Vidya Kendra
Mahābhārata
Home Introduction Reader Glossary All Resources
Vidyakendra
Vidyakendra Home

Navigate to Verse

Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.93 (46 verses)
Powered by Aksharamukha

Search Mahābhārata

Try searching for: dharma, युद्ध, Arjuna, 1.1.5 (verse reference)
Quick Navigation: Start Browse Parvas
❖ ❖ ❖

Chapter 1.93

आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं दुष्कृतम् यस्याभिशापात्ते सर्वे मानुषीं तनुमागताः
View Padaccheda
आपवो | नाम | को | नु + एतद् | वसूनां | किं | च | दुष्कृतम्
यद् + अभिशाप | ते | सर्वे | मानुषीं | तनुम् | आगताः
अनेन कुमारेण गङ्गादत्तेन किं कृतम् यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति
View Padaccheda
अनेन | च | कुमारेण | गङ्गा + दा | किं | कृतम्
यस्य | च + एव | कृत + इदम् | मानुषेषु | निवत्स्यति
ईशानाः सर्वलोकस्य वसवस्ते वै कथम् मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि
View Padaccheda
ईशानाः | सर्व + लोक | वसु + तद् | च | वै | कथम्
मानुष + उत्पद् | तन् | मद् + आचक्ष् | जाह्नवि
सैवमुक्ता ततो गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् भर्तारं जाह्नवी देवी शंतनुं पुरुषर्षभम्
View Padaccheda
तद् + एवम् | उक्ता | ततो | गङ्गा | राजानम् | इदम् | अब्रवीत्
भर्तारं | जाह्नवी | देवी | शंतनुं | पुरुष + ऋषभ
यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम वसिष्ठो नाम मुनिः ख्यात आपव इत्युत
View Padaccheda
यं | लेभे | वरुणः | पुत्रं | पुरा | भरत + सत्तम
वसिष्ठो | नाम | स | मुनिः | ख्यात | आपव | इति + उत
तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिगणान्वितम् मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम्
View Padaccheda
आश्रम + प्रवर | पुण्यं | महत् + ऋषि + गण + सेव्
मेरोः | पार्श्वे | नग + इन्द्र | सर्व + ऋतु + कुसुम + आवृ
वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन्भरतसत्तम वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके
View Padaccheda
स | वारुणि + तपस् + तप् | तस्मिन् | भरत + सत्तम
वने | पुण्य + कृत् | श्रेष्ठः | स्वादु + मूल + फल + उदक
दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यतिगर्विता गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद्भरतर्षभ
View Padaccheda
दक्षस्य | दुहिता | या | तु
गां | प्रजाता | तु | सा | देवी | कश्यपाद् | भरत + ऋषभ
अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुघां वराम् तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं वारुणिः
View Padaccheda
अनुग्रह + अर्थ | जगतः | सर्व + कामदुघा | वराम्
तां | लेभे | गां | तु | धर्म + आत्मन् | होमधेनुं | स | वारुणिः
सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते चचार रम्ये धर्म्ये गौरपेतभया तदा
View Padaccheda
सा | तद् + तापस + अरण्य | वसन्ती | मुनि + सेव्
चचार | रम्ये | धर्म्ये | च | गौर् | अपे + भय | तदा
अथ तद्वनमाजग्मुः कदाचिद्भरतर्षभ पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवदेवर्षिसेवितम्
View Padaccheda
अथ | तद् | वनम् | आजग्मुः | कदाचिद् | भरत + ऋषभ
पृथु + आद्य | वसवः | सर्वे | देव + देवर्षि + सेव्
ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु
View Padaccheda
ते | स + दार | वनं | तद् + च | व्यचरन्त | समन्ततः
रेमिरे | रमणीयेषु | पर्वतेषु | वनेषु | च
तत्रैकस्य तु भार्या वै वसोर्वासवविक्रम सा चरन्ती वने तस्मिन्गां ददर्श सुमध्यमा या सा वसिष्ठस्य मुनेः सर्वकामधुगुत्तमा
View Padaccheda
तत्र + एक | तु | भार्या | वै | वसोर् | वासव + विक्रम
सा | चरन्ती | वने | तस्मिन् | गां | ददर्श | सुमध्यमा
या | सा | वसिष्ठस्य | मुनेः | सर्व + कामदुह् | उत्तमा
सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसंपदा दिवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण
View Padaccheda
सा | विस्मय + समाविश् | शील + द्रविण + सम्पद्
दिवे | वै | दर्शयामास | तां | गां | गो + वृषभ + ईक्षण
स्वापीनां सुदोग्ध्रीं सुवालधिमुखां शुभाम् उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन
