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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.185 (54 verses)
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Chapter 3.185

ततः पाण्डवो भूयो मार्कण्डेयमुवाच कथयस्वेह चरितं मनोर्वैवस्वतस्य मे
Vaishampayana said: Then that son of Pandu (Yudhishthira) spoke thus to the Brahmana Markandeya, “narrate (to me) the history of Vaivasvata Manu.”
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ततः | स | पाण्डवो | भूयो | मार्कण्डेयम् | उवाच | ह
कथय् + इह | चरितं | मनोर् | वैवस्वतस्य | मे
विवस्वतः सुतो राजन्परमर्षिः प्रतापवान् बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः
Markandeya said : O king, O foremost of men, there was a mighty great Rishi; he was the son of Vivasvata and he was as effulgent as Prajapati.
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विवस्वतः | सुतो | राजन् | परम + ऋषि | प्रतापवान्
अमोघ + वीर्य | सतः | प्रजापति + सम + द्युति
ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा विशेषतः अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं पितामहम्
He far excelled his father and grand-father in prowess, in strength, in fortune and also in religious penances.
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ओजसा | तेजसा | लक्ष्म्या | तपसा | च | विशेषतः
अतिचक्राम | पितरं | मनुः | स्वं | च | पितामहम्
ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां नराधिपः एकपादस्थितस्तीव्रं चचार सुमहत्तपः
Standing on one leg and with uplifted arms, that chief of men performed severe asceticism in the extensive Badari.
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ऊर्ध्व + बाहु | विशालायां | बदर्यां | मधुसूदन
एक + पाद + स्था | तीव्रं | चचार | सु + महत् | तपः
अवाक्शिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा
With head downwards and with steadfast eyes he performed these severe austerities for ten thousand years.
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अवाक्शिरास् | तथा | च + अपि | नेत्रैर् | अनिमिषैर् | दृढम्
सो | ऽतप्यत | तपो | घोरं | वर्षाणाम् | अयुतं | तदा
तं कदाचित्तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् वीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमब्रवीत्
Once upon a time when he, with wet clothes on and with matted looks on his head, was performing such austerities, there came a fish on the banks of the Chirini and spoke to him thus.
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तं | कदाचित् | तपस्यन्तम् | आर्द्र + चीर + जटा + धर
वीरिणी + तीर | आगम्य | मत्स्यो | वचनम् | अब्रवीत्
भगवन्क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयं मम मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत
"O exalted one, I am a helpless little fish; I am afraid of the large ones; a vow-observing Rishi, you should extend your protection to me,
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भगवन् | क्षुद्र + मत्स्य | ऽस्मि | बलवद्भ्यो | भयं | मम
मत्स्येभ्यो | हि | ततो | मां | त्वं | त्रातुम् | अर्हसि | सुव्रत
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्यं मत्स्या विशेषतः भक्षयन्ति यथा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी
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दुर्बलं | बलवन्तो | हि | मत्स्यं | मत्स्या | विशेषतः
भक्षयन्ति | यथा | वृत्तिर् | विहिता | नः | सनातनी
तस्माद्भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव
Especially when this is the fixed custom amongst us that the big fishes prey upon the smaller ones. Therefore be pleased to save me from being drowned in the sea of terrors. I shall requite you for your help to me."
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तस्माद् | भय + ओघ | महतो | मज्जन्तं | मां | विशेषतः
त्रातुम् | अर्हसि | कर्तास्मि | कृते | प्रतिकृतं | तव
मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाभिपरिप्लुतः मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात्तं मत्स्यं पाणिना स्वयम्
Having heard these words of the fish, the Vaivasvata Manu was filled with pity and took out the fish from the water with his own hands.
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स | माम् | उवाच | तेजस्वी | कृपा + अभिपरिप्लु
मनुर् | वैवस्वतो | ऽगृह्णात् | तं | मत्स्यं | पाणिना | स्वयम्
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुः अलिञ्जरे प्राक्षिपत्स चन्द्रांशुसदृशप्रभम्
The fish which had a body as bright as the rays of the moon, after being taken out of the water, was again put back in an earthen water vessel.
