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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.159 (22 verses)
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Chapter 1.159

कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद्येन स्म धर्षिताः यान्तो ब्रह्मविदः सन्तः सर्वे रात्रावरिंदम
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कारणं | ब्रूहि | गन्धर्व | किं | तद् | येन | स्म | धर्षिताः
यान्तो | ब्रह्मन् + विद् | सन्तः | सर्वे | रात्रि + अरिंदम
अनग्नयोऽनाहुतयो विप्रपुरस्कृताः यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया पाण्डवनन्दन
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अन् + अग्नि | अन् + आहुति | न | च | विप्र + पुरस्कृ
यूयं | ततो | धर्षिताः | स्थ | मया | पाण्डव + नन्दन
यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगमानवाः विस्तरं कुरुवंशस्य श्रीमतः कथयन्ति ते
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यक्ष + राक्षस + गन्धर्व | पिशाच + उरग + मानव
विस्तरं | कुरु + वंश | श्रीमतः | कथयन्ति | ते
नारदप्रभृतीनां देवर्षीणां मया श्रुतम् गुणान्कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम्
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नारद + प्रभृति | च | देव + ऋषि | मया | श्रुतम्
गुणान् | कथयतां | वीर | पूर्वेषां | तव | धीमताम्
स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः स्वकुलस्य ते
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स्वयं | च + अपि | मया | दृश् + चर् | सागराम्बराम्
इमां | वसुमतीं | कृत्स्नां | प्रभावः | स्व + कुल | ते
वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम्
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वेदे | धनुषि | च + आचार्य | अभिजानामि | ते | ऽर्जुन
विश्रुता | त्रिषु | लोकेषु | माद्री | मद्र + पति | सुता
धर्मं वायुं शक्रं विजानाम्यश्विनौ तथा पाण्डुं कुरुशार्दूल षडेतान्कुलवर्धनान् पितॄनेतानहं पार्थ देवमानुषसत्तमान्
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तस्माद् | धर्मं | च | वायुं | च | महेन्द्रं | च | तथा + अश्विन्
पाण्डुं | च | कुरु + शार्दूल | षड् | एतान् | कुल + वर्धन
पितॄन् | एतान् | अहं | पार्थ | देव + मानुष + सत्तम
दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः
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लोके | च + एव | हि | विख्यातः | सर्व + शस्त्र + भृत् | वरः
निपेतुर् | भ्रातरः | सर्वे | भीमसेन + भुज + अर्दय्
उत्तमां तु मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम् जानन्नपि वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम्
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उत्तमां | तु | मनस् + बुद्धि | भवतां | भावय् + आत्मन्
जानन्न् | अपि | च | वः | पार्थ | कृतवान् | इह | धर्षणाम्
स्त्रीसकाशे कौरव्य पुमान्क्षन्तुमर्हति धर्षणामात्मनः पश्यन्बाहुद्रविणमाश्रितः
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स्त्री + सकाश | च | कौरव्य | न | पुमान् | क्षन्तुम् | अर्हति
धर्षणाम् | आत्मनः | पश्यन् | बाहु + द्रविण | आश्रितः
नक्तं बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत्
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नक्तं | च | बलम् | अस्माकं | भूय | एव + अभिवृध्
यतस् + ततस् | मां | कौन्तेय | स + दार | मन्युर् | आविशत्
सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे
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सो | ऽहं | त्वद् + इह | विजितः | संख्ये | तापत्य + वर्धन
येन | तेन + इह | विधिना | कीर्त्यमानं | निबोध | मे
ब्रह्मचर्यं परो धर्मः चापि नियतस्त्वयि यस्मात्तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मिन्विजितस्त्वया
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ब्रह्मचर्यं | परो | धर्मः | स | च + अपि | नियम् + त्वद्
यस्मात् | तस्माद् | अहं | पार्थ | रणे | ऽस्मिन् | विजि + त्वद्
यस्तु स्यात्क्षत्रियः कश्चित्कामवृत्तः परंतप नक्तं युधि युध्येत जीवेत्कथंचन
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यद् + तु | स्यात् | क्षत्रियः | कश्चित् | काम + वृत् | परंतप
नक्तं | च | युधि | युध्येत | न | स | जीवेत् | कथंचन
यस्तु स्यात्कामवृत्तोऽपि राजा तापत्य संगरे जयेन्नक्तंचरान्सर्वान्स पुरोहितधूर्गतः
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यद् + तु | स्यात् | काम + वृत् | ऽपि | राजा | तापत्य | संगरे
जयेन् | नक्तंचरान् | सर्वान् | स | पुरोहित + धूर्गत
तस्मात्तापत्य यत्किंचिन्नृणां श्रेय इहेप्सितम् तस्मिन्कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः
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तस्मात् | तापत्य | यत् | किंचिन् | नृणां | श्रेय | इह + ईप्सय्
तस्मिन् | कर्मणि | योक्तव्या | दम् + आत्मन् | पुरोहिताः
वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः
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वेदे | षडङ्गे | निरताः | शुचयः | सत्य + वादिन्
धर्म + आत्मन् | कृतात्मानः | स्युर् | नृपाणां | पुरोहिताः
जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च स्यादनन्तरम् यस्य स्याद्धर्मविद्वाग्मी पुरोधाः शीलवाञ्शुचिः
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जय + च | नियतो | राज्ञः | स्वर्ग + च | स्याद् | अनन्तरम्
यस्य | स्याद् | धर्म + विद् | वाग्मी | पुरोधाः | शीलवाञ् | शुचिः
लाभं लब्धुमलब्धं हि लब्धं परिरक्षितुम् पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम्
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लाभं | लब्धुम् | अ + लभ् | हि | लब्धं | च | परिरक्षितुम्
पुरोहितं | प्रकुर्वीत | राजा | गुण + समन्वित
पुरोहितमते तिष्ठेद्य इच्छेत्पृथिवीं नृपः प्राप्तुं मेरुवरोत्तंसां सर्वशः सागराम्बराम्
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पुरोहित + मत | तिष्ठेद् | य | इच्छेत् | पृथिवीं | नृपः
प्राप्तुं | मेरु + वर + उत्तंस | सर्वशः | सागराम्बराम्
हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन जयेदब्राह्मणः कश्चिद्भूमिं भूमिपतिः क्वचित्
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न | हि | केवल + शौर्य | तापत्य + अभिजन | च
जयेद् | अ + ब्राह्मण | कश्चिद् | भूमिं | भूमिपतिः | क्वचित्
तस्मादेवं विजानीहि कुरूणां वंशवर्धन ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितुं चिरम्
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तस्माद् | एवं | विजानीहि | कुरूणां | वंश + वर्धन
ब्राह्मण + प्रमुख | राज्यं | शक्यं | पालयितुं | चिरम्