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Currently viewing: Parva 2 - Chapter 2.68 (46 verses)
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Chapter 2.68

वनवासाय चक्रुस्ते मतिं पार्थाः पराजिताः अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्च यथाक्रमम्
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वन + वास | कृ + तद् | मतिं | पार्थाः | पराजिताः
अजिन + उत्तरीय | ग्रह् + च | यथाक्रमम्
अजिनैः संवृतान्दृष्ट्वा हृतराज्यानरिंदमान् प्रस्थितान्वनवासाय ततो दुःशासनोऽब्रवीत्
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अजिनैः | संवृतान् | दृष्ट्वा | हृ + राज्य | अरिंदमान्
वनं | तु | प्रस्थितं | रामं | भरद्वाज + सुत | ऽब्रवीत्
प्रवृत्तं धार्तराष्ट्रस्य चक्रं राज्ञो महात्मनः पराभूताः पाण्डुपुत्रा विपत्तिं परमां गताः
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राजन् + च | धृतराष्ट्रस्य | द्रोणस्य | च | महात्मनः
पराभूताः | पाण्डु + पुत्र | विपत्तिं | परमां | गताः
अद्य देवाः संप्रयाताः समैर्वर्त्मभिरस्थलैः गुणज्येष्ठास्तथा ज्येष्ठा भूयांसो यद्वयं परैः
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अद्य | देवाः | सम्प्रयाताः | समैर् | वर्त्मभिर् | अ + स्थल
गुण + ज्येष्ठ + तथा | ज्येष्ठा | भूयांसो | यद् | वयं | परैः
नरकं पातिताः पार्था दीर्घकालमनन्तकम् सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः
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नरकं | पातिताः | पार्था | दीर्घ + काल | अनन्तकम्
सुख + च | हीना | राज्य + च | विनष्टाः | शाश्वतीः | समाः
बलेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान्प्रहासिषुः ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवाः
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बलेन | मत्ता | ये | ते | स्म | धार्तराष्ट्रान् | प्रहासिषुः
ते | निर्जिता | हृ + धन | वनम् | एष्यन्ति | पाण्डवाः
चित्रान्संनाहानवमुञ्चन्तु चैषां; वासांसि दिव्यानि भानुमन्ति निवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे; यथा ग्लहं सौबलस्याभ्युपेताः
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चित्रान् | संनाहान् | अवमुञ्चन्तु | च + इदम् | वासांसि | दिव्यानि | च | भानुमन्ति
निवास्यन्तां | रुरु + चर्मन् | सर्वे | यथा | ग्लहं | सौबल + अभ्युपे
सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा; इत्येव ये भावितबुद्धयः सदा ज्ञास्यन्ति तेऽऽत्मानमिमेऽद्य पाण्डवा; विपर्यये षण्ढतिला इवाफलाः
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न | सन्ति | लोकेषु | पुमांस | ईदृशा | इति + एव | ये | भावय् + बुद्धि | सदा
ज्ञास्यन्ति | ते | ऽऽत्मानम् | इमे | ऽद्य | पाण्डवा | विपर्यये | षण्ढतिला | इव + अफल
अयं हि वासोदय ईदृशानां; मनस्विनां कौरव मा भवेद्वः अदीक्षितानामजिनानि यद्व;द्बलीयसां पश्यत पाण्डवानाम्
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अयं | हि | वास + उदय | ईदृशानां | मनस्विनां | कौरव | मा | भवेद् | वः
अ + दीक्षित | अजिनानि | यद्वद् | बलीयसां | पश्यत | पाण्डवानाम्
महाप्राज्ञः सोमको यज्ञसेनः; कन्यां पाञ्चालीं पाण्डवेभ्यः प्रदाय अकार्षीद्वै दुष्कृतं नेह सन्ति; क्लीबाः पार्थाः पतयो याज्ञसेन्याः
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महत् + प्राज्ञ | सोमको | यज्ञसेनः | कन्यां | पाञ्चालीं | पाण्डवेभ्यः | प्रदाय
अकार्षीद् | वै | दुष्कृतं | न + इह | सन्ति | क्लीबाः | पार्थाः | पतयो | याज्ञसेन्याः
सूक्ष्मान्प्रावारानजिनानि चोदिता;न्दृष्ट्वारण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान् कां त्वं प्रीतिं लप्स्यसे याज्ञसेनि; पतिं वृणीष्व यमिहान्यमिच्छसि
