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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.216 (34 verses)
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Chapter 1.216

एवमुक्तस्तु भगवान्धूमकेतुर्हुताशनः चिन्तयामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षया आदित्यमुदके देवं निवसन्तं जलेश्वरम्
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एवम् | वच् + तु | भगवान् | धूमकेतुर् | हुताशनः
चिन्तयामास | वरुणं | लोकपालं | दिदृक्षया
आदित्यम् | उदके | देवं | निवसन्तं | जलेश्वरम्
तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास पावकम् तमब्रवीद्धूमकेतुः प्रतिपूज्य जलेश्वरम् चतुर्थं लोकपालानां रक्षितारं महेश्वरम्
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स | च | तद् + चिन्तित | ज्ञात्वा | दर्शयामास | पावकम्
तम् | अब्रवीद् | धूमकेतुः | प्रतिपूज्य | जलेश्वरम्
चतुर्थं | लोकपालानां | रक्षितारं | महेश्वरम्
सोमेन राज्ञा यद्दत्तं धनुश्चैवेषुधी ते तत्प्रयच्छोभयं शीघ्रं रथं कपिलक्षणम्
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सोमेन | राज्ञा | यद् | दत्तं | धनुस् + च + एव + इषुधि | च | ते
तत् | प्रयम् + उभय | शीघ्रं | रथं | च | कपि + लक्षण
कार्यं हि सुमहत्पार्थो गाण्डीवेन करिष्यति चक्रेण वासुदेवश्च तन्मदर्थे प्रदीयताम् ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभाषत
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कार्यं | हि | सु + महत् | पार्थो | गाण्डीवेन | करिष्यति
चक्रेण | वासुदेव + च | तन् | मद् + अर्थ | प्रदीयताम्
दा + इति + एव | तं | तत्र | राजानं | प्रत्युवाच | ह
ततोऽद्भुतं महावीर्यं यशःकीर्तिविवर्धनम् सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि सर्वायुधमहामात्रं परसेनाप्रधर्षणम्
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ततो | ऽद्भुतं | महत् + वीर्य | यशस् + कीर्ति + विवर्धन
सर्व + शस्त्र | अनाधृष्यं | सर्व + शस्त्र + प्रमाथिन् | च
सर्व + आयुध + महामात्र | पर + सेना + प्रधर्षण
एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् चित्रमुच्चावचैर्वर्णैः शोभितं श्लक्ष्णमव्रणम्
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एकं | शत + सहस्र | संमितं | राष्ट्र + वर्धन
चित्रम् | उच्चावचैर् | वर्णैः | शोभितं | श्लक्ष्णम् | अव्रणम्
देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः प्रादाद्वै धनुरत्नं तदक्षय्यौ महेषुधी
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देव + दानव + गन्धर्व | पूजितं | शाश्वतीः | समाः
प्रादाद् | वै | धनु + रत्न | तद् | अक्षय्यौ | च | महत् + इषुधि
रथं दिव्याश्वयुजं कपिप्रवरकेतनम् उपेतं राजतैरश्वैर्गान्धर्वैर्हेममालिभिः पाण्डुराभ्रप्रतीकाशैर्मनोवायुसमैर्जवे
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रथं | च | दिव्य + अश्व + युज् | कपि + प्रवर + केतन
उपेतं | राजतैर् | अश्वैर् | गान्धर्वैर् | हेमन् + मालिन्
पाण्डुर + अभ्र + प्रतीकाश | मनस् + वायु + सम | जवे
सर्वोपकरणैर्युक्तमजय्यं देवदानवैः भानुमन्तं महाघोषं सर्वभूतमनोहरम्
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सर्व + उपकरण | युक्तम् | अजय्यं | देव + दानव
भानुमन्तं | महत् + घोष | सर्व + भूत + मनोहर
ससर्ज यत्स्वतपसा भौवनो भुवनप्रभुः प्रजापतिरनिर्देश्यं यस्य रूपं रवेरिव
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ससर्ज | यत् | स्व + तपस् | भौवनो | भुवन + प्रभु
प्रजापतिर् | अनिर्देश्यं | यस्य | रूपं | रवेर् | इव
