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Currently viewing: Parva 2 - Chapter 2.58 (43 verses)
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Chapter 2.58

बहु वित्तं पराजैषीः पाण्डवानां युधिष्ठिर आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय यदि तेऽस्त्यपराजितम्
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कथं | काल + वश | प्राप्तः | पाण्डवेयो | युधिष्ठिरः
आचक्ष्व | वित्तं | कौन्तेय | यदि | ते | अस् + अपराजित
मम वित्तमसंख्येयं यदहं वेद सौबल अथ त्वं शकुने कस्माद्वित्तं समनुपृच्छसि
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मम | वित्तम् | असंख्येयं | यद् | अहं | वेद | सौबल
अथ | त्वं | शकुने | कस्माद् | वित्तं | समनुपृच्छसि
अयुतं प्रयुतं चैव खर्वं पद्मं तथार्बुदम् शङ्खं चैव निखर्वं समुद्रं चात्र पण्यताम् एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया
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अयुतं | प्रयुतं | च + एव | खर्वं | पद्मं | तथा + अर्बुद
शङ्खं | च + एव | निखर्वं | च | समुद्रं | च + अत्र | पण्यताम्
एतद् | राजन् | धनं | मह्यं | तेन | दीव् + मद् | त्वया
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
गवाश्वं बहुधेनूकमसंख्येयमजाविकम् यत्किंचिदनुवर्णानां प्राक्सिन्धोरपि सौबल एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया
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गवाश्वं | बहु + धेनूक | असंख्येयम् | अजाविकम्
यत् | किंचिद् | अनुवर्णानां | प्राक् | सिन्धोर् | अपि | सौबल
एतद् | राजन् | धनं | मह्यं | तेन | दीव् + मद् | त्वया
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
पुरं जनपदो भूमिरब्राह्मणधनैः सह अब्राह्मणाश्च पुरुषा राजञ्शिष्टं धनं मम एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वया
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पुरं | जनपदो | भूमिर् | अ + ब्राह्मण + धन | सह
अ + ब्राह्मण + च | पुरुषा | राजञ् | शिष्टं | धनं | मम
एतद् | राजन् | धनं | मह्यं | तेन | दीव् + मद् | त्वया
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
राजपुत्रा इमे राजञ्शोभन्ते येन भूषिताः कुण्डलानि निष्काश्च सर्वं चाङ्गविभूषणम् एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया
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राजन् + पुत्र | इमे | राजञ् | शोभन्ते | येन | भूषिताः
कुण्डलानि | च | निष्क + च | सर्वं | च + अङ्ग + विभूषण
एतद् | राजन् | धनं | मह्यं | तेन | दीव् + मद् | त्वया
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
श्यामो युवा लोहिताक्षः सिंहस्कन्धो महाभुजः नकुलो ग्लह एको मे यच्चैतत्स्वगतं धनम्
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अयं | श्यामो | महत् + बाहु | सिंह + स्कन्ध | महत् + द्युति
नकुलो | ग्लह | एको | मे | यद् + च + एतद् | स्वगतं | धनम्
प्रियस्ते नकुलो राजन्राजपुत्रो युधिष्ठिर अस्माकं धनतां प्राप्तो भूयस्त्वं केन दीव्यसि
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अपि + इदम् | गुणवान् | पुत्र | राजन् + पुत्र | भविष्यति
अस्माकं | धन + ता | प्राप्तो | भूयस् + त्वद् | केन | दीव्यसि
एवमुक्त्वा तु शकुनिस्तानक्षान्प्रत्यपद्यत जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एवम् | उक्त्वा | तु | शकुनि + तद् | अक्षान् | प्रत्यपद्यत
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
अयं धर्मान्सहदेवोऽनुशास्ति; लोके ह्यस्मिन्पण्डिताख्यां गतश्च अनर्हता राजपुत्रेण तेन; त्वया दीव्याम्यप्रियवत्प्रियेण
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अयं | धर्मान् | सहदेवो | ऽनुशास्ति | लोके | हि + इदम् | पण्डित + आख्या | गम् + च
अन् + अर्ह् | राजन् + पुत्र | तेन | त्वया | दीव् + अप्रिय + वत् | प्रियेण
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
