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Currently viewing: Parva 2 - Chapter 2.53 (25 verses)
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Chapter 2.53

उपस्तीर्णा सभा राजन्रन्तुं चैते कृतक्षणाः अक्षानुप्त्वा देवनस्य समयोऽस्तु युधिष्ठिर
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उपस्तीर्णा | सभा | राजन् | रन्तुं | च + एतद् | कृ + क्षण
अक्षान् | उप्त्वा | देवनस्य | समयो | ऽस्तु | युधिष्ठिर
निकृतिर्देवनं पापं क्षात्रोऽत्र पराक्रमः नीतिर्ध्रुवा राजन्किं त्वं द्यूतं प्रशंससि
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निकृतिर् | देवनं | पापं | न | क्षात्रो | ऽत्र | पराक्रमः
न | च | नीतिर् | ध्रुवा | राजन् | किं | त्वं | द्यूतं | प्रशंससि
हि मानं प्रशंसन्ति निकृतौ कितवस्य शकुने मैव नो जैषीरमार्गेण नृशंसवत्
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न | हि | मानं | प्रशंसन्ति | निकृतौ | कितवस्य | ह
शकुने | मा + एव | नो | जैषीर् | अमार्गेण | नृशंस + वत्
योऽन्वेति संख्यां निकृतौ विधिज्ञ;श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासु महामतिर्यश्च जानाति द्यूतं; वै सर्वं सहते प्रक्रियासु
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यो | ऽन्वेति | संख्यां | निकृतौ | विधि + ज्ञ | चेष्टा + अ + खिद् | कितवो | अक्ष + ज
महत् + मति | यद् + च | जानाति | द्यूतं | स | वै | सर्वं | सहते | प्रक्रियासु
अक्षग्लहः सोऽभिभवेत्परं न;स्तेनैव कालो भवतीदमात्थ दीव्यामहे पार्थिव मा विशङ्कां; कुरुष्व पाणं चिरं मा कृथाः
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अक्ष + ग्लह | सो | ऽभिभवेत् | परं | नस् | तद् + एव | कालो | भू + इदम् | आत्थ
दीव्यामहे | पार्थिव | मा | विशङ्कां | कुरुष्व | पाणं | च | चिरं | च | मा | कृथाः
एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तमः इमानि लोकद्वाराणि यो वै संचरते सदा
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एवम् | अह् + इदम् | असितो | देवलो | मुनि + सत्तम
इमानि | लोक + द्वार | यो | वै | संचरते | सदा
इदं वै देवनं पापं मायया कितवैः सह धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं साधु देवनम्
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इदं | वै | देवनं | पापं | मायया | कितवैः | सह
धर्मेण | तु | जयो | युद्धे | तत् | परं | साधु | देवनम्
नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया चरन्त्युत अजिह्ममशठं युद्धमेतत्सत्पुरुषव्रतम्
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न + आर्य | म्लेछन्ति | भाषाभिर् | मायया | न | चर् + उत
अजिह्मम् | अशठं | युद्धम् | एतत् | सत् + पुरुष + व्रत
शक्तितो ब्राह्मणान्वन्द्याञ्शिक्षितुं प्रयतामहे तद्वै वित्तं मातिदेवीर्मा जैषीः शकुने परम्
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शक्तितो | ब्राह्मणान् | वन्द्याञ् | शिक्षितुं | प्रयतामहे
तद् | वै | वित्तं | मा + अतिदिव् | मा | जैषीः | शकुने | परम्
नाहं निकृत्या कामये सुखान्युत धनानि वा कितवस्याप्यनिकृतेर्वृत्तमेतन्न पूज्यते
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न + मद् | निकृत्या | कामये | सुख + उत | धनानि | वा
कितव + अपि + अ + निकृति | वृत्तम् | एतद् + न | पूज्यते
श्रोत्रियोऽश्रोत्रियमुत निकृत्यैव युधिष्ठिर विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः
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श्रोत्रियो | अ + श्रोत्रिय | उत | निकृति + एव | युधिष्ठिर
विद्वान् | अविदुषो | ऽभ्येति | न + अह् + तद् | निकृतिं | जनाः
एवं त्वं मामिहाभ्येत्य निकृतिं यदि मन्यसे देवनाद्विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भयम्
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एवं | त्वं | माम् | इह + अभ्ये | निकृतिं | यदि | मन्यसे
