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Currently viewing: Parva 2 - Chapter 2.57 (21 verses)
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Chapter 2.57

परेषामेव यशसा श्लाघसे त्वं; सदा छन्नः कुत्सयन्धार्तराष्ट्रान् जानीमस्त्वां विदुर यत्प्रियस्त्वं; बालानिवास्मानवमन्यसे त्वम्
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परेषाम् | एव | यशसा | श्लाघसे | त्वं | सदा | छन्नः | कुत्सयन् | धार्तराष्ट्रान्
ज्ञा + त्वद् | विदुर | यत् + प्रिय + त्वद् | बालान् | इव + मद् | अवमन्यसे | त्वम्
सुविज्ञेयः पुरुषोऽन्यत्रकामो; निन्दाप्रशंसे हि तथा युनक्ति जिह्वा मनस्ते हृदयं निर्व्यनक्ति; ज्यायो निराह मनसः प्रातिकूल्यम्
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सु + विज्ञा | पुरुषो | अन्यत्र + काम | निन्दा + प्रशंसा | हि | तथा | युनक्ति
जिह्वा | मनस् + त्वद् | हृदयं | निर्व्यनक्ति | ज्यायो | निराह | मनसः | प्रातिकूल्यम्
उत्सङ्गेन व्याल इवाहृतोऽसि; मार्जारवत्पोषकं चोपहंसि भर्तृघ्नत्वान्न हि पापीय आहु;स्तस्मात्क्षत्तः किं बिभेषि पापात्
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उत्सङ्गेन | व्याल | इव + आहृ | ऽसि | मार्जार + वत् | पोषकं | च + उपहन्
भर्तृ + घ्न + त्व + न | हि | पापीय | आहुस् | तस्मात् | क्षत्तः | किं | न | बिभेषि | पापात्
जित्वा शत्रून्फलमाप्तं महन्नो; मास्मान्क्षत्तः परुषाणीह वोचः द्विषद्भिस्त्वं संप्रयोगाभिनन्दी; मुहुर्द्वेषं यासि नः संप्रमोहात्
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जित्वा | शत्रून् | फलम् | आप्तं | महत् + मद् | मा + मद् | क्षत्तः | परुष + इह | वोचः
द्विष् + त्वद् | संप्रयोग + अभिनन्दिन् | मुहुर् | द्वेषं | यासि | नः | संप्रमोहात्
अमित्रतां याति नरोऽक्षमं ब्रुव;न्निगूहते गुह्यममित्रसंस्तवे तदाश्रितापत्रपा किं बाधते; यदिच्छसि त्वं तदिहाद्य भाषसे
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अमित्र + ता | याति | नरो | ऽक्षमं | ब्रुवन् | निगूहते | गुह्यम् | अमित्र + संस्तव
तद् + आश्रि + अपत्रपा | किं | न | बाधते | यद् | इच्छसि | त्वं | तद् | इह + अद्य | भाषसे
मा नोऽवमंस्था विद्म मनस्तवेदं; शिक्षस्व बुद्धिं स्थविराणां सकाशात् यशो रक्षस्व विदुर संप्रणीतं; मा व्यापृतः परकार्येषु भूस्त्वम्
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मा | नो | ऽवमंस्था | विद्म | मनस् + त्वद् + इदम् | शिक्षस्व | बुद्धिं | स्थविराणां | सकाशात्
यशो | रक्षस्व | विदुर | सम्प्रणीतं | मा | व्यापृतः | पर + कार्य | भू + त्वद्
अहं कर्तेति विदुर मावमंस्था; मा नो नित्यं परुषाणीह वोचः त्वां पृच्छामि विदुर यद्धितं मे; स्वस्ति क्षत्तर्मा तितिक्षून्क्षिणु त्वम्
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अहं | कृ + इति | विदुर | मा + अवमन् | मा | नो | नित्यं | परुष + इह | वोचः
न | त्वां | पृच्छामि | विदुर | यद् + हित | मे | स्वस्ति | क्षत्तर् | मा | तितिक्षून् | क्षिणु | त्वम्
एकः शास्ता द्वितीयोऽस्ति शास्ता; गर्भे शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता तेनानुशिष्टः प्रवणादिवाम्भो; यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि
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एकः | शास्ता | न | द्वितीयो | ऽस्ति | शास्ता | गर्भे | शयानं | पुरुषं | शास्ति | शास्ता
तद् + अनुशास् | प्रवणाद् | इव + अम्भस् | यथा | नियुक्तो | ऽस्मि | तथा | वहामि
भिनत्ति शिरसा शैलमहिं भोजयते यः एव तस्य कुरुते कार्याणामनुशासनम्
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भिनत्ति | शिरसा | शैलम् | अहिं | भोजयते | च | यः
स | एव | तस्य | कुरुते | कार्याणाम् | अनुशासनम्
यो बलादनुशास्तीह सोऽमित्रं तेन विन्दति मित्रतामनुवृत्तं तु समुपेक्षेत पण्डितः
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यो | बलाद् | अनुशास् + इह | सो | ऽमित्रं | तेन | विन्दति