यं स्म सोमः समारुह्य दानवानजयत्प्रभुः नगमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव श्रिया
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यं | स्म | सोमः | समारुह्य | दानवान् | अजयत् | प्रभुः
नग + मेघ + प्रतीकाश | ज्वलन्तम् | इव | च | श्रिया
आश्रिता तं रथश्रेष्ठं शक्रायुधसमा शुभा तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा
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आश्रिता | तं | रथ + श्रेष्ठ | शक्र + आयुध + सम | शुभा
तापनीया | सुरुचिरा | ध्वज + यष्टि | अनुत्तमा
तस्यां तु वानरो दिव्यः सिंहशार्दूललक्षणः विनर्दन्निव तत्रस्थः संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत
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तस्यां | तु | वानरो | दिव्यः | सिंह + शार्दूल + लक्षण
विनर्दन्न् | इव | तत्रस्थः | संस्थितो | मूर्धन् + शुभ्
ध्वजे भूतानि तत्रासन्विविधानि महान्ति नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति
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शयन + आसन + यान | विविधानि | महान्ति | च
नादेन | रिपु + सैन्य | येषां | संज्ञा | प्रणश्यति
तं नानापताकाभिः शोभितं रथमुत्तमम् प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्यः प्रणम्य
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स | तं | नाना + पताका | शोभितं | रथम् | उत्तमम्
प्रदक्षिणम् | उपावृत्य | दैवतेभ्यः | प्रणम्य | च
संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् आरुरोह रथं पार्थो विमानं सुकृती यथा
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संनद्धः | कवची | खड्गी | बन्ध् + गोधा + अङ्गुलित्रवत्
आरुरोह | रथं | पार्थो | विमानं | सुकृती | यथा
तच्च दिव्यं धनुःश्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा गाण्डीवमुपसंगृह्य बभूव मुदितोऽर्जुनः
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तद् | दिव्यं | धनुषां | श्रेष्ठं | ब्रह्मणा | निर्मितं | पुरा
गाण्डीवम् | उपसंगृह्य | बभूव | मुदितो | ऽर्जुनः
हुताशनं नमस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् जग्राह बलमास्थाय ज्यया युयुजे धनुः
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हुताशनं | नमस्कृत्य | ततस् + तद् | अपि | वीर्यवान्
जग्राह | बलम् | आस्थाय | ज्यया | च | युयुजे | धनुः
मौर्व्यां तु युज्यमानायां बलिना पाण्डवेन येऽशृण्वन्कूजितं तत्र तेषां वै व्यथितं मनः
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मौर्व्यां | तु | युज्यमानायां | बलिना | पाण्डवेन | ह
ये | ऽशृण्वन् | कूजितं | तत्र | तेषां | वै | व्यथितं | मनः
लब्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाक्षय्यौ महेषुधी बभूव कल्यः कौन्तेयः प्रहृष्टः साह्यकर्मणि
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प्रादाद् | वै | धनु + रत्न | तद् | अक्षय्यौ | च | महत् + इषुधि
बभूव | कल्यः | कौन्तेयः | प्रहृष्टः | साह्य + कर्मन्
वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय पावकः आग्नेयमस्त्रं दयितं कल्योऽभवत्तदा
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वज्रनाभं | ततस् + चक्र | ददौ | कृष्णाय | पावकः
आग्नेयम् | अस्त्रं | दयितं | स | च | कल्यो | ऽभवत् | तदा
अब्रवीत्पावकश्चैनमेतेन मधुसूदन अमानुषानपि रणे विजेष्यसि संशयः
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अब्रवीत् | पावक + च + एनद् | एतेन | मधुसूदन
अमानुषान् | अपि | रणे | विजेष्यसि | न | संशयः
