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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.158 (55 verses)
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Chapter 1.158

ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः समैरुदङ्मुखैर्मार्गैर्यथोद्दिष्टं परंतपाः
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विस्तर + एव | पप्रच्छुः | कथां | तां | पुरुष + ऋषभ
समैर् | उदङ्मुखैर् | मार्गैर् | यथोद्दिष्टं | परंतपाः
ते गच्छन्तस्त्वहोरात्रं तीर्थं सोमश्रवायणम् आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः
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ते | गम् + तु + अहोरात्र | तीर्थं | सोमश्रवायणम्
आसेदुः | पुरुष + व्याघ्र | गङ्गायां | पाण्डु + नन्दन
उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनंजयः प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं महायशाः
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उल्मुकं | तु | समुद्यम्य | तेषाम् | अग्रे | धनंजयः
प्रकाश + अर्थ | ययौ | तत्र | रक्षा + अर्थ | च | महत् + यशस्
तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन्स्त्रियः ईर्ष्युर्गन्धर्वराजः स्म जलक्रीडामुपागतः
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तत्र | गङ्गा + जल | रम्ये | विविक्ते | क्रीडयन् | स्त्रियः
ईर्ष्युर् | गन्धर्व + राज | स्म | जल + क्रीडा | उपागतः
शब्दं तेषां शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् तेन शब्देन चाविष्टश्चुक्रोध बलवद्बली
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शब्दं | तेषां | स | शुश्राव | नदीं | समुपसर्पताम्
तेन | शब्देन | च + आविश् + क्रुध् | बलवद् | बली
दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परंतपान् विस्फारयन्धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत्
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स | दृष्ट्वा | पाण्डव + तत्र | सह | मात्रा | परंतपान्
विस्फारयन् | धनुर् | घोरम् | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
संध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या अशीतिभिस्त्रुटैर्हीनं तं मुहूर्तं प्रचक्षते
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संध्या | संरज्यते | घोरा | पूर्वरात्र + आगम | या
हीनं | तं | मुहूर्तं | प्रचक्षते
विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् शेषमन्यन्मनुष्याणां कामचारमिह स्मृतम्
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देव + दानव + यक्ष | गन्धर्व + उरग + रक्षस्
शेषम् | अन्यन् | मनुष्याणां | काम + चार | इह | स्मृतम्
लोभात्प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् उपक्रान्ता निगृह्णीमो राक्षसैः सह बालिशान्
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लोभात् | प्रचारं | चर् + तद् | वेलासु | वै | नरान्
उपक्रान्ता | निगृह्णीमो | राक्षसैः | सह | बालिशान्
ततो रात्रौ प्राप्नुवतो जलं ब्रह्मविदो जनाः गर्हयन्ति नरान्सर्वान्बलस्थान्नृपतीनपि
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ततो | रात्रौ | प्राप्नुवतो | जलं | ब्रह्मन् + विद् | जनाः
गर्हयन्ति | नरान् | सर्वान् | बलस्थान् | नृपतीन् | अपि
आरात्तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम्
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आरात् | तिष्ठत | मा | मह्यं | समीपम् | उपसर्पत
कस्मान् | मां | न + अभिज्ञा | प्राप्तं | भागीरथी + जल
अङ्गारपर्णं गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् अहं हि मानी चेर्ष्युश्च कुबेरस्य प्रियः सखा
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अङ्गारपर्णं | गन्धर्वं | वित्त | मां | स्व + बल + आश्रय
अहं | हि | मानी | च + ईर्ष्यु | कुबेरस्य | प्रियः | सखा
अङ्गारपर्णमिति ख्यातं वनमिदं मम अनु गङ्गां वाकां चित्रं यत्र वसाम्यहम्
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अङ्गारपर्णम् | इति | च | ख्यातं | वनम् | इदं | मम
अनु | गङ्गां | च | वाकां | च | चित्रं | यत्र | वस् + मद्
कुणपाः शृङ्गिणो वा देवा मानुषाः इदं समुपसर्पन्ति तत्किं समुपसर्पथ
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न | कुणपाः | शृङ्गिणो | वा | न | देवा | न | च | मानुषाः
इदं | समुपसर्पन्ति | तत् | किं | समुपसर्पथ
समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां दुर्मते रात्रावहनि संधौ कस्य कॢप्तः परिग्रहः
