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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.99 (49 verses)
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Chapter 1.99

पुनर्भरतवंशस्य हेतुं संतानवृद्धये वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु
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ऋषेर् | उतथ्यस्य | तदा | संतान + कुल + वृद्धि
वक्ष्यामि | नियतं | मातृ + तद् | मे | निगदतः | शृणु
ब्राह्मणो गुणवान्कश्चिद्धनेनोपनिमन्त्र्यताम् विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत्प्रजाः
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ब्राह्मणो | गुणवान् | कश्चिद् | धन + उपनिमन्त्रय्
विचित्रवीर्य + क्षेत्र | यः | समुत्पादयेत् | प्रजाः
ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत्
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माता | सत्यवती | भीष्मम् | उवाच | तद् + अनन्तर
विहस् + इव | स + व्रीडा | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत विश्वासात्ते प्रवक्ष्यामि संतानाय कुलस्य ते शक्यमनाख्यातुमापद्धीयं तथाविधा
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सत्यम् | एतन् | महत् + बाहु | यथा | वदसि | भारत
विश्वासात् | ते | प्रवक्ष्यामि | संतानाय | कुलस्य | च
न | ते | शक्यम् | अनाख्यातुम् | आपद् + हि + इदम् | तथाविधा
त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः तस्मान्निशम्य वाक्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम्
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त्वम् | एव | नः | कुले | धर्म + त्वद् | सत्यं | त्वं | परा | गतिः
तस्मान् | निशम्य | वाक्यं | मे | कुरुष्व | यद् | अनन्तरम्
धर्मयुक्तस्य धर्मात्मन्पितुरासीत्तरी मम सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवने
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धर्म + युज् | धर्म + आत्मन् | पितुर् | आसीत् | तरी | मम
सा | कदाचिद् | अहं | तत्र | गता | प्रथम + यौवन
अथ धर्मभृतां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन्यमुनां नदीम्
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ततो | धर्म + भृत् | श्रेष्ठः | उच्यते
आजगाम | तरीं | धीमत् + तृ | यमुनां | नदीम्
तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत्तदा सान्त्वपूर्वं मुनिश्रेष्ठः कामार्तो मधुरं बहु
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स | तार्यमाणो | यमुनां | माम् | उपे + ब्रू | तदा
सान्त्वयित्वा | नृप + श्रेष्ठ | साम्ना | परम + वल्गु
तमहं शापभीता पितुर्भीता भारत वरैरसुलभैरुक्ता प्रत्याख्यातुमुत्सहे
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तम् | अहं | शाप + भी | च | पितुर् | भीता | च | भारत
वरैर् | असुलभैर् | उक्ता | न | प्रत्याख्यातुम् | उत्सहे
अभिभूय मां बालां तेजसा वशमानयत् तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत
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अभिभूय | स | मां | बालां | तेजसा | वशम् | आनयत्
तमसा | लोकम् | आवृत्य | एव | भारत
मत्स्यगन्धो महानासीत्पुरा मम जुगुप्सितः तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात्स मे मुनिः
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मत्स्य + गन्ध | महान् | आसीत् | पुरा | मम | जुगुप्सितः
तम् | अपास्य | शुभं | गन्धम् | इमं | प्रादात् | स | मे | मुनिः
ततो मामाह मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि
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ततो | माम् | आह | स | मुनिर् | गर्भम् | उत्सृज्य | मामकम्
द्वीपे | ऽस्या | एव | सरितः | कन्या + एव | त्वं | भविष्यसि