माद्रीपुत्रौ प्रियौ राजंस्तवेमौ विजितौ मया गरीयांसौ तु ते मन्ये भीमसेनधनंजयौ
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माद्री + पुत्र | प्रियौ | राजन् + त्वद् + इदम् | विजितौ | मया
तु | ते | मन्ये | भीमसेन + धनंजय
अधर्मं चरसे नूनं यो नावेक्षसि वै नयम् यो नः सुमनसां मूढ विभेदं कर्तुमिच्छसि
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अधर्मं | चरसे | नूनं | यो | न + अवेक्ष् | वै | नयम्
यो | नः | सु + मनस् | मूढ | विभेदं | कर्तुम् | इच्छसि
गर्ते मत्तः प्रपतति प्रमत्तः स्थाणुमृच्छति ज्येष्ठो राजन्वरिष्ठोऽसि नमस्ते भरतर्षभ
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गर्ते | मत्तः | प्रपतति | प्रमत्तः | स्थाणुम् | ऋच्छति
ज्येष्ठो | राजन् | वरिष्ठो | ऽसि | नमस् + त्वद् | भरत + ऋषभ
स्वप्ने तानि पश्यन्ति जाग्रतो वा युधिष्ठिर कितवा यानि दीव्यन्तः प्रलपन्त्युत्कटा इव
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स्वप्ने | न | तानि | पश्यन्ति | जाग्रतो | वा | युधिष्ठिर
कितवा | यानि | दीव्यन्तः | प्रलप् + उत्कट | इव
यो नः संख्ये नौरिव पारनेता; जेता रिपूणां राजपुत्रस्तरस्वी अनर्हता लोकवीरेण तेन; दीव्याम्यहं शकुने फल्गुनेन
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यो | नः | संख्ये | नौर् | इव | पार + नेतृ | जेता | रिपूणां | राजन् + पुत्र + तरस्विन्
अन् + अर्ह् | लोक + वीर | तेन | दीव् + मद् | शकुने | फल्गुनेन
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
अयं मया पाण्डवानां धनुर्धरः; पराजितः पाण्डवः सव्यसाची भीमेन राजन्दयितेन दीव्य; यत्कैतव्यं पाण्डव तेऽवशिष्टम्
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अयं | मया | पाण्डवानां | धनुर्धरः | पराजितः | पाण्डवः | सव्यसाची
भीमेन | राजन् | दयितेन | दीव्य | यत् | कैतव्यं | पाण्डव | ते | ऽवशिष्टम्
यो नो नेता यो युधां नः प्रणेता; यथा वज्री दानवशत्रुरेकः तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रूर्महात्मा; सिंहस्कन्धो यश्च सदात्यमर्षी
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यो | नो | नेता | यो | युधां | नः | प्रणेता | यथा | वज्री | दानव + शत्रु | एकः
तिर्यञ्च् + प्रेक्षिन् | संहन् + भ्रू | महात्मा | सिंह + स्कन्ध | यद् + च | सदा + अति + अमर्षिन्
बलेन तुल्यो यस्य पुमान्न विद्यते; गदाभृतामग्र्य इहारिमर्दनः अनर्हता राजपुत्रेण तेन; दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन्
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बलेन | तुल्यो | यस्य | पुंस् + न | विद्यते | गदा + भृत् | अग्र्य | इह + अरि + मर्दन
अन् + अर्ह् | राजन् + पुत्र | तेन | त्वया | दीव् + अप्रिय + वत् | प्रियेण
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
बहु वित्तं पराजैषीर्भ्रातॄंश्च सहयद्विपान् आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय यदि तेऽस्त्यपराजितम्
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बहु | वित्तं | पराजैषीर् | भ्रातृ + च | स + हय + द्विप
आचक्ष्व | वित्तं | कौन्तेय | यदि | ते | अस् + अपराजित
अहं विशिष्टः सर्वेषां भ्रातॄणां दयितस्तथा कुर्यामस्ते जिताः कर्म स्वयमात्मन्युपप्लवे
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जानामि | शेष | सर्वेषां | भ्रातॄणां | ते | विचेष्टितम्
कृ + तद् | जिताः | कर्म | स्वयम् | आत्मन् + उपप्लु
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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एतद् + श्रु | व्यवसितो | निकृतिं | समुपाश्रितः
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत
एतत्पापिष्ठमकरोर्यदात्मानं पराजितः शिष्टे सति धने राजन्पाप आत्मपराजयः
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एतत् | पापिष्ठम् | अकरोर् | यद् | आत्मानं | पराजितः
शिष्टे | सति | धने | राजन् | पाप | आत्मन् + पराजय
एवमुक्त्वा मताक्षस्तान्ग्लहे सर्वानवस्थितान् पराजयल्लोकवीरानाक्षेपेण पृथक्पृथक्