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सूक्ष्मान् | प्रावारान् | अजिनानि | चोदितान् | दृश् + अरण्य | निर्धनान् | अप्रतिष्ठान्
कां | त्वं | प्रीतिं | लप्स्यसे | याज्ञसेनि | पतिं | वृणीष्व | यम् | इह + अन्य | इच्छसि
एते हि सर्वे कुरवः समेताः; क्षान्ता दान्ताः सुद्रविणोपपन्नाः एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे; त्वां तपेत्कालविपर्ययोऽयम्
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एते | हि | सर्वे | कुरवः | समेताः | क्षान्ता | दान्ताः | सु + द्रविण + उपपद्
एषां | वृ + एकतम | पति + त्व | न | त्वां | तपेत् | काल + विपर्यय | ऽयम्
यथाफलाः षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगाः तथैव पाण्डवाः सर्वे यथा काकयवा अपि
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यथा + अफल | षण्ढतिला | यथा | चर्मन् + मय | मृगाः
तथा + एव | पाण्डवाः | सर्वे | यथा | काकयवा | अपि
किं पाण्डवांस्त्वं पतितानुपास्से; मोघः श्रमः षण्ढतिलानुपास्य एवं नृशंसः परुषाणि पार्था;नश्रावयद्धृतराष्ट्रस्य पुत्रः
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किं | पाण्डव + त्वद् | पतितान् | उपास्से | मोघः | श्रमः | षण्ढतिलान् | उपास्य
एवं | नृशंसः | परुषाणि | पार्थान् | अश्रावयद् | धृतराष्ट्रस्य | पुत्रः
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी; निर्भर्त्स्योच्चैस्तं निगृह्यैव रोषात् उवाचेदं सहसैवोपगम्य; सिंहो यथा हैमवतः शृगालम्
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तद् | वै | श्रुत्वा | भीमसेनो | अति + अमर्षिन् | भृशं | निशश्वास | तदा + आर्त + रूप
वच् + इदम् | सहस् + एव + उपगम् | सिंहो | यथा | हैमवतः | शृगालम्
क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे गान्धारविद्यया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे
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क्रूर | पाप + जन | जुष्टम् | अकृतार्थं | प्रभाषसे
गान्धार + विद्या | हि | त्वं | राजन् + मध्य | विकत्थसे
यथा तुदसि मर्माणि वाक्शरैरिह नो भृशम् तथा स्मारयिता तेऽहं कृन्तन्मर्माणि संयुगे
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यथा | तुदसि | मर्माणि | वाच् + शर | इह | नो | भृशम्
तथा | स्मारयिता | ते | ऽहं | कृत् + मर्मन् | संयुगे
ये त्वामनुवर्तन्ते कामलोभवशानुगाः गोप्तारः सानुबन्धांस्तान्नेष्यामि यमसादनम्
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ये | च | त्वाम् | अनुवर्तन्ते | काम + लोभ + वश + अनुग
गोप्तारः | स + अनुबन्ध + तद् + नी | यम + सादन
एवं ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं; दुःखाभिभूतं परिनृत्यति स्म मध्ये कुरूणां धर्मनिबद्धमार्गं; गौर्गौरिति स्माह्वयन्मुक्तलज्जः
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एवं | ब्रुवाणम् | अजिनैर् | विवासितं | दुःख + अभिभू | परिनृत्यति | स्म
मध्ये | कुरूणां | धर्म + निबन्ध् + मार्ग | गौर् | गौर् | इति | स्म + आह्वा + मुच् + लज्जा
नृशंसं परुषं क्रूरं शक्यं दुःशासन त्वया निकृत्या हि धनं लब्ध्वा को विकत्थितुमर्हति
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नृशंसं | परुषं | क्रूरं | शक्यं | दुःशासन | त्वया
निकृत्या | हि | धनं | लब्ध्वा | को | विकत्थितुम् | अर्हति
मा स्म सुकृताँल्लोकान्गच्छेत्पार्थो वृकोदरः यदि वक्षसि भित्त्वा ते पिबेच्छोणितं रणे
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मा | ह | स्म | सु + कृ | लोकान् | गच्छेत् | पार्थो | वृकोदरः
यदि | वक्षसि | भित्त्वा | ते | न | पा + शोणित | रणे
धार्तराष्ट्रान्रणे हत्वा मिषतां सर्वधन्विनाम् शमं गन्तास्मि नचिरात्सत्यमेतद्ब्रवीमि वः