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उदक + अन्त | उपानीय | मत्स्यं | वैवस्वतो | मनुः
अलिञ्जरे | प्राक्षिपत् | स | चन्द्र + अंशु + सदृश + प्रभा
तत्र ववृधे राजन्मत्स्यः परमसत्कृतः पुत्रवच्चाकरोत्तस्मिन्मनुर्भावं विशेषतः
O king, thus being reared, that fish grew in size and Manu carefully tended it as if were a child of his.
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स | तत्र | ववृधे | राजन् | मत्स्यः | परम + सत्कृ
पुत्र + वत् + च + कृ | तस्मिन् | मनुर् | भावं | विशेषतः
अथ कालेन महता मत्स्यः सुमहानभूत् अलिञ्जरे जले चैव नासौ समभवत्किल
After a long period of time that fish grew to be so large that there was no room for it in that vessel.
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अथ | कालेन | महता | स | मत्स्यः | सु + महत् | अभूत्
अलिञ्जरे | जले | च + एव | न + अदस् | समभवत् | किल
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत भगवन्साधु मेऽद्यान्यत्स्थानं संप्रतिपादय
Manu saw that the fish again spoke to him thus, “O exalted one, appoint a better habitation for me."
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अथ | मत्स्यो | मनुं | दृष्ट्वा | पुनर् | एव + अभिभाष्
भगवन् | साधु | मे | अद्य + अन्य | स्थानं | संप्रतिपादय
उद्धृत्यालिञ्जरात्तस्मात्ततः भगवान्मुनिः तं मत्स्यमनयद्वापीं महतीं मनुस्तदा
Then the exalted Manu, that conqueror of hostile cities, took it out of that vessel and carried it to a large tank and put it into its water).
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उद्धृ + आलिञ्जर | तस्मात् | ततः | स | भगवान् | मुनिः
तं | मत्स्यम् | अनयद् | वापीं | महतीं | स | मनुस् | तदा
तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय अथावर्धत मत्स्यः पुनर्वर्षगणान्बहून्
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तत्र | तं | प्रक्षिप् + च + अपि | मनुः | पर + पुरंजय
अथ + वृध् | मत्स्यः | स | पुनर् | वर्ष + गण | बहून्
द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम् तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन विचेष्टितुं वा कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशां पते
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द्वि + योजन + आयम् | वापी | विस्तृता | च + अपि | योजनम्
तस्यां | न + अदस् | समभवन् | मत्स्यो | राजीव + लोचन
विचेष्टितुं | वा | कौन्तेय | मत्स्यो | वाप्यां | विशां | पते
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत नय मां भगवन्साधो समुद्रमहिषीं प्रभो गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे
"O exalted one, O pious one, O sire, take me to the Ganga, the favourite wife of the Ocean or do what you think proper.
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अथ | मत्स्यो | मनुं | दृष्ट्वा | पुनर् | एव + अभिभाष्
नय | मां | भगवन् | साधो | समुद्रमहिषीं | प्रभो
गङ्गां | तत्र | निवत्स्यामि | यथा | वा | तात | मन्यसे
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद्भगवान्वशी नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः
Having been thus addressed, the up-right, continent and the adorable Manu took the fish to the river Ganga and put it into its water with his own hands.
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एवम् | उक्तो | मनुर् | मत्स्यम् | अनयद् | भगवान् | वशी
नदीं | गङ्गां | तत्र | च + एनद् | स्वयं | प्राक्षिपद् | अच्युतः
तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत्
O chastiser of foes, the fish there also began to grow for some time and then seeing Manu it spoke to him thus,
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स | तत्र | ववृधे | राजन् | मत्स्यः | परम + सत्कृ
स | तान् | दृष्ट्वा | परावृत्तान् | स्मयमान | इव + ब्रू
गङ्गायां हि शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति
"O lord, I am unable to move about in the Ganga on account of my huge body. Therefore, O exalted one, take me soon to the sea.”