पाराशर्यो महायोगी बभूव महानृषिः कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति स्मृतः
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पाराशर्यो | महत् + योगिन् | स | बभूव | महान् | ऋषिः
ययातिर् | मम | पुत्राणां | मातामह | इति | स्मृतः
यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः लोके व्यासत्वमापेदे कार्ष्ण्यात्कृष्णत्वमेव
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यो | व्यस्य | वेद + चतुर् + तपस् | भगवान् | ऋषिः
लोके | व्यास + त्व | आपेदे | कार्ष्ण्यात् | कृष्ण + त्व | एव | च
सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया अमितद्युते भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति
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सत्य + वादिन् | शम + पर + तपस्विन् | दह् + किल्बिष
स | नियुक्तो | मया | व्यक्तं | त्वया | च | अमित + द्युति
भ्रातुः | क्षेत्रेषु | कल्याणम् | अपत्यं | जनयिष्यति
हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृत्येषु मामिति तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि
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स | हि | माम् | वच् + तत्र | स्मरेः | कृत्येषु | माम् | इति
तं | स्मरिष्ये | महत् + बाहु | यदि | भीष्म | त्वम् | इच्छसि
तव ह्यनुमते भीष्म नियतं महातपाः विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यति
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तव | हि + अनुमत | भीष्म | नियतं | स | महत् + तपस्
विचित्रवीर्य + क्षेत्र | यः | समुत्पादयेत् | प्रजाः
महर्षेः कीर्तने तस्य भीष्मः प्राञ्जलिरब्रवीत् धर्ममर्थं कामं त्रीनेतान्योऽनुपश्यति
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महत् + ऋषि | कीर्तने | तस्य | भीष्मः | प्राञ्जलिर् | अब्रवीत्
धर्मम् | अर्थं | च | कामं | च | त्रीन् | एतान् | यो | ऽनुपश्यति
अर्थमर्थानुबन्धं धर्मं धर्मानुबन्धनम् कामं कामानुबन्धं विपरीतान्पृथक्पृथक् यो विचिन्त्य धिया सम्यग्व्यवस्यति बुद्धिमान्
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अर्थम् | अर्थ + अनुबन्ध | च | धर्मं | धर्म + अनुबन्धन
कामं | काम + अनुबन्ध | च | विपरीतान् | पृथक् | पृथक्
यो | विचिन्त्य | धिया | सम्यग् | व्यवस्यति | स | बुद्धिमान्
तदिदं धर्मयुक्तं हितं चैव कुलस्य नः उक्तं भवत्या यच्छ्रेयः परमं रोचते मम
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तद् | इदं | धर्म + युज् | च | हितं | च + एव | कुलस्य | नः
उक्तं | भवत्या | यद् + श्रेयस् | परमं | रोचते | मम
ततस्तस्मिन्प्रतिज्ञाते भीष्मेण कुरुनन्दन कृष्णद्वैपायनं काली चिन्तयामास वै मुनिम्
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ततस् + तद् | प्रतिज्ञाते | भीष्मेण | कुरु + नन्दन
कृष्णद्वैपायनं | काली | चिन्तयामास | वै | मुनिम्
वेदान्विब्रुवन्धीमान्मातुर्विज्ञाय चिन्तितम् प्रादुर्बभूवाविदितः क्षणेन कुरुनन्दन
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स | वेदान् | विब्रुवन् | धीमान् | मातुर् | विज्ञाय | चिन्तितम्
प्रादुर्भू + अविदित | क्षणेन | कुरु + नन्दन
तस्मै पूजां तदा दत्त्वा सुताय विधिपूर्वकम् परिष्वज्य बाहुभ्यां प्रस्नवैरभिषिच्य मुमोच बाष्पं दाशेयी पुत्रं दृष्ट्वा चिरस्य तम्
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तस्मै | पूजां | तदा | दत्त्वा | सुताय | विधि + पूर्वक
परिष्वज्य | च | बाहुभ्यां | स्मित + पूर्वम् | उदैक्षत
मुमोच | बाष्पं | दाशेयी | पुत्रं | दृष्ट्वा | चिरस्य | तम्
तामद्भिः परिषिच्यार्तां महर्षिरभिवाद्य मातरं पूर्वजः पुत्रो व्यासो वचनमब्रवीत्
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ताम् | अद्भिः | परिषिच् + आर्त | महत् + ऋषि | अभिवाद्य | च
