु + भीषण
ते मयाश्वासिता वीरा यथावद्भरतर्षभ सर्वे मामब्रुवन्हृष्टाः प्रयाहि जहि शात्रवान्
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ते | मद् + आश्वासय् | वीरा | यथावद् | भरत + ऋषभ
सर्वे | माम् | अब्रुवन् | हृष्टाः | प्रयाहि | जहि | शात्रवान्
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान्प्रणम्य शिरसाहुकम्
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तैः | प्रहृष् + आत्मन् | वीरैर् | आशीर्भिर् | अभिनन्दितः
वाचयित्वा | द्विज + श्रेष्ठ | प्रणम्य | शिरस् + आहुक
सैन्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनानादयन्दिशः प्रध्माप्य शङ्खप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप
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सैन्य + सुग्रीव + संयुज् | रथं | तूर्णम् | इह + आनी
ततः | प्रध्माप्य | जल + ज | पाञ्चजन्यम् | अहं | नृप
प्रयातोऽस्मि नरव्याघ्र बलेन महता वृतः कॢप्तेन चतुरङ्गेण बलेन जितकाशिना
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ते | प्रयाता | नर + व्याघ्र | मात्रा | सह | परंतपाः
क्ᄆप्तेन | चतुरङ्गेण | बलेन | जि + काशिन्
समतीत्य बहून्देशान्गिरींश्च बहुपादपान् सरांसि सरितश्चैव मार्त्तिकावतमासदम्
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समतीत्य | बहून् | देशान् | गिरींश् | च | बहु + पादप
सरांसि | सरितश् | च + एव | मार्त्तिकावतम् | आसदम्
तत्राश्रौषं नरव्याघ्र शाल्वं नगरमन्तिकात् प्रयातं सौभमास्थाय तमहं पृष्ठतोऽन्वयाम्
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तत्र + श्रु | नर + व्याघ्र | शाल्वं | नगरम् | अन्तिकात्
प्रयातं | सौभम् | आस्थाय | तम् | अहं | पृष्ठतो | ऽन्वयाम्
ततः सागरमासाद्य कुक्षौ तस्य महोर्मिणः समुद्रनाभ्यां शाल्वोऽभूत्सौभमास्थाय शत्रुहन्
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ततः | सागरम् | आसाद्य | कुक्षौ | तस्य | महत् + ऊर्मिन्
समुद्र + नाभि | शाल्वो | ऽभूत् | सौभम् | आस्थाय | शत्रु + हन्
समालोक्य दूरान्मां स्मयन्निव युधिष्ठिर आह्वयामास दुष्टात्मा युद्धायैव मुहुर्मुहुः
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स | समालोक्य | दूर + मद् | स्मयन्न् | इव | युधिष्ठिर
आह्वयामास | दुष् + आत्मन् | युद्ध + एव | मुहुर् | मुहुः
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः पुरं नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत्
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तस्य | शार्ङ्ग + विनिर्मुच् | बहुभिर् | मर्मन् + भेदिन्
पुरं | न + आसादय् | शरैस् | ततो | मां | रोष | आविशत्
चापि पापप्रकृतिर्दैतेयापसदो नृप मय्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः
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स | च + अपि | पाप + प्रकृति | दैतेय + अपसद | नृप
मद् + वृष् | दुर्धर्षः | शर + धारा | सहस्रशः
सैनिकान्मम सूतं हयांश्च समवाकिरत् अचिन्तयन्तस्तु शरान्वयं युध्याम भारत
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सैनिकान् | मम | सूतं | च | हयांश् | च | समवाकिरत्
अचिन्तयन्तस् | तु | शरान् | वयं | युध्याम | भारत
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् चिक्षिपुः समरे वीरा मयि शाल्वपदानुगाः
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इदं | शत + सहस्र | हि | श्लोकानां | पुण्य + कर्मन्
चिक्षिपुः | समरे | वीरा | मयि | शाल्व + पद + अनुग
ते हयान्मे रथं चैव तदा दारुकमेव छादयामासुरसुरा बाणैर्मर्मविभेदिभिः
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ते | हयान् | मे | रथं | च + एव | तदा | दारुकम् | एव | च
छादयामासुर् | असुरा | बाणैर् | मर्मन् + विभेदिन्
हया रथो वीर यन्ता मम दारुकः अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाहं सैनिकाश्च मे
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न | हया | न | रथो | वीर | न | यन्ता | मम | दारुकः
अदृश्यन्त | शरैश् | छन्नास् | तथा + मद् | सैनिकाश् | च | मे
ततोऽहमपि कौरव्य शराणामयुतान्बहून् अभिमन्त्रितानां धनुषा दिव्येन विधिनाक्षिपम्
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ततो | ऽहम् | अपि | कौरव्य | शराणाम् | अयुतान् | बहून्
