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Currently viewing: Parva 2 - Chapter 2.16 (51 verses)
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Chapter 2.16

जातस्य भारते वंशे तथा कुन्त्याः सुतस्य या वै युक्ता मतिः सेयमर्जुनेन प्रदर्शिता
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जातस्य | भारते | वंशे | तथा | कुन्त्याः | सुतस्य | च
या | वै | युक्ता | मतिः | तद् + इदम् | अर्जुनेन | प्रदर्शिता
मृत्योः समयं विद्म रात्रौ वा यदि वा दिवा चापि कंचिदमरमयुद्धेनापि शुश्रुमः
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न | मृत्योः | समयं | विद्म | रात्रौ | वा | यदि | वा | दिवा
न | च + अपि | कंचिद् | अमरम् | अयुद्ध + अपि | शुश्रुमः
एतावदेव पुरुषैः कार्यं हृदयतोषणम् नयेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान्
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एतावद् | एव | पुरुषैः | कार्यं | हृदय + तोषण
नयेन | विधि + दृश् | यद् | उपक्रमते | परान्
सुनयस्यानपायस्य संयुगे परमः क्रमः संशयो जायते साम्ये साम्यं भवेद्द्वयोः
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सु + नय + अनपाय | संयुगे | परमः | क्रमः
संशयो | जायते | साम्ये | साम्यं | च | न | भवेद् | द्वयोः
ते वयं नयमास्थाय शत्रुदेहसमीपगाः कथमन्तं गच्छेम वृक्षस्येव नदीरयाः पररन्ध्रे पराक्रान्ताः स्वरन्ध्रावरणे स्थिताः
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ते | वयं | नयम् | आस्थाय | शत्रु + देह + समीप + ग
कथम् | अन्तं | न | गच्छेम | वृक्ष + इव | नदी + रय
पर + रन्ध्र | पराक्रान्ताः | स्व + रन्ध्र + आवरण | स्थिताः
व्यूढानीकैरनुबलैर्नोपेयाद्बलवत्तरम् इति बुद्धिमतां नीतिस्तन्ममापीह रोचते
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व्यूह् + अनीक | अनुबलैर् | न + उपे | बलवत्तरम्
इति | बुद्धिमतां | नीति + तद् + मद् + अपि + इह | रोचते
अनवद्या ह्यसंबुद्धाः प्रविष्टाः शत्रुसद्म तत् शत्रुदेहमुपाक्रम्य तं कामं प्राप्नुयामहे
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अनवद्या | हि + असंबुद्ध | प्रविष्टाः | शत्रु + सद्मन् | तत्
शत्रु + देह | उपाक्रम्य | तं | कामं | प्राप्नुयामहे
एको ह्येव श्रियं नित्यं बिभर्ति पुरुषर्षभ अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षये वै बलक्षयः
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एको | हि + एव | श्रियं | नित्यं | बिभर्ति | पुरुष + ऋषभ
अन्तरात्मन् + इव | भूतानां | तद् + क्षय | वै | बल + क्षय
अथ चेत्तं निहत्याजौ शेषेणाभिसमागताः प्राप्नुयाम ततः स्वर्गं ज्ञातित्राणपरायणाः
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अथ | चेत् | तं | निहन् + आजि | शेष + अभिसमागम्
प्राप्नुयाम | ततः | स्वर्गं | ज्ञाति + त्राण + परायण
कृष्ण कोऽयं जरासंधः किंवीर्यः किंपराक्रमः यस्त्वां स्पृष्ट्वाग्निसदृशं दग्धः शलभो यथा
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कृष्ण | को | ऽयं | जरासंधः | किंवीर्यः | किंपराक्रमः
यद् + त्वद् | स्पृश् + अग्नि + सदृश | न | दग्धः | शलभो | यथा
शृणु राजञ्जरासंधो यद्वीर्यो यत्पराक्रमः यथा चोपेक्षितोऽस्माभिर्बहुशः कृतविप्रियः
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शृणु | राजञ् | जरासंधो | यद् + वीर्य | यद् + पराक्रम
यथा | च + उपेक्ष् | ऽस्माभिर् | बहुशः | कृ + विप्रिय
अक्षौहिणीनां तिसृणामासीत्समरदर्पितः राजा बृहद्रथो नाम मगधाधिपतिः पतिः
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अक्षौहिणीनां | तिसृणाम् | आसीत् | समर + दर्पय्