View Padaccheda
स्वापीनां | च | सुदोग्ध्रीं | च | सुवालधि + मुख | शुभाम्
उपपन्नां | गुणैः | सर्वैः | शील + अनुत्तम | च
एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन
View Padaccheda
एवंगुण + समायुज् | ददर्श | स | वनं | नृपः
दर्शयामास | राजन् + इन्द्र | पुरा | पौरव + नन्दन
द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वैव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान्वदन्
View Padaccheda
दिव् + तदा | तां | तु | दृश् + एव | गां | गज + इन्द्र + विक्रम
उवाच | राजन् + तद् | देवीं | नृप + उत्तम | सुमध्यमाम्
एषा गौरुत्तमा देवि वारुणेरसितेक्षणे ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम्
View Padaccheda
एषा | गौर् | उत्तमा | देवि | वारुणेर् | असित + ईक्षण
ऋषि + तद् | वरारोहे | यद् + इदम् | वनम् | उत्तमम्
अस्याः क्षीरं पिबेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे दश वर्षसहस्राणि जीवेत्स्थिरयौवनः
View Padaccheda
अस्याः | क्षीरं | पिबेन् | मर्त्यः | स्वादु | यो | वै | सुमध्यमे
दश | वर्ष + सहस्र | स | जीवेत् | स्थिर + यौवन
एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम्
View Padaccheda
उवाच | राजन् + तद् | देवीं | नृप + उत्तम | सुमध्यमाम्
तम् | वच् + अनवद्य + अङ्ग | भर्तारं | दीप् + तेजस्
अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी नाम्ना जिनवती नाम रूपयौवनशालिनी
View Padaccheda
अस्ति | मे | मानुषे | लोके | नर + देव + आत्मजा | सखी
नाम्ना | जिनवती | नाम | रूप + यौवन + शालिन्
उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसंधस्य धीमतः दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसंपदा
View Padaccheda
उशीनरस्य | राजर्षेः | सत्य + संधा | धीमतः
दुहिता | प्रथिता | लोके | मानुषे | रूप + सम्पद्
तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन
View Padaccheda
तस्या | हेतोर् | महाभाग | स + वत्स | गां | मद् + ईप्सय्
आनी + अमर + श्रेष्ठ | त्वरितं | पुण्य + वर्धन
यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता
View Padaccheda
यावद् | अस्याः | पयः | पीत्वा | सा | सखी | मम | मानद
मानुषेषु | भू + एक | जरा + रोग + विवर्जय्
एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत्कथंचन
View Padaccheda
एतन् | मम | महाभाग | कर्तुम् | अर्ह् + अनिन्दित
प्रियं | प्रियतरं | हि + इदम् | न + अस् | मे | ऽन्यत् | कथंचन
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम्
View Padaccheda
एतद् + श्रु | वचस् + तद् | देव्याः | प्रिय + चिकीर्षा
पृथु + आद्य | भ्रातृभिः | सार्धं | दिव् + तदा | तां | जहार | गाम्
तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ऋषेस्तस्य तपस्तीव्रं शशाक निरीक्षितुम् हृता गौः सा तदा तेन प्रपातस्तु तर्कितः
View Padaccheda
तया | कमल + पत्त्र + अक्ष | नियुक्तो | दिव् + तदा | नृप
ऋषि + तद् | तपस् + तीव्र | न | शशाक | निरीक्षितुम्
हृता | गौः | सा | तदा | तेन | प्रपात + तु | न | तर्कितः
अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः चापश्यत गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे
View Padaccheda
अथ + आश्रम + पद | प्राप्तः | फल + आदा | वारुणिः
न | च + पश् | गां | तत्र | स + वत्स | कानन + उत्तम
ततः मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः नाध्यगच्छच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः
View Padaccheda
ततः | स | मृगयामास | वने | तद् + तपोधन
न + अधिगम् + च | मृगय् + तद् | गां | मुनिर् | उदार + धी
ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप वसूंस्तदा
View Padaccheda
ज्ञात्वा | तथा + अपनी | तां | वसुभिर् | दिव्य + दर्शन
ययौ | क्रोध + वश | सद्यः | शशाप | च | वसु + तदा
यस्मान्मे वसवो जह्रुर्गां वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु संशयः
View Padaccheda
यस्मान् | मे | वसवो | जह्रुर् | गां | वै | दोग्ध्रीं | सुवालधिम्
तस्मात् | सर्वे | जनिष्यन्ति | मानुषेषु | न | संशयः
एवं शशाप भगवान्वसूंस्तान्मुनिसत्तमः वशं कोपस्य संप्राप्त आपवो भरतर्षभ
