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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.172 (17 verses)
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Chapter 1.172

एवमुक्तः विप्रर्षिर्वसिष्ठेन महात्मना न्ययच्छदात्मनः कोपं सर्वलोकपराभवात्
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एवम् | उक्तः | स | तद् + ऋषि | वसिष्ठः | प्रत्यभाषत
नियम् + इदम् | मनः | पापात् | सर्व + लोक + पराभव
ईजे महातेजाः सर्ववेदविदां वरः ऋषी राक्षससत्रेण शाक्तेयोऽथ पराशरः
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त्वद् | ऋते | ऽद्य | महाभाग | सर्व + वेद + विद् | वर
ऋषी | राक्षस + सत्त्र | शाक्तेयो | ऽथ | पराशरः
ततो वृद्धांश्च बालांश्च राक्षसान्स महामुनिः ददाह वितते यज्ञे शक्तेर्वधमनुस्मरन्
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ततो | वृद्ध + च | बाल + च | राक्षसान् | स | महत् + मुनि
ददाह | वितते | यज्ञे | शक्तेर् | वधम् | अनुस्मरन्
हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् द्वितीयामस्य मा भाङ्क्षं प्रतिज्ञामिति निश्चयात्
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न | हि | तं | वारयामास | वसिष्ठो | रक्षसां | वधात्
द्वितीयाम् | अस्य | मा | भाङ्क्षं | प्रतिज्ञाम् | इति | निश्चयात्
त्रयाणां पावकानां सत्रे तस्मिन्महामुनिः आसीत्पुरस्ताद्दीप्तानां चतुर्थ इव पावकः
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त्रयाणां | पावकानां | स | सत्रे | तस्मिन् | महत् + मुनि
आसीत् | पुरस्ताद् | दीप्तानां | चतुर्थ | इव | पावकः
तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन युक्तितः तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये
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तेन | यज्ञेन | शुभ्रेण | हूयमानेन | युक्तितः
तद् | विदीपितम् | आकाशं | सूर्य + इव | घनात्यये
तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे तेजसा दिवि दीप्यन्तं द्वितीयमिव भास्करम्
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तं | वसिष्ठ + आदि | सर्वे | मुनि + तत्र | मेनिरे
तेजसा | दिवि | दीप्यन्तं | द्वितीयम् | इव | भास्करम्
ततः परमदुष्प्रापमन्यैरृषिरुदारधीः समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत्
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ततः | परम + दुष्प्राप | अन्यैर् | ऋषिर् | उदार + धी
समापिपयिषुः | सत्रं | तम् | अत्रिः | समुपागमत्
तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुम् उपाजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया
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तथा | पुलस्त्यः | पुलहः | क्रतु + च + एव | महत् + क्रतु
उपाजग्मुर् | अमित्र + घ्न | रक्षसां | जीवित + ईप्सा
पुलस्त्यस्तु वधात्तेषां रक्षसां भरतर्षभ उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिंदमम्
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पुलस्त्य + तु | वधात् | तेषां | रक्षसां | भरत + ऋषभ
वच् + इदम् | वचः | पार्थः | प्रहसञ् | शनकैर् | इव
कच्चित्तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात्
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कच्चित् | तात + अपविघ्न | ते | कच्चिन् | नन्दसि | पुत्रक
अजानताम् | अदोषाणां | सर्वेषां | रक्षसां | वधात्
प्रजोच्छेदमिमं मह्यं सर्वं सोमपसत्तम अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन्कुरुषे त्वं पराशर राजा कल्माषपादश्च दिवमारोढुमिच्छति
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प्रजा + उच्छेद | इमं | मह्यं | सर्वं | सोमप + सत्तम
अधर्मिष्ठं | वरिष्ठः | सन् | कुरुषे | त्वं | पराशर
राजा | कल्माषपाद + च | दिवम् | आरोढुम् | इच्छति
ये शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुनेः ते सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः सर्वमेतद्वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने
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तस्य | च + अपि | शतं | पुत्रा | भविष्यन्ति | महत् + बल
ते | च | सर्वे | मुदा | युक्ता | मोदन्ते | सहिताः | सुरैः
सर्वम् | एतद् | वसिष्ठस्य | विदितं | वै | महत् + मुनि
रक्षसां समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन सत्रं मुञ्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते
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रक्षसां | च | समुच्छेद | एष | तात | तपस्विनाम्
निमित्त + भू + त्वद् | च + अत्र | क्रतौ | वासिष्ठ + नन्दन
स | सत्रं | मुञ्च | भद्रं | ते | समाप्तम् | इदम् | अस्तु | ते
एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्ठेन धीमता तदा समापयामास सत्रं शाक्तिः पराशरः
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एवम् | उक्तः | स | विप्रर्षिर् | वसिष्ठेन | महात्मना
तदा | समापयामास | सत्रं | शाक्तिः | पराशरः
सर्वराक्षससत्राय संभृतं पावकं मुनिः उत्तरे हिमवत्पार्श्वे उत्ससर्ज महावने
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सर्व + राक्षस + सत्त्र | संभृतं | पावकं | मुनिः
उत्तरे | हिमवन्त् + पार्श्व | उत्ससर्ज | महत् + वन
तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मान एव भक्षयन्दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि
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स | तत्र + अद्य + अपि | रक्षांसि | वृक्षान् | अश्मान | एव | च
भक्षयन् | दृश्यते | वह्निः | सदा | पर्वणि | पर्वणि