देवनाद् | विनिवर्तस्व | यदि | ते | विद्यते | भयम्
आहूतो निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् विधिश्च बलवान्राजन्दिष्टस्यास्मि वशे स्थितः
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आहूतो | न | निवर्तेयम् | इति | मे | व्रतम् | आहितम्
विधि + च | बलवान् | राजन् | दिष्ट + अस् | वशे | स्थितः
अस्मिन्समागमे केन देवनं मे भविष्यति प्रतिपाणश्च कोऽन्योऽस्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम्
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अस्मिन् | समागमे | केन | देवनं | मे | भविष्यति
प्रतिपाण + च | को | ऽन्यो | ऽस्ति | ततो | द्यूतं | प्रवर्तताम्
अहं दातास्मि रत्नानां धनानां विशां पते मदर्थे देविता चायं शकुनिर्मातुलो मम
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अहं | दातास्मि | रत्नानां | धनानां | च | विशां | पते
मद् + अर्थ | देविता | च + इदम् | शकुनिर् | मातुलो | मम
अन्येनान्यस्य विषमं देवनं प्रतिभाति मे एतद्विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम्
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अन्य | विषमं | देवनं | प्रतिभाति | मे
एतद् | विद्वन्न् | उपादत्स्व | कामम् | एवं | प्रवर्तताम्
उपोह्यमाने द्यूते तु राजानः सर्व एव ते धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां ततः
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ततः | प्रयाता | राजानः | सर्व | एव | यथागतम्
धृतराष्ट्रः | स + पुत्र + त्वद् | सह + अमात्य | स + बान्धव
भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव विदुरश्च महामतिः नातीवप्रीतमनसस्तेऽन्ववर्तन्त भारत
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धृतराष्ट्र + च | भीष्म + च | विदुर + च | महामतिः
न + अतीव + प्री + मनस् + तद् | ऽन्ववर्तन्त | भारत
ते द्वंद्वशः पृथक्चैव सिंहग्रीवा महौजसः सिंहासनानि भूरीणि विचित्राणि भेजिरे
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ते | द्वंद्वशः | पृथक् | च + एव | सिंह + ग्रीवा | महत् + ओजस्
सिंहासनानि | भूरीणि | विचित्राणि | च | भेजिरे
शुशुभे सा सभा राजन्राजभिस्तैः समागतैः देवैरिव महाभागैः समवेतैस्त्रिविष्टपम्
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शुशुभे | सा | सभा | राजन् | राजन् + तद् | समागतैः
देवैर् | इव | महाभागैः | समवे + त्रिविष्टप
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे भास्वरमूर्तयः प्रावर्तत महाराज सुहृद्द्यूतमनन्तरम्
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सर्वे | लभ् + वर | शूराः | सर्वे | विगम् + मृत्यु
प्रवर्ततां | सुहृद् + द्यूत | दिष्टम् | एतद् + न | संशयः
अयं बहुधनो राजन्सागरावर्तसंभवः मणिर्हारोत्तरः श्रीमान्कनकोत्तमभूषणः
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अयं | बहु + धन | राजन् | सागर + आवर्त + सम्भव
मणिर् | हार + उत्तर | श्रीमान् | कनक + उत्तम + भूषण
एतद्राजन्धनं मह्यं प्रतिपाणस्तु कस्तव भवत्वेष क्रमस्तात जयाम्येनं दुरोदरम्
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एतद् | राजन् | धनं | मह्यं | प्रतिपाण + तु | क + त्वद्
भू + एतद् | क्रम + तात | जि + एनद् | दुरोदरम्
सन्ति मे मणयश्चैव धनानि विविधानि मत्सरश्च मेऽर्थेषु जयाम्येनं दुरोदरम्
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सन्ति | मे | मणि + च + एव | धनानि | विविधानि | च
भू + एतद् | क्रम + तात | जि + एनद् | दुरोदरम्
ततो जग्राह शकुनिस्तानक्षानक्षतत्त्ववित् जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत
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ततो | जग्राह | शकुनि + तद् | अक्षान् | अक्ष + तत्त्व + विद्
जितम् | इति + एव | शकुनिर् | युधिष्ठिरम् | अभाषत