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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.205 (30 verses)
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Chapter 1.205

एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीक्षितः
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मूलं | च | सु + दृढ | कृत्वा | हन् + अरि | पाण्डव + ततस्
वशे | शस्त्र + प्रताप | कुर्वन्तो | ऽन्यान् | महीक्षितः
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी
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तेषां | मनुज + सिंह | पञ्चानाम् | अमित + ओजस्
बभूव | कृष्णा | सर्वेषां | पार्थानां | वश + वर्तिन्
ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः बभूव परमप्रीता नागैरिव सरस्वती
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ते | तया | तद् + च | सा | वीरैः | पतिभिः | सह | पञ्चभिः
बभूव | परम + प्री | नागैर् | इव | सरस्वती
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु व्यवर्धन्कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः
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एवम् | उक्तेषु | राज्ञा | तु | पाण्डवेषु | महात्मसु
व्यवर्धन् | कुरवः | सर्वे | हा + दोष | सुख + अन्वित
अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशां पते कस्यचित्तस्कराः केचिज्जह्रुर्गा नृपसत्तम
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अचिर + एव | कालेन | स्व + राज्य + स्थ | भवन्ति | ते
कस्यचित् | तस्कराः | केचिज् | जह्रुर् | गा | नृप + सत्तम
ह्रियमाणे धने तस्मिन्ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत पाण्डवान्
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ह्रियमाणे | धने | तस्मिन् | ब्राह्मणः | क्रोध + मूर्छय्
आगम्य | खाण्डवप्रस्थम् | उदक्रोशत | पाण्डवान्
ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः प्रसह्य वोऽस्माद्विषयादभिधावत पाण्डवाः
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ह्रियते | गो + धन | क्षुद्रैर् | नृशंसैर् | अकृतात्मभिः
प्रसह्य | वो | ऽस्माद् | विषयाद् | अभिधावत | पाण्डवाः
ब्राह्मणस्य प्रमत्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैर्विलुप्यते शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्शति
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ब्राह्मणस्य | प्रमत्तस्य | हविर् | ध्वाङ्क्षैर् | विलुप्यते
शार्दूलस्य | गुहां | शून्यां | नीचः | क्रोष्टृ + अभिमृश्
ब्राह्मणस्वे हृते चोरैर्धर्मार्थे विलोपिते रोरूयमाणे मयि क्रियतामस्त्रधारणम्
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ब्राह्मण + स्व | हृते | चोरैर् | धर्म + अर्थ | च | विलोपिते
रोरूयमाणे | च | मयि | क्रियताम् | अस्त्र + धारण
रोरूयमाणस्याभ्याशे तस्य विप्रस्य पाण्डवः तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनंजयः
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रोरूय् + अभ्याश | तस्य | विप्रस्य | पाण्डवः
तानि | वाक्यानि | शुश्राव | कुन्ती + पुत्र | धनंजयः
श्रुत्वा चैव महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् आयुधानि यत्रासन्पाण्डवानां महात्मनाम् कृष्णया सह तत्रासीद्धर्मराजो युधिष्ठिरः
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श्रुत्वा | च + एव | महत् + बाहु | मा | भैर् | इति + अह् | तं | द्विजम्
स | श्रुत्वा | वचनं | तेषां | पाण्डवानां | महात्मनाम्
एवम् | उक्त्वा | महत् + बाहु | धर्मराजो | युधिष्ठिरः
प्रवेशाय चाशक्तो गमनाय पाण्डवः तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः
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स | प्रवेशाय | च + अ + शक् | गमनाय | च | पाण्डवः
तस्य | च + आर्त | तैर् | वाक्य + चोदय् | पुनः | पुनः
आक्रन्दे | तत्र | कौन्तेय + चिन्तय् | दुःखितः
ह्रियमाणे धने तस्मिन्ब्राह्मणस्य तपस्विनः अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चितः
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अभिसंधि + कृ | तस्मिन् | ब्राह्मणस्य | वधे | मया
अश्रु + प्रमार्जन | तस्य | कर्तव्यम् | इति | निश्चितः
उपप्रेक्षणजोऽधर्मः सुमहान्स्यान्महीपतेः यद्यस्य रुदतो द्वारि करोम्यद्य रक्षणम्
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उपप्रेक्षण + ज | ऽधर्मः | सु + महत् | स्यान् | महीपतेः
यदि + इदम् | रुदतो | द्वारि | न | कृ + अद्य | रक्षणम्
अनास्तिक्यं सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत्
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अनास्तिक्यं | च | सर्वेषाम् | अस्माकम् | अपि | रक्षणे