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धार्तराष्ट्रा | हि | हीयन्ते | पार्था | वर्धन्ति | नित्यशः
शमं | गन्तास्मि | नचिरात् | सत्यम् | एतद् | ब्रवीमि | वः
तस्य राजा सिंहगतेः सखेलं; दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् गतिं स्वगत्यानुचकार मन्दो; निर्गच्छतां पाण्डवानां सभायाः
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तस्य | राजा | सिंह + गति | स + खेल | दुर्योधनो | भीमसेनस्य | हर्षात्
गतिं | स्व + गति + अनुकृ | मन्दो | निर्गच्छतां | पाण्डवानां | सभायाः
नैतावता कृतमित्यब्रवीत्तं; वृकोदरः संनिवृत्तार्धकायः शीघ्रं हि त्वा निहतं सानुबन्धं; संस्मार्याहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ
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न + एतावत् | कृतम् | इति + ब्रू | तं | वृकोदरः | संनिवृत् + अर्ध + काय
शीघ्रं | हि | त्वा | निहतं | स + अनुबन्ध | संस्मारय् + मद् | प्रतिवक्ष्यामि | मूढ
एतत्समीक्ष्यात्मनि चावमानं; नियम्य मन्युं बलवान्स मानी राजानुगः संसदि कौरवाणां; विनिष्क्रमन्वाक्यमुवाच भीमः
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एतत् | समीक्ष् + आत्मन् | च + अवमान | नियम्य | मन्युं | बलवान् | स | मानी
राजन् + अनुग | संसदि | कौरवाणां | विनिष्क्रमन् | वाक्यम् | उवाच | भीमः
अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनंजयः शकुनिं चाक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति
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अहं | दुर्योधनं | हन्ता | कर्णं | हन्ता | धनंजयः
शकुनिं | च + अक्ष + कितव | सहदेवो | हनिष्यति
इदं भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद्वचः सत्यं देवाः करिष्यन्ति यन्नो युद्धं भविष्यति
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इदं | च | भूयो | वक्ष्यामि | सभा + मध्य | बृहद् | वचः
सत्यं | देवाः | करिष्यन्ति | यत् + मद् | युद्धं | भविष्यति
सुयोधनमिमं पापं हन्तास्मि गदया युधि शिरः पादेन चास्याहमधिष्ठास्यामि भूतले
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सुयोधनम् | इमं | पापं | हन्तास्मि | गदया | युधि
शिरः | पादेन | च + इदम् + मद् | अधिष्ठास्यामि | भू + तल
वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः दुःशासनस्य रुधिरं पातास्मि मृगराडिव
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न | तु | तुष्यति | यद् + एतद् | पुरुषस्य | दुरात्मनः
दुःशासनस्य | रुधिरं | पातास्मि | मृगराड् | इव
नैव वाचा व्यवसितं भीम विज्ञायते सताम् इतश्चतुर्दशे वर्षे द्रष्टारो यद्भविष्यति
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न + एव | वाचा | व्यवसितं | भीम | विज्ञायते | सताम्
इतस् + चतुर्दश | वर्षे | द्रष्टारो | यद् | भविष्यति
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम्
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एवं | दुर्योधनः | कर्णः | शकुनि + च + अपि | सौबलः
दुःशासन + चतुर्थ | भूमिः | पास्यति | शोणितम्
असूयितारं वक्तारं प्रस्रष्टारं दुरात्मनाम् भीमसेन नियोगात्ते हन्ताहं कर्णमाहवे
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असूयितारं | वक्तारं | प्रस्रष्टारं | दुरात्मनाम्
भीमसेन | नियोगात् | ते | हन् + मद् | कर्णम् | आहवे
अर्जुनः प्रतिजानीते भीमस्य प्रियकाम्यया कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्तास्मि पत्रिभिः
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अर्जुनः | प्रतिजानीते | भीमस्य | प्रिय + काम्या
कर्णं | कर्ण + अनुग + च + एव | रणे | हन्तास्मि | पत्रिभिः
ये चान्ये प्रतियोत्स्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः तांश्च सर्वाञ्शितैर्बाणैर्नेतास्मि यमसादनम्
