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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.180 (22 verses)
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Chapter 1.180

तस्मै दित्सति कन्यां तु ब्राह्मणाय महात्मने कोप आसीन्महीपानामालोक्यान्योन्यमन्तिकात्
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अन्तःपुरं | ततस् + तद् | ब्राह्मणस्य | महात्मनः
कोप | आसीन् | महीपानाम् | आलोकय् + अन्योन्य | अन्तिकात्
अस्मानयमतिक्रम्य तृणीकृत्य संगतान् दातुमिच्छति विप्राय द्रौपदीं योषितां वराम्
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अस्मान् | अयम् | अतिक्रम्य | तृणीकृत्य | च | संगतान्
दातुम् | इच्छति | विप्राय | द्रौपदीं | योषितां | वराम्
निहन्मैनं दुरात्मानं योऽयमस्मान्न मन्यते ह्यर्हत्येष सत्कारं नापि वृद्धक्रमं गुणैः
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निहन् + एनद् | दुरात्मानं | यो | ऽयम् | अस्मान् | न | मन्यते
न | हि + अर्ह् + एतद् | सत्कारं | न + अपि | वृद्ध + क्रम | गुणैः
हन्मैनं सह पुत्रेण दुराचारं नृपद्विषम् अयं हि सर्वानाहूय सत्कृत्य नराधिपान् गुणवद्भोजयित्वा ततः पश्चाद्विनिन्दति
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हन् + एनद् | सह | पुत्रेण | दुराचारं | नृप + द्विष्
अयं | हि | सर्वान् | आहूय | सत्कृत्य | च | नर + अधिप
गुणवद् | भोजयित्वा | च | ततः | पश्चाद् | विनिन्दति
अस्मिन्राजसमावाये देवानामिव संनये किमयं सदृशं कंचिन्नृपतिं नैव दृष्टवान्
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अस्मिन् | राजन् + समावाय | देवानाम् | इव | संनये
किम् | अयं | सदृशं | कंचिन् | नृपतिं | न + एव | दृष्टवान्
विप्रेष्वधीकारो विद्यते वरणं प्रति स्वयंवरः क्षत्रियाणामितीयं प्रथिता श्रुतिः
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न | च | विप्र + अधीकार | विद्यते | वरणं | प्रति
स्वयंवरः | क्षत्रियाणां | कन्या + दान | प्रदर्शितः
अथ वा यदि कन्येयं नेह कंचिद्बुभूषति अग्नावेनां परिक्षिप्य याम राष्ट्राणि पार्थिवाः
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अथ | वा | यदि | कन्या + इदम् | न + इह | कंचिद् | बुभूषति
अग्नि + एनद् | परिक्षिप्य | याम + राष्ट्र | पार्थिवाः
ब्राह्मणो यदि वा बाल्याल्लोभाद्वा कृतवानिदम् विप्रियं पार्थिवेन्द्राणां नैष वध्यः कथंचन
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ब्राह्मणो | यदि | वा | बाल्य + लोभ | वा | कृतवान् | इदम्
विप्रियं | पार्थिव + इन्द्र | न + एतद् | वध्यः | कथंचन
ब्राह्मणार्थं हि नो राज्यं जीवितं वसूनि पुत्रपौत्रं यच्चान्यदस्माकं विद्यते धनम्
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ब्राह्मण + अर्थ | हि | नो | राज्यं | जीवितं | च | वसूनि | च
पुत्र + पौत्र | च | यद् + च + अन्य | अस्माकं | विद्यते | धनम्
अवमानभयादेतत्स्वधर्मस्य रक्षणात् स्वयंवराणां चान्येषां मा भूदेवंविधा गतिः
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अवमान + भय | एतत् | स्वधर्मस्य | च | रक्षणात्
स्वयंवराणां | च + अन्य | मा | भूद् | एवंविधा | गतिः
इत्युक्त्वा राजशार्दूला हृष्टाः परिघबाहवः द्रुपदं संजिघृक्षन्तः सायुधाः समुपाद्रवन्
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इति + वच् | राजन् + शार्दूल | हृष्टाः | परिघ + बाहु
द्रुपदं | संजिघृक्षन्तः | स + आयुध | समुपाद्रवन्
तान्गृहीतशरावापान्क्रुद्धानापततो नृपान् द्रुपदो वीक्ष्य संत्रासाद्ब्राह्मणाञ्शरणं गतः
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तान् | ग्रह् + शरावाप | क्रुद्धान् | आपततो | नृपान्
द्रुपदो | वीक्ष्य | संत्रासाद् | ब्राह्मणाञ् | शरणं | गतः
