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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.166 (45 verses)
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Chapter 1.166

कल्माषपाद इत्यस्मिँल्लोके राजा बभूव इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसासदृशो भुवि
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कल्माषपाद | इति + इदम् + लोक | राजा | बभूव | ह
इक्ष्वाकु + वंश + ज | पार्थ | तेजस् + असदृश | भुवि
कदाचिद्वनं राजा मृगयां निर्ययौ पुरात् मृगान्विध्यन्वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः
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स | कदाचिद् | वनं | राजा | मृगयां | निर्ययौ | पुरात्
मृगान् | विध्यन् | वराह + च | रम्येषु | मरु + धन्वन्
तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम् तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि
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स | तु | राजा | महात्मानं | वासिष्ठम् | ऋषि + सत्तम
तृषा + आर्त + च | क्षुधा + आर्त + च | एकायन + गम् | पथि
अपश्यदजितः संख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम् शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलनन्दनम् ज्येष्ठं पुत्रशतात्पुत्रं वसिष्ठस्य महात्मनः
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अपश्यद् | अजितः | संख्ये | मुनिं | प्रतिमुख + आगम्
शक्तिं | नाम | महाभागं | वसिष्ठ + कुल + नन्दन
ज्येष्ठं | पुत्र + शत | पुत्रं | वसिष्ठस्य | महात्मनः
अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत् तथा ऋषिरुवाचैनं सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा
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अपगच्छ | पथो | ऽस्माकम् | इति + एवम् | पार्थिवो | ऽब्रवीत्
तथा | ऋषिर् | वच् + एनद् | सान्त्वयञ् | श्लक्ष्णया | गिरा
ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन्धर्मपथे स्थितः नापि राजा मुनेर्मानात्क्रोधाच्चापि जगाम
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ऋषि + तु | न + अपक्रम् | तस्मिन् | धर्म + पथ | स्थितः
न + अपि | राजा | मुनेर् | मानात् | क्रोध + च + अपि | जगाम | ह
अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः जघान कशया मोहात्तदा राक्षसवन्मुनिम्
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तु | पन्थानं | तम् | ऋषिं | नृप + सत्तम
जघान | कशया | मोहात् | तदा | राक्षस + वत् | मुनिम्
कशाप्रहाराभिहतस्ततः मुनिसत्तमः तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः
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कशा + प्रहार + अभिहन् + ततस् | स | मुनि + सत्तम
तं | शशाप | नृप + श्रेष्ठ | वासिष्ठः | क्रोध + मूर्छय्
हंसि राक्षसवद्यस्माद्राजापसद तापसम् तस्मात्त्वमद्य प्रभृति पुरुषादो भविष्यसि
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हंसि | राक्षस + वत् | यस्माद् | राजन् + अपसद | तापसम्
तस्मात् | त्वम् | अद्य | प्रभृति | पुरुषादो | भविष्यसि
मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम् गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना
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मनुष्य + पिशित | सञ्ज् + चर् | महीम् | इमाम्
गच्छ | राजन् + अधम + इति + वच् | शक्तिना | वीर्य + शक्ति
ततो याज्यनिमित्तं तु विश्वामित्रवसिष्ठयोः वैरमासीत्तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत
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किंनिमित्तम् | अभूद् | वैरं | विश्वामित्र + वसिष्ठ
वैरम् | आसीत् | तदा | तं | तु | विश्वामित्रो | ऽन्वपद्यत
तयोर्विवदतोरेवं समीपमुपचक्रमे ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान्
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तयोर् | विवदतोर् | एवं | समीपम् | उपचक्रमे
अकामयत् | तं | याज्य + अर्थ | विश्वामित्रः | प्रतापवान्
ततः बुबुधे पश्चात्तमृषिं नृपसत्तमः ऋषेः पुत्रं वसिष्ठस्य वसिष्ठमिव तेजसा
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ततः | स | बुबुधे | पश्चात् | तम् | ऋषिं | नृप + सत्तम
ऋषेः | पुत्रं | वसिष्ठस्य | वसिष्ठम् | इव | तेजसा
अन्तर्धाय तदात्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत तावुभावुपचक्राम चिकीर्षन्नात्मनः प्रियम्
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अन्तर्धाय | तदा + आत्मन् | विश्वामित्रो | ऽपि | भारत
तद् + उभ् + उपक्रम् | चिकीर्षन्न् | आत्मनः | प्रियम्
तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन्
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स | तु | शप् + तदा | तेन | शक्तिना | वै | नृप + उत्तम
जगाम | शरणं | शक्तिं | प्रसादयितुम् | अर्हयन्
तस्य भावं विदित्वा नृपतेः कुरुनन्दन विश्वामित्रस्ततो रक्ष आदिदेश नृपं प्रति
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तस्य | भावं | विदित्वा | स | नृपतेः | कुरु + नन्दन
विश्वामित्र + ततस् | रक्ष | आदिदेश | नृपं | प्रति
शापात्तस्य विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञया राक्षसः किंकरो नाम विवेश नृपतिं तदा
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स | शापात् | तस्य | विप्र + ऋषि | विश्वामित्रस्य | च + आज्ञा
राक्षसः | किंकरो | नाम | विवेश | नृपतिं | तदा
रक्षसा तु गृहीतं तं विदित्वा मुनिस्तदा विश्वामित्रोऽप्यपक्रामत्तस्माद्देशादरिंदम
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रक्षसा | तु | गृहीतं | तं | विदित्वा | स | मुनि + तदा
विश्वामित्रो | अपि + अपक्रम् | तस्माद् | देशाद् | अरिंदम
ततः नृपतिर्विद्वान्रक्षन्नात्मानमात्मना बलवत्पीड्यमानोऽपि रक्षसान्तर्गतेन
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ततः | स | नृपतिर् | विद्वान् | रक्षन्न् | आत्मानम् | आत्मना
बल + वत् | पीड्यमानो | ऽपि | रक्षस् + अन्तर्गम् | ह
ददर्श तं द्विजः कश्चिद्राजानं प्रस्थितं पुनः ययाचे क्षुधितश्चैनं समांसं भोजनं तदा
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ददर्श | तं | द्विजः | कश्चिद् | राजानं | प्रस्थितं | पुनः
ययाचे | क्षुध् + च + एनद् | स + मांस | भोजनं | तदा
तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तमिति सान्त्वयन्
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तम् | वच् + अथ | राजन् + ऋषि | द्विजं | मित्र + सह + तदा
आस्स्व | ब्रह्मन् + त्वद् | अत्र + एव | मुहूर्तम् | इति | सान्त्वयन्
निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थौ द्विजसत्तमः
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निवृत्तः | प्रतिदास्यामि | भोजनं | ते | यथेप्सितम्
इति + वच् | प्रययौ | राजा | तस्थौ | च | द्विजसत्तमः
अन्तर्गतं तु तद्राज्ञस्तदा ब्राह्मणभाषितम् सोऽन्तःपुरं प्रविश्याथ संविवेश नराधिपः
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अन्तर्गतं | तु | तद् | राजन् + तदा | ब्राह्मण + भाषित
सो | ऽन्तःपुरं | प्रविश् + अथ | संविवेश | नराधिपः
ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम् उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम्
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ततो | ऽर्धरात्र | उत्थाय | सूदम् | आनाय्य | स + त्वरा
यज्ञसेन + च | राजन् + अदस् | ब्रह्मण्य | इति | शुश्रुमः
गच्छामुष्मिन्नसौ देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते अन्नार्थी त्वं तमन्नेन समांसेनोपपादय
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गम् + अदस् | असौ | देशे | ब्राह्मणो | मां | प्रतीक्षते
अन्न + अर्थिन् | त्वं | तम् | अन्नेन | स + मांस + उपपादय्
एवमुक्तस्तदा सूदः सोऽनासाद्यामिषं क्वचित् निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः
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एवम् | वच् + तदा | सूदः | सो | अन् + आसादय् + आमिष | क्वचित्
निवेदयामास | तदा | तस्मै | राज्ञे | व्यथा + अन्वित
राजा तु रक्षसाविष्टः सूदमाह गतव्यथः अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः
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राजा | तु | रक्षस् + आविश् | सूदम् | आह | गम् + व्यथा
अपि + एनद् | नर + मांस | भोजय् + इति | पुनः | पुनः
तथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम् गत्वा जहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः
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तथा + इति + वच् | ततः | सूदः | संस्थानं | वध्य + घातिन्
गत्वा | जहार | त्वरितो | नर + मांस | अपे + भी
तत्संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै तस्मै प्रादाद्ब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने
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स | तत् | संस्कृत्य | विधिवद् | अन्न + उपधा | आशु | वै
तस्मै | प्रादाद् | ब्राह्मणाय | क्षुधिताय | तपस्विने
सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः
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स | सिद्ध + चक्षुस् | दृष्ट्वा | तद् + अन्न | द्विजसत्तमः
