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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.188 (22 verses)
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Chapter 1.188

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे पाञ्चाल्यश्च महायशाः प्रत्युत्थाय महात्मानं कृष्णं दृष्ट्वाभ्यपूजयन्
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ततस् + तद् | पाण्डवाः | सर्वे | विश्रान्ताः | पृथया | सह
प्रत्युत्थाय | महात्मानं | कृष्णं | दृश् + अभिपूजय्
प्रतिनन्द्य तान्सर्वान्पृष्ट्वा कुशलमन्ततः आसने काञ्चने शुभ्रे निषसाद महामनाः
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प्रतिनन्द्य | स | तान् | सर्वान् | पृष्ट्वा | कुशलम् | अन्ततः
आसने | काञ्चने | शुभ्रे | निषसाद | महामनाः
अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनामिततेजसा आसनेषु महार्हेषु निषेदुर्द्विपदां वराः
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अनुज्ञा + तु | ते | सर्वे | कृष्ण + अमित + तेजस्
आसनेषु | महार्हेषु | निषेदुर् | द्विपदां | वराः
ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थे विशां पतिः
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ततो | मुहूर्तान् | मधुरां | वाणीम् | उच्चार्य | पार्षतः
पप्रच्छ | तं | महात्मानं | द्रौपदी + अर्थ | विशां | पतिः
कथमेका बहूनां स्यान्न स्याद्धर्मसंकरः एतन्नो भगवान्सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम्
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कथम् | एका | बहूनां | स्यान् | न | च | स्याद् | धर्म + संकर
एतन् | नो | भगवान् | सर्वं | प्रब्रवीतु | यथातथम्
अस्मिन्धर्मे विप्रलम्भे लोकवेदविरोधके यस्य यस्य मतं यद्यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत्
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अस्मिन् | धर्मे | विप्रलम्भे | लोक + वेद + विरोधक
यस्य | यस्य | मतं | यद् | यद् + श्रु | इच्छामि | तस्य | तत्
अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम
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अधर्मो | ऽयं | मम | मतो | विरुद्धो | लोक + वेद
न | हि + एक | विद्यते | पत्नी | बहूनां | द्विजसत्तम
चाप्याचरितः पूर्वैरयं धर्मो महात्मभिः धर्मोऽप्यनेकस्थश्चरितव्यः सनातनः
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न | च + अपि + आचर् | पूर्वैर् | अयं | धर्मो | महात्मभिः
न | च | धर्मो | अपि + अनेक + स्थ + चर् | सनातनः
अतो नाहं करोम्येवं व्यवसायं क्रियां प्रति धर्मसंदेहसंदिग्धं प्रतिभाति हि मामिदम्
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अतो | न + मद् | कृ + एवम् | व्यवसायं | क्रियां | प्रति
धर्म + संदेह + संदिह् | प्रतिभाति | हि | माम् | इदम्
यवीयसः कथं भार्यां ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ ब्रह्मन्समभिवर्तेत सद्वृत्तः संस्तपोधन
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यवीयसः | कथं | भार्यां | ज्येष्ठो | भ्राता | द्विजर्षभ
ब्रह्मन् | समभिवर्तेत | अस् + वृत् | अस् + तपोधन
तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद्गतिं विद्मः कथंचन अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो शक्यते
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न | तु | धर्मस्य | सूक्ष्म + त्व | गतिं | विद्मः | कथंचन
अधर्मो | धर्म | इति | वा | व्यवसायो | न | शक्यते
कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मंस्ततो व्यवसाम्यहम् पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन
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कर्तुम् | अस्मद्विधैर् | ब्रह्मन् + ततस् | न
पञ्चानां | महिषी | कृष्णा | भू + इति | कथंचन
मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथंचन
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न | मे | वाग् | अनृतं | प्राह | न + अधर्म | धीयते | मतिः
वर्तते | हि | मनो | मे | ऽत्र | न + एतद् | ऽधर्मः | कथंचन
श्रूयते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी ऋषीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वर
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श्रूयते | हि | पुराणे | ऽपि | जटिला | नाम | गौतमी
ऋषीन् | अध्यासितवती | सप्त | धर्म + भृत् | वर
गुरोश्च वचनं प्राहुर्धर्मं धर्मज्ञसत्तम गुरूणां चैव सर्वेषां जनित्री परमो गुरुः
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गुरु + च | वचनं | प्राहुर् | धर्मं | धर्म + ज्ञ + सत्तम
गुरूणां | च + एव | सर्वेषां | जनित्री | परमो | गुरुः
सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद्भुज्यतामिति तस्मादेतदहं मन्ये धर्मं द्विजवरोत्तम
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सा | च + अपि + वच् | वाचं | भैक्ष + वत् | भुज्यताम् | इति
तस्माद् | एतद् | अहं | मन्ये | धर्मं | द्विज + वर + उत्तम
एवमेतद्यथाहायं धर्मचारी युधिष्ठिरः अनृतान्मे भयं तीव्रं मुच्येयमनृतात्कथम्
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एवम् | उक्त्वा | महत् + बाहु | धर्मराजो | युधिष्ठिरः
अनृतान् | मे | भयं | तीव्रं | मुच्येयम् | अनृतात् | कथम्
अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैष सनातनः तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम्
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अनृतान् | मोक्ष्यसे | भद्रे | धर्म + च + एतद् | सनातनः
न | तु | वक्ष्यामि | सर्वेषां | पाञ्चाल | शृणु | मे | स्वयम्
यथायं विहितो धर्मो यतश्चायं सनातनः यथा प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो संशयः
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यथा + इदम् | विहितो | धर्मो | यतस् + च + इदम् | सनातनः
यथा | च | प्राह | कौन्तेय + तथा | धर्मो | न | संशयः
तत उत्थाय भगवान्व्यासो द्वैपायनः प्रभुः करे गृहीत्वा राजानं राजवेश्म समाविशत्
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जगाम | भगवान् | व्यासो | यथाकामम् | ऋषिः | प्रभुः
करे | गृहीत्वा | राजानं | राजन् + वेश्मन् | समाविशत्
पाण्डवाश्चापि कुन्ती धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः विचेतसस्ते तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ
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त्वं | च | कुन्ती | च | कौन्तेय | धृष्टद्युम्न + च | मे | सुतः
विचेतस् + तद् | तत्र + एव | प्रतीक्ष् + तद् | स्म | तद् + उभ्
ततो द्वैपायनस्तस्मै नरेन्द्राय महात्मने आचख्यौ तद्यथा धर्मो बहूनामेकपत्निता
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ततो | द्वैपायन + तद् | नरेन्द्राय | महात्मने
आचख्यौ | तद् | यथा | धर्मो | बहूनाम् | एकपत्निता