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गङ्गायां | हि | न | शक्नोमि | बृहत् + त्व + चेष्ट् | प्रभो
समुद्रं | नय | माम् | आशु | प्रसीद | भगवन्न् | इति
उद्धृत्य गङ्गासलिलात्ततो मत्स्यं मनुः स्वयम् समुद्रमनयत्पार्थ तत्र चैनमवासृजत्
O son of Pritha, Manu took it out of the Ganga and carried it to the sea and put it there.
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उद्धृत्य | गङ्गा + सलिल | ततो | मत्स्यं | मनुः | स्वयम्
समुद्रम् | अनयत् | पार्थ | तत्र | च + एनद् | अवासृजत्
सुमहानपि मत्स्यः सन्स मनोर्मनसस्तदा आसीद्यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखश्च वै
Notwithstanding its huge size Manu easily carried it and its touch and smell were also pleasant to him.
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सु + महत् | अपि | मत्स्यः | सन् | स | मनोर् | मनसस् | तदा
आसीद् | यथेष्ट + हृ | च | स्पर्श + गन्ध + सुख | च | वै
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः मत्स्यो मनुना तदा तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत्
When that fish was thrown into the sea by Manu, it smilingly spoke these words to Manu,
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यदा | समुद्रे | प्रक्षिप्तः | स | मत्स्यो | मनुना | तदा
स्मित + पूर्वम् | इदं | वाक्यं | भीमसेनम् | अथ + ब्रू
भगवन्कृता हि मे रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः प्राप्तकालं तु यत्कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम
“O exalted one, you have protected me with special care; hear what you should do in the fullness of time.
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भगवन् | कृता | हि | मे | रक्षा | त्वया | सर्वा | विशेषतः
प्राप् + काल | तु | यत् | कार्यं | त्वया | तद् + श्रु | मम
अचिराद्भगवन्भौममिदं स्थावरजङ्गमम् सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति
O exalted one, O greatly blessed one; the dissolution of all this mobile and immobile world is now near at hand.
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अचिराद् | भगवन् | भौमम् | इदं | स्थावर + जङ्गम
सर्वम् | एव | महाभाग | प्रलयं | वै | गमिष्यति
संप्रक्षालनकालोऽयं लोकानां समुपस्थितः तस्मात्त्वां बोधयाम्यद्य यत्ते हितमनुत्तमम्
The proper time for purging off this earth is almost come; therefore I tell you what will be good for you.
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सम्प्रक्षालन + काल | ऽयं | लोकानां | समुपस्थितः
तस्मात् | त्वां | बोधय् + अद्य | यत् | ते | हितम् | अनुत्तमम्
त्रसानां स्थावराणां यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति तस्य सर्वस्य संप्राप्तः कालः परमदारुणः
The terrible doom has now come to the mobile and the immobile things of the creation, those that have locomotion and those that have not.
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त्वया | सृष्टम् | इदं | सर्वं | यद् + च + इङ्ग | यद् + च | न + इङ्ग्
तस्य | सर्वस्य | सम्प्राप्तः | कालः | परम + दारुण
नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटाकरा तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने
You should (at once) build a strong and huge ark and furnish it with a long rope. O great Rishis, get into it with the seven Rishis.
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नौश् | च | कारयितव्या | ते | दृढा | युज् + वटाकर
तत्र | सप्तर्षिभिः | सार्धम् | आरुहेथा | महत् + मुनि
बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि मया पुरा तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः
Take with you all the different seeds which were enumerated in the days of yore by the twice-born Brahmanas; and you must separately and carefully preserve them.
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बीजानि | च + एव | सर्वाणि | यथा + वच् | मया | पुरा
तस्याम् | आरोहयेर् | नावि | सु + संगुप् | भागशः
नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्तदा मुनिजनप्रिय आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस
O beloved of the Rishis, while remaining in that ark wait for me, and I shall appear to you in the shape of a homed animal. O ascetic, recognise me then.