राजा | बृहद्रथो | नाम | मगध + अधिपति | पतिः
रूपवान्वीर्यसंपन्नः श्रीमानतुलविक्रमः नित्यं दीक्षाकृशतनुः शतक्रतुरिवापरः
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रूपवान् | वीर्य + सम्पद् | श्रीमान् | अतुल + विक्रम
नित्यं | दीक्षा + कृश + तनु | शतक्रतुर् | इव + अपर
तेजसा सूर्यसदृशः क्षमया पृथिवीसमः यमान्तकसमः कोपे श्रिया वैश्रवणोपमः
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क्रोधेन | च + अग्नि + सदृश | क्षमया | पृथिवी + सम
यम + अन्तक + सम | कोपे | श्रिया | वैश्रवण + उपम
तस्याभिजनसंयुक्तैर्गुणैर्भरतसत्तम व्याप्तेयं पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः
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तद् + अभिजन + संयुज् | गुणैर् | भरत + सत्तम
व्याप् + इदम् | पृथिवी | सर्वा | सूर्य + इव | गभस्तिभिः
काशिराजस्य सुते यमजे भरतर्षभ उपयेमे महावीर्यो रूपद्रविणसंमते
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स | काशिराजस्य | सुते | यम + ज | भरत + ऋषभ
उपयेमे | महत् + वीर्य | रूप + द्रविण + सम्मन्
तयोश्चकार समयं मिथः पुरुषर्षभः नातिवर्तिष्य इत्येवं पत्नीभ्यां संनिधौ तदा
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तद् + कृ | समयं | मिथः | स | पुरुष + ऋषभ
न + अतिवृत् | इति + एवम् | पत्नीभ्यां | संनिधौ | तदा
ताभ्यां शुशुभे राजा पत्नीभ्यां मनुजाधिप प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विपः
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स | ताभ्यां | शुशुभे | राजा | पत्नीभ्यां | मनुज + अधिप
प्रियाभ्याम् | अनुरूपाभ्यां | करेणुभ्याम् | इव | द्विपः
तयोर्मध्यगतश्चापि रराज वसुधाधिपः गङ्गायमुनयोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरः
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तयोर् | मध्य + गम् | च + अपि | रराज | वसुधा + अधिप
गङ्गा + यमुना | मध्ये | मूर्तिमान् | इव | सागरः
विषयेषु निमग्नस्य तस्य यौवनमत्यगात् वंशकरः पुत्रस्तस्याजायत कश्चन
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विषयेषु | निमग्नस्य | तस्य | यौवनम् | अत्यगात्
न | च | वंश + कर | पुत्र + तद् + जन् | कश्चन
मङ्गलैर्बहुभिर्होमैः पुत्रकामाभिरिष्टिभिः नाससाद नृपश्रेष्ठः पुत्रं कुलविवर्धनम्
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मङ्गलैर् | बहुभिर् | होमैः | पुत्र + काम | इष्टिभिः
न + आसद् | नृप + श्रेष्ठ | पुत्रं | कुल + विवर्धन
अथ काक्षीवतः पुत्रं गौतमस्य महात्मनः शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम्
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अन्तःपुरं | ततस् + तद् | ब्राह्मणस्य | महात्मनः
शुश्राव | तपसि | श्रान्तम् | उदारं | चण्डकौशिकम्
यदृच्छयागतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम् पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नैरतोषयत्
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यदृच्छा + आगम् | तं | तु | वृक्ष + मूल | उपाश्रितम्
पत्नीभ्यां | सहितो | राजा | सर्व + रत्न | अतोषयत्
तमब्रवीत्सत्यधृतिः सत्यवागृषिसत्तमः परितुष्टोऽस्मि ते राजन्वरं वरय सुव्रत
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तम् | अब्रवीत् | सत्य + धृति | सत्य + वाच् | ऋषि + सत्तम
स्तुतो | ऽस्मि | वर + द + त्वद् | ऽहं | वरं | वरय | सुव्रत
ततः सभार्यः प्रणतस्तमुवाच बृहद्रथः पुत्रदर्शननैराश्याद्बाष्पगद्गदया गिरा
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ततः | स + भार्या | प्रणम् + तद् | उवाच | बृहद्रथः