मातरं | पूर्वजः | पुत्रो | व्यासो | वचनम् | अब्रवीत्
भवत्या यदभिप्रेतं तदहं कर्तुमागतः शाधि मां धर्मतत्त्वज्ञे करवाणि प्रियं तव
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भवत्या | यद् | अभिप्रेतं | तद् | अहं | कर्तुम् | आगतः
शाधि | मां | धर्म + तत्त्व + ज्ञ | करवाणि | प्रियं | तव
तस्मै पूजां ततोऽकार्षीत्पुरोधाः परमर्षये तां प्रतिजग्राह विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्
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तस्मै | पूजां | ततो | ऽकार्षीत् | पुरोधाः | परम + ऋषि
गृहाण | पाणिं | विधिवन् | मम | मन्त्र + पुरस्कृ
तमासनगतं माता पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् सत्यवत्यभिवीक्ष्यैनमुवाचेदमनन्तरम्
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तम् | आसन + गम् | माता | पृष्ट्वा | कुशलम् | अव्ययम्
माता | सत्यवती | भीष्मम् | उवाच | तद् + अनन्तर
मातापित्रोः प्रजायन्ते पुत्राः साधारणाः कवे तेषां पिता यथा स्वामी तथा माता संशयः
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माता + पितृ | प्रजायन्ते | पुत्राः | साधारणाः | कवे
तेषां | पिता | यथा | स्वामी | तथा | माता | न | संशयः
विधातृविहितः त्वं यथा मे प्रथमः सुतः विचित्रवीर्यो ब्रह्मर्षे तथा मेऽवरजः सुतः
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विधातृ + विधा | स | त्वं | यथा | मे | प्रथमः | सुतः
विचित्रवीर्यो | ब्रह्मन् + ऋषि | तथा | मे | ऽवरजः | सुतः
यथैव पितृतो भीष्मस्तथा त्वमपि मातृतः भ्राता विचित्रवीर्यस्य यथा वा पुत्र मन्यसे
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यथा + एव | पितृतो | भीष्म + तथा | त्वम् | अपि | मातृतः
भीष्मो | विचित्रवीर्यस्य | विवाह + कृ | मतिम्
अयं शांतनवः सत्यं पालयन्सत्यविक्रमः बुद्धिं कुरुतेऽपत्ये तथा राज्यानुशासने
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अयं | शांतनवः | सत्यं | पालयन् | सत्य + विक्रम
बुद्धिं | न | कुरुते | ऽपत्ये | तथा | राज्य + अनुशासन
त्वं व्यपेक्षया भ्रातुः संतानाय कुलस्य भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ
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विश्वासात् | ते | प्रवक्ष्यामि | संतानाय | कुलस्य | च
भीष्मस्य | च + इदम् | वचनान् | नियोग + च | मद् + अनघ
अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय आनृशंस्येन यद्ब्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि
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अनुक्रोश + च | भूतानां | सर्वेषां | रक्षणाय | च
कार्ये | त्वां | विनियोक्ष्यामि | तद् + श्रु | कर्तुम् | अर्हसि
यवीयसस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे रूपयौवनसंपन्ने पुत्रकामे धर्मतः
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यवीयस् + त्वद् | भ्रातुर् | भार्ये | सुर + सुता + उपम
रूप + यौवन + सम्पद् | पुत्र + काम | च | भारत
तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्याः प्रसवस्य
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तयोर् | उत्पादय् + अपत्य | समर्थो | हि + अस् | पुत्रक
अनुरूपं | कुल + इदम् | संतत्याः | प्रसवस्य | च
वेत्थ धर्मं सत्यवति परं चापरमेव यथा तव धर्मज्ञे धर्मे प्रणिहिता मतिः
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वेत्थ | धर्मं | सत्यवति | परं | च + अपर | एव | च
यथा | च | तव | धर्म + ज्ञ | धर्मे | प्रणिहिता | मतिः
तस्मादहं त्वन्नियोगाद्धर्ममुद्दिश्य कारणम् ईप्सितं ते करिष्यामि दृष्टं ह्येतत्पुरातनम्
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तस्माद् | अहं | त्वद् + नियोग | धर्मम् | उद्दिश्य | कारणम्