प्रतितिष्ठेत | लोके | ऽस्मिन्न् | अधर्म + च + एव | नो | भवेत्
अनापृच्छ्य राजानं गते मयि संशयः अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवाप्रियं भवेत्
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च | राजानं | गते | मयि | न | संशयः
अजात + शत्रु | नृपतेर् | मम | च + एव + अप्रिय | भवेत्
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम अधर्मो वा महानस्तु वने वा मरणं मम शरीरस्यापि नाशेन धर्म एव विशिष्यते
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अनुप्रवेशे | राजन् + तु | वन + वास | भवेन् | मम
अधर्मो | वा | महान् | अस्तु | वने | वा | मरणं | मम
शरीर + अपि | नाशेन | धर्म | एव | विशिष्यते
एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य विशां पते
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उवाच | तं | सत्य + धृति | कुन्ती + पुत्र | युधिष्ठिरः
अनुप्रविश्य | राजानम् | आपृच्छ्य | च | विशां | पते
धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत्परधनैषिणः
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धनुर् | आदाय | संहृष्टो | ब्राह्मणं | प्रत्यभाषत
ब्राह्मण + आगम् | शीघ्रं | यावत् | पर + धन + एषिन्
दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद्गच्छामहे सह यावदावर्तयाम्यद्य चोरहस्ताद्धनं तव
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न | दूरे | ते | गताः | क्षुद्रास् | तावद् | गच्छामहे | सह
यावद् | आवर्तय् + अद्य | चोर + हस्त | धनं | तव
सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी शरैर्विध्वंसितांश्चोरानवजित्य तद्धनम्
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सो | ऽनुसृत्य | महत् + बाहु | धन्वी | वर्मी | रथी | ध्वजी
शरैर् | विध्वंसय् + चोर | अवजित्य | च | तद् | धनम्
ब्राह्मणस्य उपाहृत्य यशः पीत्वा पाण्डवः आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची परंतपः
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ब्राह्मणस्य | उपाहृत्य | यशः | पीत्वा | च | पाण्डवः
धनुर्वेदे | गतः | पारं | सव्यसाची | परंतपः
सोऽभिवाद्य गुरून्सर्वांस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश्यतां मम
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सो | ऽभिवाद्य | गुरून् | सर्व + तद् + च + अपि | प्रतिनन्दितः
धर्मराजम् | वच् + इदम् | व्रतम् | आदिश्यतां | मम
समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शनान्मया वनवासं गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः
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समयः | समतिक्रान्तो | भवत् + संदर्शन | मया
वन + वास | गमिष्यामि | समयो | हि + एतद् | नः | कृतः
इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् कथमित्यब्रवीद्वाचा शोकार्तः सज्जमानया युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम्
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इति + वच् | धर्मराज + तु | सहसा | वाक्यम् | अप्रियम्
कथम् | इति + ब्रू | वाचा | शोक + आर्त | सज्जमानया
युधिष्ठिरो | गुडाकेशं | भ्राता | भ्रातरम् | अच्युतम्
प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ अनुप्रवेशे यद्वीर कृतवांस्त्वं ममाप्रियम् सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं मे हृदि
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प्रमाणम् | अस्मि | यदि | ते | मत्तः | शृणु | वचो | ऽनघ
अनुप्रवेशे | यद् | वीर | कृ + त्वद् | मद् + अप्रिय
सर्वं | तद् | अनुजानामि | व्यलीकं | न | च | मे | हृदि
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकः
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गुरोर् | अनुप्रवेशो | हि | न + उपघात | यवीयसः
यवीयसो | ऽनुप्रवेशो | ज्येष्ठस्य | विधि + लोपक
निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम हि ते धर्मलोपोऽस्ति मे धर्षणा कृता
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निवर्तस्व | महत् + बाहु | कुरुष्व | वचनं | मम
न | हि | ते | धर्म + लोप | ऽस्ति | न | च | मे | धर्षणा | कृता
व्याजेन चरेद्धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् सत्याद्विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे
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न | व्याजेन | चरेद् | धर्मम् | इति | मे | भवतः | श्रुतम्
न | सत्याद् | विचलिष्यामि | सत्य + आयुध | आलभे
सोऽभ्यनुज्ञाप्य राजानं ब्रह्मचर्याय दीक्षितः वने द्वादश वर्षाणि वासायोपजगाम
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सो | ऽभ्यनुज्ञाप्य | राजानं | ब्रह्मचर्याय | दीक्षितः
वने | द्वादश | वर्षाणि | वास + उपगम् | ह