पुत्र + दर्शन + नैराश्य | बाष्प + गद्गद | गिरा
भगवन्राज्यमुत्सृज्य प्रस्थितस्य तपोवनम् किं वरेणाल्पभाग्यस्य किं राज्येनाप्रजस्य मे
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भगवन् | राज्यम् | उत्सृज्य | प्रस्थितस्य | तपस् + वन
किं | वर + अल्पभाग्य | किं | राज्य + अप्रज | मे
एतच्छ्रुत्वा मुनिर्ध्यानमगमत्क्षुभितेन्द्रियः तस्यैव चाम्रवृक्षस्य छायायां समुपाविशत्
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एतद् + श्रु | तु | वचनं | रुद्र + अमित + तेजस्
तद् + एव | च + आम्र + वृक्ष | छायायां | समुपाविशत्
तस्योपविष्टस्य मुनेरुत्सङ्गे निपपात अवातमशुकादष्टमेकमाम्रफलं किल
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तद् + उपविश् | मुनेर् | उत्सङ्गे | निपपात | ह
अवातम् | एकम् | आम्र + फल | किल
तत्प्रगृह्य मुनिश्रेष्ठो हृदयेनाभिमन्त्र्य राज्ञे ददावप्रतिमं पुत्रसंप्राप्तिकारकम्
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तत् | प्रगृह्य | मुनि + श्रेष्ठ | च
राज्ञे | दा + अप्रतिम | पुत्र + सम्प्राप्ति + कारक
उवाच महाप्राज्ञस्तं राजानं महामुनिः गच्छ राजन्कृतार्थोऽसि निवर्त मनुजाधिप
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उवाच | च | महत् + प्राज्ञ + तद् | राजानं | महत् + मुनि
गच्छ | राजन् | कृतार्थो | ऽसि | निवर्त | मनुज + अधिप
यथासमयमाज्ञाय तदा नृपसत्तमः द्वाभ्यामेकं फलं प्रादात्पत्नीभ्यां भरतर्षभ
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यथासमयम् | आज्ञाय | तदा | स | नृप + सत्तम
द्वाभ्याम् | एकं | फलं | प्रादात् | पत्नीभ्यां | भरत + ऋषभ
ते तदाम्रं द्विधा कृत्वा भक्षयामासतुः शुभे भावित्वादपि चार्थस्य सत्यवाक्यात्तथा मुनेः
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ते | तद् | आम्रं | द्विधा | कृत्वा | भक्षयामासतुः | शुभे
भाविन् + त्व | अपि | च + अर्थ | सत्य + वाक्य | तथा | मुनेः
तयोः समभवद्गर्भः फलप्राशनसंभवः ते दृष्ट्वा नरपतिः परां मुदमवाप
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तयोः | समभवद् | गर्भः | फल + प्राशन + सम्भव
ते | च | दृष्ट्वा | नरपतिः | परां | मुदम् | अवाप | ह
अथ काले महाप्राज्ञ यथासमयमागते प्रजायेतामुभे राजञ्शरीरशकले तदा
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अथ | काले | महत् + प्राज्ञ | यथासमयम् | आगते
प्रजायेताम् | उभे | राजञ् | शरीर + शकल | तदा
एकाक्षिबाहुचरणे अर्धोदरमुखस्फिजे दृष्ट्वा शरीरशकले प्रवेपाते उभे भृशम्
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एक + अक्षि + बाहु + चरण | अर्ध + उदर + मुख + स्फिज्
दृष्ट्वा | शरीर + शकल | उभे | भृशम्
उद्विग्ने सह संमन्त्र्य ते भगिन्यौ तदाबले सजीवे प्राणिशकले तत्यजाते सुदुःखिते
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उद्विग्ने | सह | संमन्त्र्य | ते | भगिन्यौ | तदा + अबला
स + जीव | प्राणिन् + शकल | तत्यजाते | सु + दुःखित
तयोर्धात्र्यौ सुसंवीते कृत्वा ते गर्भसंप्लवे निर्गम्यान्तःपुरद्वारात्समुत्सृज्याशु जग्मतुः
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तयोर् | धात्र्यौ | सु + संव्ये | कृत्वा | ते | गर्भ + सम्प्लव
निर्गम् + अन्तःपुर + द्वार | समुत्सृज् + आशु | जग्मतुः
ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसी जग्राह मनुजव्याघ्र मांसशोणितभोजना
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ते | चतुष्पथ + निक्षिप् | जरा | नाम + अथ | राक्षसी
जग्राह | मनुज + व्याघ्र | मांस + शोणित + भोजन
कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी संघट्टयामास तदा विधानबलचोदिता
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कर्तु + काम | सुख + वह | शकले | सा | तु | राक्षसी
संघट्टयामास | तदा | विधान + बल + चोदय्
ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुषर्षभ एकमूर्तिकृते वीरः कुमारः समपद्यत
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ते | समानी + मात्र | तु | शकले | पुरुष + ऋषभ
एक + मूर्ति + कृ | वीरः | कुमारः | समपद्यत
ततः सा राक्षसी राजन्विस्मयोत्फुल्ललोचना शशाक समुद्वोढुं वज्रसारमयं शिशुम्
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ततः | सा | राक्षसी | राजन् | विस्मय + उत्फुल्ल + लोचन
न | शशाक | समुद्वोढुं | वज्र + सार + मय | शिशुम्
बालस्ताम्रतलं मुष्टिं कृत्वा चास्ये निधाय सः प्राक्रोशदतिसंरम्भात्सतोय इव तोयदः
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बाल + ताम्र + तल | मुष्टिं | कृत्वा | च + आस्य | निधाय | सः
प्राक्रोशद् | अति + संरम्भ | स + तोय | इव | तोयदः
तेन शब्देन संभ्रान्तः सहसान्तःपुरे जनः निर्जगाम नरव्याघ्र राज्ञा सह परंतप
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तेन | शब्देन | संभ्रान्तः | सहसा + अन्तःपुर | जनः
निर्गताः | पाण्डवा | राजन् | मात्रा | सह | परंतपाः
ते चाबले परिग्लाने पयःपूर्णपयोधरे निराशे पुत्रलाभाय सहसैवाभ्यगच्छताम्
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ते | च + अबला | परिग्लाने | पयस् + पूर्ण + पयोधर
निराशे | पुत्र + लाभ | सहसा + एव + अभिगम्
अथ दृष्ट्वा तथाभूते राजानं चेष्टसंततिम् तं बालं सुबलिनं चिन्तयामास राक्षसी
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अथ | दृष्ट्वा | तथाभूते | राजानं | च + इष् + संतति
अन्तर्गतेन | मनसा | चिन्तयामास | राक्षसी
नार्हामि विषये राज्ञो वसन्ती पुत्रगृद्धिनः बालं पुत्रमुपादातुं मेघलेखेव भास्करम्
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न + अर्ह् | विषये | राज्ञो | वसन्ती | पुत्र + गृद्धिन्
बालं | पुत्रम् | उपादातुं | मेघ + लेखा + इव | भास्करम्
सा कृत्वा मानुषं रूपमुवाच मनुजाधिपम् बृहद्रथ सुतस्तेऽयं मद्दत्तः प्रतिगृह्यताम्
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सा | कृत्वा | मानुषं | रूपम् | उवाच | मनुज + अधिप
बृहद्रथ | सुत + त्वद् | ऽयं | मद् + दा | प्रतिगृह्यताम्
तव पत्नीद्वये जातो द्विजातिवरशासनात् धात्रीजनपरित्यक्तो मयायं परिरक्षितः
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तव | पत्नी + द्वय | जातो | द्विजाति + वर + शासन
धात्री + जन + परित्यज् | मद् + इदम् | परिरक्षितः
ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे तं बालमभिपत्याशु प्रस्नवैरभिषिञ्चताम्
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ततस् + तद् | भरत + श्रेष्ठ | काशिराज + सुता | शुभे
तं | बालम् | अभिपत् + आशु | प्रस्नवैर् | अभिषिञ्चताम्
ततः राजा संहृष्टः सर्वं तदुपलभ्य अपृच्छन्नवहेमाभां राक्षसीं तामराक्षसीम्
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ततः | स | राजा | संहृष्टः | सर्वं | तद् | उपलभ्य | च
प्रच्छ् + नव + हेमन् + आभ | राक्षसीं | ताम् | अराक्षसीम्
का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी कामया ब्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे
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का | त्वं | कमल + गर्भ + आभ | मम | पुत्र + प्रदायिन्
कामया | ब्रूहि | कल्याणि | देवता | प्रतिभासि | मे