View Padaccheda
एवं | शशाप | भगवान् | वसु + तद् | मुनि + सत्तम
वशं | कोपस्य | सम्प्राप्त | आपवो | भरत + ऋषभ
शप्त्वा तान्महाभागस्तपस्येव मनो दधे एवं शप्तवान्राजन्वसूनष्टौ तपोधनः महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान्रोषसमन्वितः
View Padaccheda
शप्त्वा | च | तान् | महाभाग + तपस् + एव | मनो | दधे
एवं | स | शप्तवान् | राजन् | वसून् | अष्टौ | तपोधनः
महत् + प्रभाव | ब्रह्मर्षिर् | देवान् | रोष + समन्वित
अथाश्रमपदं प्राप्य तं स्म भूयो महात्मनः शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः
View Padaccheda
परं | च + अभिप्रया | चक्रं | तस्य | महात्मनः
शप्ताः | स्म | इति | जानन्त | ऋषिं | तम् | उपचक्रमुः
प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ लेभिरे तस्मात्ते प्रसादमृषिसत्तमात् आपवात्पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात्
View Padaccheda
प्रसादय् + तद् | ऋषिं | वसवः | पार्थिव + ऋषभ
न | लेभिरे | च | तस्मात् | ते | प्रसादम् | ऋषि + सत्तम
आपवात् | पुरुष + व्याघ्र | सर्व + धर्म + विशारद
उवाच धर्मात्मा सप्त यूयं धरादयः अनु संवत्सराच्छापमोक्षं वै समवाप्स्यथ
View Padaccheda
उवाच | च | स | धर्म + आत्मन् | सप्त | यूयं | धर + आदि
अनु | संवत्सर + शाप + मोक्ष | वै | समवाप्स्यथ
अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः वत्स्यति द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणा
View Padaccheda
अयं | तु | यत्कृते | यूयं | मया | शप्ताः | स | वत्स्यति
दिव् + तदा | मानुषे | लोके | दीर्घ + काल | स्व + कर्मन्
नानृतं तच्चिकीर्षामि युष्मान्क्रुद्धो यदब्रुवम् प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः
View Padaccheda
न + अनृत | तद् + चिकीर्ष् | युष्मान् | क्रुद्धो | यद् | अब्रुवम्
न | प्रजास्यति | च + अपि + एतद् | मानुषेषु | महत् + मनस्
भविष्यति धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान्वर्जयिष्यति एवमुक्त्वा वसून्सर्वाञ्जगाम भगवानृषिः
View Padaccheda
भविष्यति | च | धर्म + आत्मन् | सर्व + शास्त्र + विशारद
पितुः | प्रिय + हित | युक्तः | स्त्री + भोग | वर्जयिष्यति
एवम् | उक्त्वा | वसून् | सर्वाञ् | जगाम | भगवान् | ऋषिः
ततो मामुपजग्मुस्ते समस्ता वसवस्तदा अयाचन्त मां राजन्वरं मया कृतः जाताञ्जातान्प्रक्षिपास्मान्स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि
View Padaccheda
ततो | माम् | उपगम् + तद् | समस्ता | वसु + तदा
अयाचन्त | च | मां | राजन् | वरं | स | च | मया | कृतः
जाताञ् | जातान् | प्रक्षिप् + मद् | स्वयं | गङ्गे | त्वम् | अम्भसि
एवं तेषामहं सम्यक्शप्तानां राजसत्तम मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद्यथावत्कृतवत्यहम्
View Padaccheda
एवं | तेषाम् | अहं | सम्यक् | शप्तानां | राजन् + सत्तम
मोक्ष + अर्थ | मानुष + लोक | यथावत् | कृ + मद्
अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम द्यौ राजन्मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत
View Padaccheda
अयं | शापाद् | ऋषि + तद् | एक | एव | नृप + उत्तम
राजन् | मानुषे | लोके | चिरं | वत्स्यति | भारत
एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत आदाय कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम्
View Padaccheda
तथा + इति + वच् | तु | सा | राजन् + तत्र + एव + अन्तर्धा
आदाय | च | कुमारं | तं | गम् + अथ | यथा + ईप्सय्
तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् द्विनामा शंतनोः पुत्रः शंतनोरधिको गुणैः
View Padaccheda
स | तु | देवव्रतो | नाम | गाङ्गेय | इति | च + भू
द्वि + नामन् | शंतनोः | पुत्रः | शंतनोर् | अधिको | गुणैः
शंतनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः तस्याहं कीर्तयिष्यामि शंतनोरमितान्गुणान्
View Padaccheda
शंतनु + च + अपि | शोक + आर्त | जगाम | स्व + पुर | ततः
तद् + मद् | कीर्तयिष्यामि | शंतनोर् | अमितान् | गुणान्
महाभाग्यं नृपतेर्भारतस्य यशस्विनः यस्येतिहासो द्युतिमान्महाभारतमुच्यते
View Padaccheda
महाभाग्यं | च | नृपतेर् | भारतस्य | यशस्विनः
यद् + इतिहास | द्युतिमान् | महाभारतम् | उच्यते