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ये | च + अन्य | प्रतियोत्स्यन्ति | बुद्धि + मोह | मां | नृपाः
तद् + च | सर्वाञ् | शितैर् | बाणैर् | नेतास्मि | यम + सादन
चलेद्धि हिमवान्स्थानान्निष्प्रभः स्याद्दिवाकरः शैत्यं सोमात्प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद्यदि
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चल् + हि | हिमवान् | स्थान + निष्प्रभ | स्याद् | दिवाकरः
शैत्यं | सोमात् | प्रणश्येत | मद् + सत्य | विचलेद् | यदि
प्रदास्यति चेद्राज्यमितो वर्षे चतुर्दशे दुर्योधनो हि सत्कृत्य सत्यमेतद्भविष्यति
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न | प्रदास्यति | चेद् | राज्यम् | इतो | वर्षे | चतुर्दशे
दुर्योधनो | हि | सत्कृत्य | सत्यम् | एतद् | भविष्यति
इत्युक्तवति पार्थे तु श्रीमान्माद्रवतीसुतः प्रगृह्य विपुलं बाहुं सहदेवः प्रतापवान्
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इति + वच् | पार्थे | तु | श्रीमत् + माद्रवती + सुत
न्यवर्तत | ततो | धीमान् | सहदेवः | प्रतापवान्
सौबलस्य वधं प्रेप्सुरिदं वचनमब्रवीत् क्रोधसंरक्तनयनो निःश्वसन्निव पन्नगः
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भार्यां | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
कोप + संरञ्ज् + नयन | प्रज्वलन्न् | इव | मन्युना
अक्षान्यान्मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहर नैतेऽक्षा निशिता बाणास्त्वयैते समरे वृताः
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अक्षान् | यद् + मन् | मूढ | गान्धाराणां | यशस् + हर
न + एतद् | ऽक्षा | निशिता | बाण + त्वद् + एतद् | समरे | वृताः
यथा चैवोक्तवान्भीमस्त्वामुद्दिश्य सबान्धवम् कर्ताहं कर्मणस्तस्य कुरु कार्याणि सर्वशः
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यथा | च + एव + वच् | भीम + त्वद् | उद्दिश्य | स + बान्धव
ततस् + तद् | तदा | राजा | पितृकार्याणि | सर्वशः
हन्तास्मि तरसा युद्धे त्वां विक्रम्य सबान्धवम् यदि स्थास्यसि संग्रामे क्षत्रधर्मेण सौबल
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हन्तास्मि | तरसा | युद्धे | त्वां | विक्रम्य | स + बान्धव
यदि | स्थास्यसि | संग्रामे | क्षत्र + धर्म | सौबल
सहदेववचः श्रुत्वा नकुलोऽपि विशां पते दर्शनीयतमो नॄणामिदं वचनमब्रवीत्
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सहदेव + वचस् | श्रुत्वा | नकुलो | ऽपि | विशां | पते
मूर्ध्ना | प्रणम्य | चरण + इदम् | वचनम् | अब्रवीत्
सुतेयं यज्ञसेनस्य द्यूतेऽस्मिन्धृतराष्ट्रजैः यैर्वाचः श्राविता रूक्षाः स्थितैर्दुर्योधनप्रिये
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सुता + इदम् | यज्ञसेनस्य | द्यूते | ऽस्मिन् | धृतराष्ट्र + ज
यैर् | वाचः | श्राविता | रूक्षाः | स्थितैर् | दुर्योधन + प्रिय
तान्धार्तराष्ट्रान्दुर्वृत्तान्मुमूर्षून्कालचोदितान् दर्शयिष्यामि भूयिष्ठमहं वैवस्वतक्षयम्
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तान् | धार्तराष्ट्रान् | दुर्वृत्त + मुमूर्षु | काल + चोदय्
तस्मात् | तम् | अनुयास्यामि | यान्तं | वैवस्वत + क्षय
निदेशाद्धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन् निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि नचिरादिव
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निदेशाद् | धर्मराजस्य | द्रौपद्याः | पदवीं | चरन्
निर्धार्तराष्ट्रां | पृथिवीं | कर्तास्मि | नचिराद् | इव
एवं ते पुरुषव्याघ्राः सर्वे व्यायतबाहवः प्रतिज्ञा बहुलाः कृत्वा धृतराष्ट्रमुपागमन्
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तत्र | ते | पुरुष + व्याघ्र | विविशुः | स + परिच्छद
प्रतिज्ञां | महतीं | कृत्वा | तीर्णः | श्रीपति + माया