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एवम् | उक्त्वा | मताक्ष + तद् | ग्लहे | सर्वान् | अवस्थितान्
पराजि + लोक + वीर | आक्षेपेण | पृथक् | पृथक्
अस्ति वै ते प्रिया देवी ग्लह एकोऽपराजितः पणस्व कृष्णां पाञ्चालीं तयात्मानं पुनर्जय
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अस्ति | वै | ते | प्रिया | देवी | ग्लह | एको | अ + पराजि
पणस्व | कृष्णां | पाञ्चालीं | तद् + आत्मन् | पुनर् | जय
नैव ह्रस्वा महती नातिकृष्णा रोहिणी सरागरक्तनेत्रा तया दीव्याम्यहं त्वया
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न + एव | ह्रस्वा | न | महती | न + अति + कृष्ण | न | रोहिणी
एतद् | राजन् | धनं | मह्यं | तेन | दीव् + मद् | त्वया
शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानया
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शारद + उत्पल + पत्त्र + अक्ष | शारद + उत्पल + गन्ध
शारद + उत्पल + सेविन् | रूपेण | श्री + समान
तथैव स्यादानृशंस्यात्तथा स्याद्रूपसंपदा तथा स्याच्छीलसंपत्त्या यामिच्छेत्पुरुषः स्त्रियम्
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तथा + एव | स्याद् | आनृशंस्यात् | तथा | स्याद् | रूप + सम्पद्
तथा | अस् + शील + सम्पत्ति | याम् | इच्छेत् | पुरुषः | स्त्रियम्
चरमं संविशति या प्रथमं प्रतिबुध्यते गोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम्
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चरमं | संविशति | या | प्रथमं | प्रतिबुध्यते
आ | गोपाल + अवि + पाल | सर्वं | वेद | कृ + अकृत
आभाति पद्मवद्वक्त्रं सस्वेदं मल्लिकेव वेदीमध्या दीर्घकेशी ताम्राक्षी नातिरोमशा
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आभाति | पद्म + वत् | वक्त्रं | स + स्वेद | मल्लिका + इव | च
वेदि + मध्य | दीर्घ + केश | ताम्र + अक्ष | न + अति + रोमश
तयैवंविधया राजन्पाञ्चाल्याहं सुमध्यया ग्लहं दीव्यामि चार्वङ्ग्या द्रौपद्या हन्त सौबल
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तद् + एवंविध | राजन् | पाञ्चाली + मद् | सु + मध्य
ग्लहं | दीव्यामि | चारु + अङ्ग | द्रौपद्या | हन्त | सौबल
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन भारत धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः
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एवम् | उक्ते | तु | वचने | धर्मराजेन | भारत
धिग् | धिग् | इति + एव | वृद्धानां | सभ्यानां | निःसृता | गिरः
चुक्षुभे सा सभा राजन्राज्ञां संजज्ञिरे कथाः भीष्मद्रोणकृपादीनां स्वेदश्च समजायत
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शुशुभे | सा | सभा | राजन् | राजन् + तद् | समागतैः
भीष्म + द्रोण + कृप + आदि | स्वेद + च | समजायत
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् आस्ते ध्यायन्नधोवक्त्रो निःश्वसन्पन्नगो यथा
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शिरो | गृहीत्वा | विदुरो | गम् + सत्त्व | इव + भू
आस्ते | ध्यायन्न् | अधस् + वक्त्र | निःश्वसन् | पन्नगो | यथा
धृतराष्ट्रस्तु संहृष्टः पर्यपृच्छत्पुनः पुनः किं जितं किं जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत
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धृतराष्ट्र + तु | संहृष्टः | पर्यपृच्छत् | पुनः | पुनः
किं | जितं | किं | जितम् | इति | हि + आकार | न + अभिरक्ष्
जहर्ष कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम्
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जहर्ष | कर्णो | अति + भृशम् | सह | दुःशासन + आदि
इतरेषां | तु | सभ्यानां | नेत्रेभ्यः | प्रपत् + जल
सौबलस्त्वविचार्यैव जितकाशी मदोत्कटः जितमित्येव तानक्षान्पुनरेवान्वपद्यत
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सौबल + तु + अ + विचारय् + एव | जि + काशिन् | मद + उत्कट
जितम् | इति + एव | तान् | अक्षान् | पुनर् | एव + अनुपद्