अनेन त्वं मनुष्याणां देवानामपि चाहवे रक्षःपिशाचदैत्यानां नागानां चाधिकः सदा भविष्यसि संदेहः प्रवरारिनिबर्हणे
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अनेन | त्वं | मनुष्याणां | देवानाम् | अपि | च + आहव
रक्षस् + पिशाच + दैत्य | नागानां | च + अधिक | सदा
भविष्यसि | न | संदेहः | प्रवर + अरि + निबर्हण
क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत्त्वया माधव शत्रुषु हत्वाप्रतिहतं संख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः
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क्षिप्तं | क्षिप्तं | रणे | च + एतद् | त्वया | माधव | शत्रुषु
हन् + अप्रतिहत | संख्ये | पाणिम् | एष्यति | ते | पुनः
वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्वनाम् दैत्यान्तकरणीं घोरां नाम्ना कौमोदकीं हरेः
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वरुण + च | ददौ | तस्मै | गदाम् | अशनि + निःस्वन
दैत्य + अन्त + करण | घोरां | नाम्ना | कौमोदकीं | हरेः
ततः पावकमब्रूतां प्रहृष्टौ कृष्णपाण्डवौ कृतास्त्रौ शस्त्रसंपन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि
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तौ | विहृत्य | यथाकामं | प्रभासे | कृष्ण + पाण्डव
कृ + अस्त्र | शस्त्र + सम्पद् | रथिनौ | ध्वजिन् + अपि
कल्यौ स्वो भगवन्योद्धुमपि सर्वैः सुरासुरैः किं पुनर्वज्रिणैकेन पन्नगार्थे युयुत्सुना
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कल्यौ | स्वो | भगवन् | योद्धुम् | अपि | सर्वैः | सुर + असुर
किं | पुनर् | वज्रिन् + एक | पन्नग + अर्थ | युयुत्सुना
चक्रमस्त्रं वार्ष्णेयो विसृजन्युधि वीर्यवान् त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न जीयाज्जनार्दनः
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चक्रेण | भस्मसात् | सर्वं | विसृष्टेन | तु | वीर्यवान्
त्रिषु | लोकेषु | तन् | न + अस् | यन् | न | जि + जनार्दन
गाण्डीवं धनुरादाय तथाक्षय्यौ महेषुधी अहमप्युत्सहे लोकान्विजेतुं युधि पावक
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प्रादाद् | वै | धनु + रत्न | तद् | अक्षय्यौ | च | महत् + इषुधि
अहम् | अपि + उत्सह् | लोकान् | विजेतुं | युधि | पावक
सर्वतः परिवार्यैनं दावेन महता प्रभो कामं संप्रज्वलाद्यैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि
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सर्वतः | परिवारय् + एनद् | दावेन | महता | प्रभो
कामं | सम्प्रज्वल् + अद्य + एव | कल्यौ | स्वः | साह्य + कर्मन्
एवमुक्तः भगवान्दाशार्हेणार्जुनेन तैजसं रूपमास्थाय दावं दग्धुं प्रचक्रमे
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एवम् | उक्तः | स | भगवान् | दाशार्ह + अर्जुन | च
तैजसं | रूपम् | आस्थाय | दावं | दग्धुं | प्रचक्रमे
सर्वतः परिवार्याथ सप्तार्चिर्ज्वलनस्तदा ददाह खाण्डवं क्रुद्धो युगान्तमिव दर्शयन्
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सर्वतः | परिवारय् + अथ | सप्तार्चिर् | ज्वलन + तदा
ददाह | खाण्डवं | क्रुद्धो | युगान्तम् | इव | दर्शयन्
परिगृह्य समाविष्टस्तद्वनं भरतर्षभ मेघस्तनितनिर्घोषं सर्वभूतानि निर्दहन्
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परिगृह्य | समाविश् + तद् | वनं | भरत + ऋषभ
मेघ + स्तनित + निर्घोष | सर्व + भूत | निर्दहन्
दह्यतस्तस्य विबभौ रूपं दावस्य भारत मेरोरिव नगेन्द्रस्य काञ्चनस्य महाद्युतेः
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दह् + तद् | विबभौ | रूपं | दावस्य | भारत
आलयं | पन्नग + इन्द्र | तक्षकस्य | महात्मनः