अभिमन्त्रितानां | धनुषा | दिव्येन | विधि + क्षिप्
तत्र विषयस्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत खे विषक्तं हि तत्सौभं क्रोशमात्र इवाभवत्
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न | तत्र | विषयस् | तु + अस् | मम | सैन्यस्य | भारत
खे | विषक्तं | हि | तत् | सौभं | क्रोश + मात्र | इव + भू
ततस्ते प्रेक्षकाः सर्वे रङ्गवाट इव स्थिताः हर्षयामासुरुच्चैर्मां सिंहनादतलस्वनैः
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ततस् + तद् | पार्थिवाः | सर्वे | समुत्पेतुर् | अमर्षिताः
हर्षयामासुर् | उच्चैर् | मां | सिंह + नाद + तल + स्वन
मत्कार्मुकविनिर्मुक्ता दानवानां महारणे अङ्गेषु रुधिराक्तास्ते विविशुः शलभा इव
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मद् + कार्मुक + विनिर्मुच् | दानवानां | महत् + रण
अङ्गेषु | रुधिर + अञ्ज् | ते | विविशुः | शलभा | इव
ततो हलहलाशब्दः सौभमध्ये व्यवर्धत वध्यतां विशिखैस्तीक्ष्णैः पततां महार्णवे
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ततो | हलहला + शब्द | संबभूव | समन्ततः
वध्यतां | विशिखैस् | तीक्ष्णैः | पततां | च | महत् + अर्णव
ते निकृत्तभुजस्कन्धाः कबन्धाकृतिदर्शनाः नदन्तो भैरवान्नादन्निपतन्ति स्म दानवाः
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ते | निकृत् + भुज + स्कन्ध | कबन्ध + आकृति + दर्शन
नदन्तो | भैरव + नाद + निपत् | स्म | दानवाः
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणेनाहमपूरयम्
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ततो | गोक्षीर + कुन्द + इन्दु + मृणाल + रजत + प्रभा
जल + ज | पाञ्चजन्यं | वै | प्राण + मद् | अपूरयम्
तान्दृष्ट्वा पतितांस्तत्र शाल्वः सौभपतिस्तदा मायायुद्धेन महता योधयामास मां युधि
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तां | तु + उपया | राजन् + इन्द्र | शाल्वः | सौभ + पति | तदा
माया + युद्ध | महता | योधयामास | मां | युधि
ततो हुडहुडाः प्रासाः शक्तिशूलपरश्वधाः पट्टिशाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रापतन्ननिशं मयि
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ततो | हुडहुडाः | प्रासाः | शक्ति + शूल + परश्वध
पट्टिशाश् | च | भुशुण्ड्यश् | च | प्रपत् + अनिशम् | मयि
तानहं माययैवाशु प्रतिगृह्य व्यनाशयम् तस्यां हतायां मायायां गिरिशृङ्गैरयोधयत्
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तान् | अहं | माया + एव + आशु | प्रतिगृह्य | व्यनाशयम्
तस्यां | हतायां | मायायां | गिरि + शृङ्ग | अयोधयत्
ततोऽभवत्तम इव प्रभातमिव चाभवत् दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतमुष्णं भारत
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ततो | ऽभवत् | तम | इव | प्रभातम् | इव | च + भू
दुर्दिनं | सुदिनं | च + एव | शीतम् | उष्णं | च | भारत
एवं मायां विकुर्वाणो योधयामास मां रिपुः विज्ञाय तदहं सर्वं माययैव व्यनाशयम् यथाकालं तु युद्धेन व्यधमं सर्वतः शरैः
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एवं | मायां | विकुर्वाणो | योधयामास | मां | रिपुः
विज्ञाय | तद् | अहं | सर्वं | माया + एव | व्यनाशयम्
यथाकालं | तु | युद्धेन | व्यधमं | सर्वतः | शरैः
ततो व्योम महाराज शतसूर्यमिवाभवत् शतचन्द्रं कौन्तेय सहस्रायुततारकम्
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ततो | व्योम | महत् + राज | शत + सूर्य | इव + भू
शत + चन्द्र | च | कौन्तेय | सहस्र + अयुत + तारक
ततो नाज्ञायत तदा दिवारात्रं तथा दिशः ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समयोजयम् ततस्तदस्त्रमस्त्रेण विधूतं शरतूलवत्
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ततो | न + ज्ञा | तदा | दिवारात्रं | तथा | दिशः
ततो | ऽहं | मोहम् | आपन्नः | प्रज्ञा + अस्त्र | समयोजयम्
ततस् | तद् | अस्त्रम् | अस्त्रेण | विधूतं | शर + तूल + वत्
तथा तदभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् लब्धालोकश्च राजेन्द्र पुनः शत्रुमयोधयम्
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एकस्य | च | बहूनां | च | तुमुलं | लोमन् + हर्षण
लभ् + आलोक | च | राजन् + इन्द्र | पुनः | शत्रुम् | अयोधयम्