मित्र + ता | अनुवृत्तं | तु | समुपेक्षेत | पण्डितः
प्रदीप्य यः प्रदीप्ताग्निं प्राक्त्वरन्नाभिधावति भस्मापि विन्देत शिष्टं क्वचन भारत
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प्रदीप्य | यः | प्रदीप् + अग्नि | प्राक् | त्वर् + न + अभिधाव्
भस्मन् + अपि | न | स | विन्देत | शिष्टं | क्वचन | भारत
वासयेत्पारवर्ग्यं द्विषन्तं; विशेषतः क्षत्तरहितं मनुष्यम् यत्रेच्छसि विदुर तत्र गच्छ; सुसान्त्वितापि ह्यसती स्त्री जहाति
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न | वासयेत् | पारवर्ग्यं | द्विषन्तं | विशेषतः | क्षत्तर् | अहितं | मनुष्यम्
स | यत्र + इष् | विदुर | तत्र | गच्छ | सु + सान्त्वय् + अपि | हि + असत् | स्त्री | जहाति
एतावता ये पुरुषं त्यजन्ति; तेषां सख्यमन्तवद्ब्रूहि राजन् राज्ञां हि चित्तानि परिप्लुतानि; सान्त्वं दत्त्वा मुसलैर्घातयन्ति
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एतावता | ये | पुरुषं | त्यजन्ति | तेषां | सख्यम् | अन्तवद् | ब्रूहि | राजन्
राज्ञां | हि | चित्तानि | परिप्लुतानि | सान्त्वं | दत्त्वा | मुसलैर् | घातयन्ति
अबालस्त्वं मन्यसे राजपुत्र; बालोऽहमित्येव सुमन्दबुद्धे यः सौहृदे पुरुषं स्थापयित्वा; पश्चादेनं दूषयते बालः
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अबाल + त्वद् | मन्यसे | राजन् + पुत्र | बालो | ऽहम् | इति + एव | सु + मन्द + बुद्धि
यः | सौहृदे | पुरुषं | स्थापयित्वा | पश्चाद् | एनं | दूषयते | स | बालः
श्रेयसे नीयते मन्दबुद्धिः; स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा ध्रुवं रोचेद्भरतर्षभस्य; पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः
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न | श्रेयसे | नीयते | मन्द + बुद्धि | स्त्री | श्रोत्रिय + इव | गृहे | प्रदुष्टा
ध्रुवं | न | रोचेद् | भरत + ऋषभ | पतिः | कुमार्या | इव | षष्टि + वर्ष
अनुप्रियं चेदनुकाङ्क्षसे त्वं; सर्वेषु कार्येषु हिताहितेषु स्त्रियश्च राजञ्जडपङ्गुकांश्च; पृच्छ त्वं वै तादृशांश्चैव मूढान्
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अनुप्रियं | चेद् | अनुकाङ्क्षसे | त्वं | सर्वेषु | कार्येषु | हित + अहित
स्त्री + च | राजञ् | जड + पङ्गुक + च | पृच्छ | त्वं | वै | तादृश + च + एव | मूढान्
लभ्यः खलु प्रातिपीय नरोऽनुप्रियवागिह अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता दुर्लभः
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लभ्यः | खलु | प्रातिपीय | नरो | अनुप्रिय + वाच् | इह
अप्रियस्य | तु | पथ्यस्य | वक्ता | श्रोता | च | दुर्लभः
यस्तु धर्मे पराश्वस्य हित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान्
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यद् + तु | धर्मे | पराश्वस्य | हित्वा | भर्तुः | प्रिय + अप्रिय
अप्रिय + अह् | पथ्यानि | तेन | राजा | सहायवान्
अव्याधिजं कटुकं तीक्ष्णमुष्णं; यशोमुषं परुषं पूतिगन्धि सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो; मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य
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अ + व्याधि + ज | कटुकं | तीक्ष्णम् | उष्णं | यशस् + मुष् | परुषं | पूति + गन्धि
सतां | पेयं | यद् + न | पा + असत् | मन्युं | महत् + राज | पिब | प्रशाम्य
वैचित्रवीर्यस्य यशो धनं च; वाञ्छाम्यहं सहपुत्रस्य शश्वत् यथा तथा वोऽस्तु नमश्च वोऽस्तु; ममापि स्वस्ति दिशन्तु विप्राः
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वैचित्रवीर्य + तु | नृपो | निशम्य | विदुरस्य | तत्
यथा | तथा | वो | ऽस्तु | नमस् + च | वो | ऽस्तु | मद् + अपि | च | स्वस्ति | दिशन्तु | विप्राः
आशीविषान्नेत्रविषान्कोपयेन्न तु पण्डितः एवं तेऽहं वदामीदं प्रयतः कुरुनन्दन
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आशीविष + नेत्र + विष | कोपय् + न | तु | पण्डितः
एवं | ते | ऽहं | वद् + इदम् | प्रयतः | कुरु + नन्दन