ईप्सितं | ते | करिष्यामि | दृष्टं | हि + एतद् | पुरातनम्
भ्रातुः पुत्रान्प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान् व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया
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भ्रातुः | पुत्रान् | प्रदास्यामि | मित्रावरुणयोः | समान्
व्रतं | चरेतां | ते | देव्यौ | निर्दिष्टम् | इह | यन् | मया
संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः हि मामव्रतोपेता उपेयात्काचिदङ्गना
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संवत्सरं | यथान्यायं | ततः | शुद्धे | भविष्यतः
न | हि | माम् | अव्रत + उपे | उपेयात् | काचिद् | अङ्गना
यथा सद्यः प्रपद्येत देवी गर्भं तथा कुरु अराजकेषु राष्ट्रेषु नास्ति वृष्टिर्न देवताः
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यथा | सद्यः | प्रपद्येत | देवी | गर्भं | तथा | कुरु
अराजकेषु | राष्ट्रेषु | न + अस् | वृष्टिर् | न | देवताः
कथमराजकं राष्ट्रं शक्यं धारयितुं प्रभो तस्माद्गर्भं समाधत्स्व भीष्मस्तं वर्धयिष्यति
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कथम् | अराजकं | राष्ट्रं | शक्यं | धारयितुं | प्रभो
तस्माद् | गर्भं | समाधत्स्व | भीष्म + तद् | वर्धयिष्यति
यदि पुत्रः प्रदातव्यो मया क्षिप्रमकालिकम् विरूपतां मे सहतामेतदस्याः परं व्रतम्
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यदि | पुत्रः | प्रदातव्यो | मया | क्षिप्रम् | अकालिकम्
विरूपतां | मे | सहताम् | एतद् | अस्याः | परं | व्रतम्
यदि मे सहते गन्धं रूपं वेषं तथा वपुः अद्यैव गर्भं कौसल्या विशिष्टं प्रतिपद्यताम्
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यदि | मे | सहते | गन्धं | रूपं | वेषं | तथा | वपुः
अद्य + एव | गर्भं | कौसल्या | विशिष्टं | प्रतिपद्यताम्
समागमनमाकाङ्क्षन्निति सोऽन्तर्हितो मुनिः ततोऽभिगम्य सा देवी स्नुषां रहसि संगताम् धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचनं हितम्
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समागमनम् | आकाङ्क्षन्न् | इति | सो | ऽन्तर्हितो | मुनिः
ततो | ऽभिगम्य | सा | देवी | स्नुषां | रहसि | संगताम्
धर्म्यम् | अर्थ + समायुज् | उवाच | वचनं | हितम्
कौसल्ये धर्मतन्त्रं यद्ब्रवीमि त्वां निबोध मे भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात्
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कौसल्ये | धर्म + तन्त्र | यद् | ब्रवीमि | त्वां | निबोध | मे
भरतानां | समुच्छेदो | व्यक्तं | मद् + भाग्य + संक्षय
व्यथितां मां संप्रेक्ष्य पितृवंशं पीडितम् भीष्मो बुद्धिमदान्मेऽत्र धर्मस्य विवृद्धये
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व्यथितां | मां | च | सम्प्रेक्ष्य | पितृ + वंश | च | पीडितम्
भीष्मो | बुद्धिम् | अदान् | मे | ऽत्र | धर्मस्य | च | विवृद्धये
सा बुद्धिस्तवाधीना पुत्रि ज्ञातं मयेति नष्टं भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर
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सा | च | बुद्धि + त्वद् + अधीन | पुत्रि | ज्ञातं | मद् + इति | ह
नष्टं | च | भारतं | वंशं | पुनर् | एव | समुद्धर
पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम् हि राज्यधुरं गुर्वीमुद्वक्ष्यति कुलस्य नः
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पुत्रं | जनय | सुश्रोणि | देवराज + सम + प्रभा
स | हि | राज्य + धुर् | गुर्वीम् | उद्वक्ष्यति | कुलस्य | नः
सा धर्मतोऽनुनीयैनां कथंचिद्धर्मचारिणीम् भोजयामास विप्रांश्च देवर्षीनतिथींस्तथा
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सा | धर्मतो | अनुनी + एनद् | कथंचिद् | धर्म + चारिन्
भोजयामास | विप्र + च | देव + ऋषि | अतिथि + तथा