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नौस्थ + च | मां | प्रतीक्षेथास् | तदा | मुनि + जन + प्रिय
आगम् + मद् | शृङ्गी | विज्ञेयस् | तेन | तापस
एवमेतत्त्वया कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम् नातिशङ्क्यमिदं चापि वचनं ते ममाभिभो
I now depart, you should act according to my instructions, for without my help, you cannot save yourself from the fearful flood.”
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एवम् | एतत् | त्वया | कार्यम् | आपृष्टो | ऽसि | व्रज् + मद्
न + अतिशङ्क् | इदं | च + अपि | वचनं | ते
एवं करिष्य इति तं मत्स्यं प्रत्यभाषत जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम्
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करिष्यसि | गतश् | च + अस् | यमस्य | सदनं | प्रति
गम् + च | यथाकामम् | अनुज्ञाप्य | परस्परम्
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा नावा तु शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम
O chastiser of foes, O hero, procured all the different seeds and set sail in an excellent vessel on the surging sea.
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ततो | मनुर् | महत् + राज | यथा + वच् | मत्स्यकेन | ह
बीज + आदा | सर्वाणि | सागरं | पुप्लुवे | तदा
नावा | तु | शुभया | वीर | महत् + ऊर्मिन् | अरिंदम
चिन्तयामास मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम
O ruler of earth, O conqueror of hostile cities, he thought of that fish and that fish also, knowing his thought,
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चिन्तयामास | च | मनुस् | तं | मत्स्यं | पृथिवीपते
स | च | तद् + चिन्तित | ज्ञात्वा | दर्शयामास | पावकम्
शृङ्गी | तत्र + आगम् + आशु | तदा | भरत + सत्तम
तं दृष्ट्वा मनुजेन्द्रेन्द्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम्
O best of the Bharata race, appeared there with horns in its head. O foremost of men, seeing in the ocean that fish with the horn emerging like a rock (as he was told before, he (Manu) threw the noose (made by the rope) on the head of that fish,
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तं | दृष्ट्वा | मनुज + इन्द्र | मनुर् | मत्स्यं | जल + अर्णव
शृङ्गिणं | तं | यथा + वच् | रूप + अद्रि | इव + उच्छ्रि
वटाकरमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिञ्शृङ्गे न्यवेशयत्
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वटाकर + मय | पाशम् | अथ | मत्स्यस्य | मूर्धनि
मनुर् | मनुज + शार्दूल | तद् + शृङ्ग | न्यवेशयत्
संयतस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरंजय वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि
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स | च | तद् + चिन्तित | ज्ञात्वा | मत्स्यः | पर + पुरंजय
वेगेन | महता | राजन्न् | अभ्यधावत | पार्षतम्
ततार तया नावा समुद्रं मनुजेश्वर नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा
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स | ततार | तया | नावा | समुद्रं | मनुज + ईश्वर
नृत्यमानम् | गर्जमानम् | इव + अम्भस्
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन्महोदधौ घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरंजय
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क्षोभ्यमाणा | महत् + वात | सा | नौस् | तस्मिन् | महोदधौ
घूर्णते | चपल + इव | स्त्री | मत्ता | पर + पुरंजय
नैव भूमिर्न दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे सर्वमाम्भसमेवासीत्खं द्यौश्च नरपुंगव
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न + एव | भूमिर् | न | च | दिशः | प्रदिशो | वा | चकाशिरे
सर्वम् | आम्भसम् | एव + अस् | खं | द्यौश् | च | नर + पुंगव
एवंभूते तदा लोके संकुले भरतर्षभ अदृश्यन्त सप्तर्षयो मनुर्मत्स्यः सहैव
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एवंभूते | तदा | लोके | संकुले | भरत + ऋषभ
अदृश्यन्त | सप्तर्षयो | मनुर् | मत्स्यः | सह + एव | ह
एवं बहून्वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन्सलिलसंचये
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एवं | बहून् | वर्ष + गण | तां | नावं | सो | ऽथ | मत्स्यकः