वेगेनापततस्तांस्तु प्रभिन्नानिव वारणान् पाण्डुपुत्रौ महावीर्यौ प्रतीयतुररिंदमौ
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वेग + आपत् + तद् + तु | प्रभिन्नान् | इव | वारणान्
पाण्डु + पुत्र | महत् + वीर्य | प्रतीयतुर् | अरिंदमौ
ततः समुत्पेतुरुदायुधास्ते; महीक्षितो बद्धतलाङ्गुलित्राः जिघांसमानाः कुरुराजपुत्रा;वमर्षयन्तोऽर्जुनभीमसेनौ
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ततः | समुत्पेतुर् | उदायुध + तद् | महीक्षितो | बन्ध् + तल + अङ्गुलित्र
जिघांसमानाः | कुरु + राजन् + पुत्र + अवमर्षय् | अर्जुन + भीमसेन
ततस्तु भीमोऽद्भुतवीर्यकर्मा; महाबलो वज्रसमानवीर्यः उत्पाट्य दोर्भ्यां द्रुममेकवीरो; निष्पत्रयामास यथा गजेन्द्रः
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ततस् + तु | भीमो | अद्भुत + वीर्य + कर्मन् | महत् + बल | वज्र + समान + वीर्य
उत्पाट्य | दोर्भ्यां | द्रुमम् | एक + वीर | निष्पत्त्रयामास | यथा | गज + इन्द्र
तं वृक्षमादाय रिपुप्रमाथी; दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम् तस्थौ समीपे पुरुषर्षभस्य; पार्थस्य पार्थः पृथुदीर्घबाहुः
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तं | वृक्षम् | आदाय | रिपु + प्रमाथिन् | दण्डिन् + इव | दण्डं | पितृ + राज | उग्रम्
तस्थौ | समीपे | पुरुष + ऋषभ | पार्थस्य | पार्थः | पृथु + दीर्घ + बाहु
तत्प्रेक्ष्य कर्मातिमनुष्यबुद्धे;र्जिष्णोः सहभ्रातुरचिन्त्यकर्मा दामोदरो भ्रातरमुग्रवीर्यं; हलायुधं वाक्यमिदं बभाषे
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तत् | प्रेक्ष्य | कर्मन् + अतिमनुष्य + बुद्धि | जिष्णुः | स | हि | भ्रातुर् | अचिन्त्य + कर्मन्
दामोदरो | भ्रातरम् | उग्र + वीर्य | हलायुधं | वाक्यम् | इदं | बभाषे
एष मत्तर्षभतुल्यगामी; महद्धनुः कर्षति तालमात्रम् एषोऽर्जुनो नात्र विचार्यमस्ति; यद्यस्मि संकर्षण वासुदेवः
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य | एष | मद् + ऋषभ + तुल्य + गामिन् | महद् | धनुः | कर्षति | ताल + मात्र
एषो | ऽर्जुनो | न + अत्र | विचार्यम् | अस्ति | यदि + अस् | संकर्षण | वासुदेवः
एष वृक्षं तरसावरुज्य; राज्ञां विकारे सहसा निवृत्तः वृकोदरो नान्य इहैतदद्य; कर्तुं समर्थो भुवि मर्त्यधर्मा
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य | एष | वृक्षं | तरस् + अवरुज् | राज्ञां | विकारे | सहसा | निवृत्तः
वृकोदरो | न + अन्य | इह + एतद् | अद्य | कर्तुं | समर्थो | भुवि | मर्त्य + धर्मन्
योऽसौ पुरस्तात्कमलायताक्ष;स्तनुर्महासिंहगतिर्विनीतः गौरः प्रलम्बोज्ज्वलचारुघोणो; विनिःसृतः सोऽच्युत धर्मराजः
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यो | ऽसौ | पुरस्तात् | कमल + आयम् + अक्ष | तनुर् | महत् + सिंह + गति | विनीतः
गौरः | प्रलम्ब + उज्ज्वल + चारु + घोणा | विनिःसृतः | सो | ऽच्युत | धर्मराजः
यौ तौ कुमाराविव कार्त्तिकेयौ; द्वावश्विनेयाविति मे प्रतर्कः मुक्ता हि तस्माज्जतुवेश्मदाहा;न्मया श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा
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यौ | तौ | कुमार + इव | कार्त्तिकेयौ | द्वि + अश्विनेय + इति | मे | प्रतर्कः
मुक्ता | हि | तद् + जतु + वेश्मन् + दाह | मया | श्रुताः | पाण्डु + सुत | पृथा | च
तमब्रवीन्निर्मलतोयदाभो; हलायुधोऽनन्तरजं प्रतीतः प्रीतोऽस्मि दिष्ट्या हि पितृष्वसा नः; पृथा विमुक्ता सह कौरवाग्र्यैः
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तम् | अब्रवीन् | निर्मल + तोयद + आभ | हलायुधो | ऽनन्तरजं | प्रतीतः
प्रीतो | ऽस्मि | दिष्ट्या | हि | पितृष्वसा | नः | पृथा | विमुक्ता | सह | कौरव + अग्र्य