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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.194 (25 verses)
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Chapter 1.194

दुर्योधन तव प्रज्ञा सम्यगिति मे मतिः ह्युपायेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुनन्दन
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दुर्योधन | तव | प्रज्ञा | न | सम्यग् | इति | मे | मतिः
न | हि + उपाय | ते | शक्याः | पाण्डवाः | कुरु + नन्दन
पूर्वमेव हि ते सूक्ष्मैरुपायैर्यतितास्त्वया निग्रहीतुं यदा वीर शकिता तदा त्वया
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पूर्वम् | एव | हि | ते | सूक्ष्मैर् | उपायैर् | यत् + त्वद्
निग्रहीतुं | यदा | वीर | शकिता | न | तदा | त्वया
इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव बाधितुम्
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इह + एव | वृत् + तद् | समीपे | तव | पार्थिव
अजात + पक्ष | शिशवः | शकिता | न + एव | बाधितुम्
जातपक्षा विदेशस्था विवृद्धाः सर्वशोऽद्य ते नोपायसाध्याः कौन्तेया ममैषा मतिरच्युत
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जन् + पक्ष | विदेश + स्थ | विवृद्धाः | सर्वशो | ऽद्य | ते
न + उपाय + साध् | कौन्तेया | मद् + एतद् | मतिर् | अच्युत
ते व्यसनैर्योक्तुं शक्या दिष्टकृता हि ते शङ्किताश्चेप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम्
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न | च | ते | व्यसनैर् | योक्तुं | शक्या | दिष्ट + कृ | हि | ते
शङ्क् + च + ईप्सु + एव | पितृपैतामहं | पदम्
परस्परेण भेदश्च नाधातुं तेषु शक्यते एकस्यां ये रताः पत्न्यां भिद्यन्ते परस्परम्
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परस्परेण | भेद + च | न + आधा | तेषु | शक्यते
एकस्यां | ये | रताः | पत्न्यां | न | भिद्यन्ते | परस्परम्
चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदयितुं परैः परिद्यूनान्वृतवती किमुताद्य मृजावतः
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न | च + अपि | कृष्णा | शक्येत | तेभ्यो | भेदयितुं | परैः
परिद्यूनान् | वृतवती | किम् | उत + अद्य | मृजावतः
ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता तं प्राप्तवती कृष्णा सा भेदयितुं सुखम्
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ईप्सय् + च | गुणः | स्त्रीणाम् | एकस्या | बहु + भर्तृता
तं | च | प्राप्तवती | कृष्णा | न | सा | भेदयितुं | सुखम्
आर्यवृत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा धनप्रियः संत्यक्ष्यति कौन्तेयान्राज्यदानैरपि ध्रुवम्
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आर्य + वृत् + च | पाञ्चाल्यो | न | स | राजा | धन + प्रिय
न | संत्यक्ष्यति | कौन्तेयान् | राज्य + दान | अपि | ध्रुवम्
तथास्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् तस्मान्नोपायसाध्यांस्तानहं मन्ये कथंचन
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तथा + इदम् | पुत्रो | गुणवान् | अनुरञ्ज् + च | पाण्डवान्
तस्मान् | न + उपाय + साध् + तद् | अहं | मन्ये | कथंचन
इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेया विशां पते तावत्प्रहरणीयास्ते रोचतां तव विक्रमः
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इदं | तु + अद्य | क्षमं | कर्तुम् | अस्माकं | पुरुष + ऋषभ
यावन् | न | कृ + मूल + तद् | पाण्डवेया | विशां | पते
तावत् | प्रहृ + तद् | रोचतां | तव | विक्रमः
अस्मत्पक्षो महान्यावद्यावत्पाञ्चालको लघुः तावत्प्रहरणं तेषां क्रियतां मा विचारय
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मद् + पक्ष | महान् | यावद् | यावत् | पाञ्चालको | लघुः
तावत् | प्रहृ + तद् | रोचतां | तव | विक्रमः
वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि बहुलानि यावन्न तेषां गान्धारे तावदेवाशु विक्रम
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वाहनानि | च | मुख्यानि | शस्त्राणि | कवचानि | च
यावन् | न | तेषां | गान्धारे | तावद् | एव + आशु | विक्रम
यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः सह पुत्रैर्महावीर्यैस्तावदेवाशु विक्रम
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यावत् + च | राजा | पाञ्चाल्यो | न + उद्यम | कुरुते | मनः
सह | पुत्रैर् | महत् + वीर्य + तावत् | एव + आशु | विक्रम
यावन्नायाति वार्ष्णेयः कर्षन्यादववाहिनीम् राज्यार्थे पाण्डवेयानां तावदेवाशु विक्रम
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यावत् + न + आया | वार्ष्णेयः | कर्षन् | यादव + वाहिनी
यावन् | न | तेषां | गान्धारे | तावद् | एव + आशु | विक्रम
वसूनि विविधान्भोगान्राज्यमेव केवलम् नात्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे महीपते
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वसूनि | विविधान् | भोगान् | राज्यम् | एव | च | केवलम्
न + अत्याज्य | अस्ति | कृष्णस्य | पाण्डव + अर्थ | महीपते
विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना विक्रमेण लोकांस्त्रीञ्जितवान्पाकशासनः
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क्रमेण | यौवनं | प्राप्ता | मन्मथ + अनल + दीपिका
विक्रमेण | च | लोक + त्रि | जितवान् | पाकशासनः
विक्रमं प्रशंसन्ति क्षत्रियस्य विशां पते स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ
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विक्रमं | च | प्रशंसन्ति | क्षत्रियस्य | विशां | पते
स्वको | हि | धर्मः | शूराणां | विक्रमः | पार्थिव + ऋषभ
ते बलेन वयं राजन्महता चतुरङ्गिणा प्रमथ्य द्रुपदं शीघ्रमानयामेह पाण्डवान्
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ते | बलेन | वयं | राजन् | महता | चतुरङ्गिणा
प्रमथ्य | द्रुपदं | शीघ्रम् | आनी + इह | पाण्डवान्
हि साम्ना दानेन भेदेन पाण्डवाः शक्याः साधयितुं तस्माद्विक्रमेणैव ताञ्जहि
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न | हि | साम्ना | न | दानेन | न | भेदेन | च | पाण्डवाः
शक्याः | साधयितुं | तस्माद् | विक्रम + एव | ताञ् | जहि
तान्विक्रमेण जित्वेमामखिलां भुङ्क्ष्व मेदिनीम् नान्यमत्र प्रपश्यामि कार्योपायं जनाधिप
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तान् | विक्रमेण | जि + इदम् | अखिलां | भुङ्क्ष्व | मेदिनीम्
न + अन्य | अत्र | प्रपश्यामि | कार्य + उपाय | जनाधिप
श्रुत्वा तु राधेयवचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमब्रवीत्
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एतद् + श्रु | तु | संहृष्टो | धृतराष्ट्रः | स + बान्धव
अभिपूज्य | ततः | पश्चाद् | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
उपपन्नं महाप्राज्ञे कृतास्त्रे सूतनन्दने त्वयि विक्रमसंपन्नमिदं वचनमीदृशम्
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उपपन्नं | महत् + प्राज्ञ | कृतास्त्रे | सूत + नन्दन
त्वयि | विक्रम + सम्पद् | इदं | वचनम् | ईदृशम्
भूय एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव युवां कुरुतां बुद्धिं भवेद्या नः सुखोदया
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भूय | एव | तु | भीष्म + च | द्रोणो | विदुर | एव | च
युवां | च | कुरुतां | बुद्धिं | भवेद् | या | नः | सुख + उदय
तत आनाय्य तान्सर्वान्मन्त्रिणः सुमहायशाः धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रयामास वै तदा
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तत | आनाय्य | तान् | सर्वान् | मन्त्रिणः | सु + महत् + यशस्
धृतराष्ट्रो | महत् + राज | मन्त्रयामास | वै | तदा