कृष् + अतन्द्रित | राजंस् | तस्मिन् | सलिल + संचय
ततो हिमवतः शृङ्गं यत्परं पुरुषर्षभ तत्राकर्षत्ततो नावं मत्स्यः कुरुनन्दन
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ततो | भीमः | शनैर् | भुक्त्वा | तद् + अन्न | पुरुष + ऋषभ
तत्र + कृष् | ततो | नावं | स | मत्स्यः | कुरु + नन्दन
ततोऽब्रवीत्तदा मत्स्यस्तानृषीन्प्रहसञ्शनैः अस्मिन्हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत माचिरम्
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ततो | ऽब्रवीत् | तदा | मत्स्यस् | तान् | ऋषीन् | प्रहस् + शनैस्
अस्मिन् | हिमवतः | शृङ्गे | नावं | बध्नीत | माचिरम्
सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा
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सा | बद्धा | तत्र | तैस् | तूर्णम् | ऋषिभिर् | भरत + ऋषभ
नौर् | मत्स्यस्य | वचः | श्रुत्वा | शृङ्गे | हिमवतस् | तदा
तच्च नौबन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद्विद्धि भरतर्षभ
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तद् + च | नौबन्धनं | नाम | शृङ्गं | हिमवतः | परम्
तेभ्यो | राजन् + सहस्र + तद् | विद्धि | भरत + ऋषभ
अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन्सहितांस्तदा अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते मत्स्यरूपेण यूयं मयास्मान्मोक्षिता भयात्
“I am the Lord of creatures, Brahma; none is greater than myself. In ihe form of a fish I have saved you from this fear.
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अथ + ब्रू | अनिमिषस् | तान् | ऋषीन् | सहितांस् | तदा
अहं | प्रजापतिर् | ब्रह्मा | मद् + पर | न + अधिगम्
मत्स्य + रूप | यूयं | च | मद् + इदम् | मोक्षिता | भयात्
मनुना प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति
Manu will create all beings, gods Asuras and men and all those who have power of locomotion and who have not.
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मनुना | च | प्रजाः | सर्वाः | स + देव + असुर + मानव
त्वया | सृष्टम् | इदं | सर्वं | यद् + च + इङ्ग | यद् + च | न + इङ्ग्
तपसा चातितीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति मत्प्रसादात्प्रजासर्गे मोहं गमिष्यति
By practising severe asceticism, he will acquire this power. With my blessings, illusion will have no power over him."
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तपसा | च + अति + तीव्र | प्रतिभा + इदम् | भविष्यति
मद् + प्रसाद | प्रजा + सर्ग | न | च | मोहं | गमिष्यति
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् प्रमूढोऽभूत्प्रजासर्गे तपस्तेपे महत्ततः
Having said this, the fish disappeared in a moment. Vaivasvata Manu also became esirous of creating the creatures.
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इति + वच् | फल्गुनं | शक्रो | गम् + अदर्शन | ततः
स्रष्टु + काम | प्रजा + च + अपि | मनुर् | वैवस्वतः | स्वयम्
प्रमूढो | ऽभूत् | प्रजा + सर्ग | तपस् | तेपे | महत् | ततः
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद्यथावद्भरतर्षभ
In this work of creation, illusion overtook him: he therefore performed great asceticism, Having obtained ascetic success, O best of the Bharata race, Manu again took up the work of creation in proper and exact order. I have thus narrated to you the old story called the Legend of the Fish.
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सभा + मध्य | समाक्षिप्य | व्यपक्रष्टुं | प्रचक्रमे
सर्वाः | प्रजा | मनुः | साक्षाद् | यथावद् | भरत + ऋषभ
इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया
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इति + एतद् | मात्स्यकं | नाम | पुराणं | परिकीर्तितम्
आख्यानम् | इदम् | आख्यातं | सर्व + पाप + हर | मया
इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः सुखी सर्वसिद्धार्थः स्वर्गलोकमियान्नरः
He who every day hears this old history of Manu obtains all happiness and all other objects of desires and goes to heaven.
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य | इदं | शृणुयान् | नित्यं | मनोश् | चरितम् | आदितः
स | सुखी | सर्व + सिध् + अर्थ | स्वर्ग + लोक | इयान् | नरः