Vidya Kendra
Mahābhārata
Home Introduction Reader Glossary All Resources
Vidyakendra
Vidyakendra Home

Navigate to Verse

Currently viewing: Parva 2 - Chapter 2.59 (12 verses)
Powered by Aksharamukha

Search Mahābhārata

Try searching for: dharma, युद्ध, Arjuna, 1.1.5 (verse reference)
Quick Navigation: Start Browse Parvas
❖ ❖ ❖

Chapter 2.59

एहि क्षत्तर्द्रौपदीमानयस्व; प्रियां भार्यां संमतां पाण्डवानाम् संमार्जतां वेश्म परैतु शीघ्र;मानन्दो नः सह दासीभिरस्तु
View Padaccheda
एहि | क्षत्तर् | द्रौपदीम् | आनयस्व | प्रियां | भार्यां | संमतां | पाण्डवानाम्
संमार्जतां | वेश्म | परैतु | शीघ्रम् | आनन्दो | नः | सह | दासीभिर् | अस्तु
दुर्विभाव्यं भवति त्वादृशेन; मन्द संबुध्यसि पाशबद्धः प्रपाते त्वं लम्बमानो वेत्सि; व्याघ्रान्मृगः कोपयसेऽतिबाल्यात्
View Padaccheda
दुर्विभाव्यं | भवति | त्वादृशेन | न | मन्द | संबुध्यसि | पाश + बन्ध्
प्रपाते | त्वं | लम्बमानो | न | वेत्सि | व्याघ्र + मृग | कोपयसे | अति + बाल्य
आशीविषाः शिरसि ते पूर्णकोशा महाविषाः मा कोपिष्ठाः सुमन्दात्मन्मा गमस्त्वं यमक्षयम्
View Padaccheda
आशीविषाः | शिरसि | ते | पृ + कोश | महत् + विष
मुञ्च | वा | नृपतीन् | सर्व + मा | गम् + त्वद् | यम + क्षय
हि दासीत्वमापन्ना कृष्णा भवति भारत अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्तेति मे मतिः
View Padaccheda
न | हि | दासी + त्व | आपन्ना | कृष्णा | भवति | भारत
अनीशेन | हि | राजन् + एतद् | पणे | न्यस् + इति | मे | मतिः
अयं धत्ते वेणुरिवात्मघाती; फलं राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रः द्यूतं हि वैराय महाभयाय; पक्वो बुध्यत्ययमन्तकाले
View Padaccheda
के | तत्र + अन्य | कितवा | दीव्यमाना | विना | राज्ञो | धृतराष्ट्रस्य | पुत्रैः
द्यूतं | हि | वैराय | महत् + भय | पक्वो | न | बुध् + इदम् | अन्त + काल
नारुंतुदः स्यान्न नृशंसवादी; हीनतः परमभ्याददीत ययास्य वाचा पर उद्विजेत; तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम्
View Padaccheda
नारुंतुदः | स्यान् | न | नृशंस + वादिन् | न | हीनतः | परम् | अभ्याददीत
यद् + इदम् | वाचा | पर | उद्विजेत | न | तां | वदेद् | रुशतीं | पाप + लोक्य
समुच्चरन्त्यतिवादा हि वक्त्रा;द्यैराहतः शोचति रात्र्यहानि परस्य नामर्मसु ते पतन्ति; तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु
View Padaccheda
अतिवादा | वक्त्रतो | निःसरन्ति | यैर् | आहतः | शोचति | रात्रि + अहर्
परस्य | वै | मर्मसु | ये | पतन्ति | तान् | पण्डितो | न + अवसृज् | परेषु
अजो हि शस्त्रमखनत्किलैकः; शस्त्रे विपन्ने पद्भिरपास्य भूमिम् निकृन्तनं स्वस्य कण्ठस्य घोरं; तद्वद्वैरं मा खनीः पाण्डुपुत्रैः
View Padaccheda
अजो | हि | शस्त्रम् | अखनत् | किल + एक | शस्त्रे | विपन्ने | पद्भिर् | अपास्य | भूमिम्
निकृन्तनं | स्वस्य | कण्ठस्य | घोरं | तद्वद् | वैरं | मा | खनीः | पाण्डु + पुत्र
किंचिदीड्यं प्रवदन्ति पापं; वनेचरं वा गृहमेधिनं वा तपस्विनं संपरिपूर्णविद्यं; भषन्ति हैवं श्वनराः सदैव
View Padaccheda
न | किंचिद् | ईड्यं | प्रवदन्ति | पापं | वनेचरं | वा | गृहमेधिनं | वा
तपस्विनं | संपरिपृ + विद्या | भषन्ति | ह + एवम् | श्वनराः | सदा + एव
द्वारं सुघोरं नरकस्य जिह्मं; बुध्यसे धृतराष्ट्रस्य पुत्र त्वामन्वेतारो बहवः कुरूणां; द्यूतोदये सह दुःशासनेन
View Padaccheda
द्वारं | सु + घोर | नरकस्य | जिह्मं | न | बुध्यसे | धृतराष्ट्रस्य | पुत्र
त्वाम् | अन्वेतारो | बहवः | कुरूणां | द्यूत + उदय | सह | दुःशासनेन
मज्जन्त्यलाबूनि शिलाः प्लवन्ते; मुह्यन्ति नावोऽम्भसि शश्वदेव मूढो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो; मे वाचः पथ्यरूपाः शृणोति
View Padaccheda
मज्ज् + अलाबु | शिलाः | प्लवन्ते | मुह्यन्ति | नावो | ऽम्भसि | शश्वद् | एव
मूढो | राजा | धृतराष्ट्रस्य | पुत्रो | न | मे | वाचः | पथ्य + रूप | शृणोति
अन्तो नूनं भवितायं कुरूणां; सुदारुणः सर्वहरो विनाशः वाचः काव्याः सुहृदां पथ्यरूपा; श्रूयन्ते वर्धते लोभ एव
View Padaccheda
अन्तो | नूनं | भू + इदम् | कुरूणां | सु + दारुण | सर्व + हर | विनाशः
वाचः | काव्याः | सुहृदां | पथ्य + रूप | न | श्रूयन्ते | वर्धते | लोभ | एव