अभोज्यम् | इदम् | इति + अह् | क्रोध + पर्याकुल + ईक्षण
यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति नराधिपः तस्मात्तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा
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यस्माद् | अभोज्यम् | अन्नं | मे | ददाति | स | नर + अधिप
तस्मात् | तद् + एव | मूढस्य | भू + अत्र | लोलुपा
सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना पुरा उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम्
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सक्तो | मानुष + मांस | यथा + वच् | शक्तिना | पुरा
उद्वेजनीयो | भूतानां | चरिष्यति | महीम् | इमाम्
द्विरनुव्याहृते राज्ञः शापो बलवानभूत् रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवत्तदा
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द्विर् | अनुव्याहृते | राज्ञः | स | शापो | बलवान् | अभूत्
रक्षस् + बल + समाविश् | विसंज्ञ + च + भू | तदा
ततः नृपतिश्रेष्ठो राक्षसोपहतेन्द्रियः उवाच शक्तिं तं दृष्ट्वा नचिरादिव भारत
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ततः | स | नृपति + श्रेष्ठ | राक्षस + उपहन् + इन्द्रिय
उवाच | शक्तिं | तं | दृष्ट्वा | नचिराद् | इव | भारत
यस्मादसदृशः शापः प्रयुक्तोऽयं त्वया मयि तस्मात्त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं मानुषानहम्
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यस्माद् | असदृशः | शापः | प्रयुक्तो | ऽयं | त्वया | मयि
तस्मात् | त्वत्तः | प्रवर्तिष्ये | खादितुं | मानुषान् | अहम्
एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयुज्य सः शक्तिनं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम्
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एवम् | उक्त्वा | ततः | सद्यस् + तद् | प्राणैर् | विप्रयुज्य | सः
शक्तिनं | भक्षयामास | व्याघ्रः | पशुम् | इव + ईप्सय्
शक्तिनं तु हतं दृष्ट्वा विश्वामित्रस्ततः पुनः वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद्रक्षः संदिदेश
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शक्तिनं | तु | हतं | दृष्ट्वा | विश्वामित्र + ततस् | पुनः
वसिष्ठ + एव | पुत्रेषु | तद् | रक्षः | संदिदेश | ह
ताञ्शतावरान्पुत्रान्वसिष्ठस्य महात्मनः भक्षयामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव
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तद् + अथ | कामधुग् | धेनुर् | वसिष्ठस्य | महात्मनः
भक्षयामास | संक्रुद्धः | सिंहः | क्षुद्र + मृग | इव
वसिष्ठो घातिताञ्श्रुत्वा विश्वामित्रेण तान्सुतान् धारयामास तं शोकं महाद्रिरिव मेदिनीम्
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वसिष्ठो | घातय् + श्रु | विश्वामित्रेण | तान् | सुतान्
धारयामास | तं | शोकं | महत् + अद्रि | इव | मेदिनीम्
चक्रे चात्मविनाशाय बुद्धिं मुनिसत्तमः त्वेव कुशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः
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चक्रे | च + आत्मन् + विनाश | बुद्धिं | स | मुनि + सत्तम
न | तु + एव | कुशिक + उच्छेद | मेने | मतिमतां | वरः
मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः शिरस्तस्य शिलायां तूलराशाविवापतत्
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स | मेरु + कूट | आत्मानं | मुमोच | भगवान् | ऋषिः
शिरस् + तद् | शिलायां | च | तूल + राशि + इव + पत्
ममार पातेन यदा तेन पाण्डव तदाग्निमिद्ध्वा भगवान्संविवेश महावने
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न | ममार | च | पातेन | स | यदा | तेन | पाण्डव
तदा + अग्नि | इद्ध्वा | भगवान् | संविवेश | महत् + वन
तं तदा सुसमिद्धोऽपि ददाह हुताशनः दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत्ततः
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तं | तदा | सु + समिन्ध् | ऽपि | न | ददाह | हुताशनः
दीप्यमानो | अपि + अमित्र + घ्न | शीतो | ऽग्निर् | अभवत् | ततः
समुद्रमभिप्रेत्य शोकाविष्टो महामुनिः बद्ध्वा कण्ठे शिलां गुर्वीं निपपात तदम्भसि
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स | समुद्रम् | अभिप्रेत्य | शोक + आविश् | महत् + मुनि
बद्ध्वा | कण्ठे | शिलां | गुर्वीं | निपपात | तद् + अम्भस्
समुद्रोर्मिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनिः जगाम ततः खिन्नः पुनरेवाश्रमं प्रति
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स | समुद्र + ऊर्मि + वेग | स्थले | न्यस्तो | महत् + मुनि
जगाम | स | ततः | खिन्नः | पुनर् | एव + आश्रम | प्रति