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समुद्रे | हिमवन्त् + पार्श्व | नद्याम् | अस्यां | च | दुर्मते
रात्रि + अहर् | संधौ | च | कस्य | क्ᄆप्तः | परिग्रहः
वयं शक्तिसंपन्ना अकाले त्वामधृष्णुमः अशक्ता हि क्षणे क्रूरे युष्मानर्चन्ति मानवाः
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वयं | च | शक्ति + सम्पद् | अकाले | त्वाम्
अशक्ता | हि | क्षणे | क्रूरे | युष्मान् | अर्चन्ति | मानवाः
पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद्विनिःसृता गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा प्रतिपद्यते
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पुरा | हिमवन्त् + च + एतद् | हेमशृङ्गाद् | विनिःसृता
स | एव | सु + महत् + बुद्धि | सांप्रतं | प्रतिपत्स्यते
इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम्
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इयं | भूत्वा | च + एक + वप्र | शुचिर् | आकाश + ग | पुनः
देवेषु | गङ्गा | गन्धर्व | प्राप् + अलकनन्दता
तथा पितॄन्वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः गङ्गा भवति गन्धर्व यथा द्वैपायनोऽब्रवीत्
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तथा | पितॄन् | वैतरणी | दुस्तरा | पाप + कर्मन्
गङ्गा | भवति | गन्धर्व | यथा | द्वैपायनो | ऽब्रवीत्
असंबाधा देवनदी स्वर्गसंपादनी शुभा कथमिच्छसि तां रोद्धुं नैष धर्मः सनातनः
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असंबाधा | देवनदी | स्वर्ग + सम्पादन | शुभा
कथम् | इच्छसि | तां | रोद्धुं | न + एतद् | धर्मः | सनातनः
अनिवार्यमसंबाधं तव वाचा कथं वयम् स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम्
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अनिवार्यम् | असंबाधं | तव | वाचा | कथं | वयम्
न | स्पृशेम | यथाकामं | पुण्यं | भागीरथी + जल
अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् मुमोच सायकान्दीप्तानहीनाशीविषानिव
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अङ्गारपर्ण + तद् + श्रु | क्रुद्ध | आनम्य | कार्मुकम्
मुमोच | सायकान् | दीप्तान् | अहीन् | आशीविषान् | इव
उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तमम् व्यपोवाह शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजयः
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उल्मुकं | भ्रामय् + तूर्णम् | पाण्डव + चर्मन् | च + उत्तम
व्यपोवाह | शर + तद् | सर्वान् | एव | धनंजयः
बिभीषिकैषा गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तैषा फेनवत्प्रविलीयते
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विभीषिका + एतद् | गन्धर्व | न + अस्त्र + ज्ञ | प्रयुज्यते
अस्त्र + ज्ञ | प्रयुज् + एतद् | फेन + वत् | प्रविलीयते
मानुषानति गन्धर्वान्सर्वान्गन्धर्व लक्षये तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं तु मायया
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मानुषान् | अति | गन्धर्वान् | सर्वान् | गन्धर्व | लक्षये
तस्माद् | अस्त्रेण | दिव्येन | योत्स्ये | ऽहं | न | तु | मायया
पुरास्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात्किल बृहस्पतिः भरद्वाजस्य गन्धर्व गुरुपुत्रः शतक्रतोः
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पुरा + अस्त्र | इदम् | आग्नेयं | प्रादात् | किल | बृहस्पतिः
भरद्वाजस्य | गन्धर्व | गुरु + पुत्र | शतक्रतोः
भरद्वाजादग्निवेश्यो अग्निवेश्याद्गुरुर्मम त्विदं मह्यमददाद्द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः
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भरद्वाजाद् | अग्निवेश्यो | ऽग्निवेश्याद् | गुरुर् | मम
वच् + अस्त्र + विद् | श्रेष्ठो | द्रोणं | ब्राह्मण + सत्तम
इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत्
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इति + वच् | पाण्डवः | क्रुद्धो | गन्धर्वाय | मुमोच | ह
प्रदीप्तम् | अस्त्रम् | आग्नेयं | दह् + इदम् | रथं | तु | तत्
विरथं विप्लुतं तं तु गन्धर्वं महाबलम् अस्त्रतेजःप्रमूढं प्रपतन्तमवाङ्मुखम्
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विरथं | विप्लुतं | तं | तु | स | गन्धर्वं | महत् + बल
अस्त्र + तेजस् + प्रमुह् | च | प्रपतन्तम् | अवाङ्मुखम्
शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजयः भ्रातॄन्प्रति चकर्षाथ सोऽस्त्रपातादचेतसम्
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शिरोरुहेषु | जग्राह | माल्यवत्सु | धनंजयः
भ्रातॄन् | प्रति | कृष् + अथ | सो | अस्त्र + पात | अचेतसम्
युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती
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युधिष्ठिरं | तस्य | भार्या | प्रपेदे | शरण + अर्थिन्
नाम्ना | कुम्भीनसी | नाम | पति + त्राण | अभीप्सती
त्राहि त्वं मां महाराज पतिं चेमं विमुञ्च मे गन्धर्वीं शरणं प्राप्तां नाम्ना कुम्बीनसीं प्रभो
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त्राहि | त्वं | मां | महत् + राज | पतिं | च + इदम् | विमुञ्च | मे
गन्धर्वीं | शरणं | प्राप्तां | नाम्ना | कुम्भीनसीं | प्रभो
युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् को नु हन्याद्रिपुं त्वादृङ्मुञ्चेमं रिपुसूदन
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युद्धे | जितं | यशस् + हा | स्त्री + नाथ | अपराक्रमम्
को | नु | हन्याद् | रिपुं | त्वादृङ् | मुच् + इदम् | रिपु + सूदन
अङ्गेमं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः
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अङ्ग + इदम् | प्रतिपद्यस्व | गच्छ | गन्धर्व | मा | शुचः
प्रदिश् + अभय | ते | ऽद्य | कुरु + राज | युधिष्ठिरः
जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् श्लाघे बलेनाद्य नाम्ना जनसंसदि
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जितो | ऽहं | पूर्वकं | नाम | मुच् + अङ्गारपर्ण + ता
न | च | श्लाघे | बल + अद्य | न | नाम्ना | जन + संसद्
साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् गान्धर्व्या मायया योद्धुमिच्छामि वयसा वरम्
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साधु + इदम् | लब्धवांल् | लाभं | यो | ऽहं | दिव्य + अस्त्र + धारिन्
गान्धर्व्या | मायया | योद्धुम् | इच्छामि | वयसा | वरम्
अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम्
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अस्त्र + अग्नि | विचित्रो | ऽयं | दग्धो | मे | रथ | उत्तमः
सो | ऽहं | चित्ररथो | भूत्वा | नाम्ना | दग्धरथो | ऽभवम्
संभृता चैव विद्येयं तपसेह पुरा मया निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाया महात्मने
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संभृता | च + एव | विद्या + इदम् | तपस् + इह | पुरा | मया
निवेदयिष्ये | ताम् | अद्य | प्राण + द | महात्मने
संस्तम्भितं हि तरसा जितं शरणमागतम् योऽरिं संयोजयेत्प्राणैः कल्याणं किं सोऽर्हति
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संस्तम्भितं | हि | तरसा | जितं | शरणम् | आगतम्
यो | ऽरिं | संयोजयेत् | प्राणैः | कल्याणं | किं | न | सो | ऽर्हति
चक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः ददौ विश्वावसवे मह्यं विश्वावसुर्ददौ
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चक्षुषी | नाम | विद्या + इदम् | यां | सोमाय | ददौ | मनुः
ददौ | स | विश्वावसवे | मह्यं | विश्वावसुर् | ददौ
सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे
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तद् + इदम् | कापुरुषं | प्राप्ता | गुरु + दा | प्रणश्यति
आगमो | ऽस्या | मया | प्रोक्तो | वीर्यं | प्रतिनिबोध | मे
यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत्त्रिषु लोकेषु किंचन तत्पश्येद्यादृशं चेच्छेत्तादृषं द्रष्टुमर्हति
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यद् + चक्षुस् | द्रष्टुम् | इच्छेत् | त्रिषु | लोकेषु | किंचन
तत् | पश्येद् | यादृशं | च + इष् | तादृशं | द्रष्टुम् | अर्हति
समानपद्ये षण्मासान्स्थितो विद्यां लभेदिमाम् अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रते कृते
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समान + पद्य | षष् + मास | स्थितो | विद्यां | लभेद् | इमाम्
अनुनी + मद् | विद्यां | स्वयं | तुभ्यं | व्रते | कृते
विद्यया ह्यनया राजन्वयं नृभ्यो विशेषिताः अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रवर्तिताः
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विद्यया | हि + इदम् | राजन् | वयं | नृभ्यो | विशेषिताः
अविशिष्ट + च | देवानाम् | अनुभाव + प्रवर्तय्
गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम भ्रातृभ्यस्तव पञ्चभ्यः पृथग्दाता शतं शतम्
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गन्धर्व + ज | अश्वानाम् | अहं | पुरुष + सत्तम
भ्रातृ + त्वद् | पञ्चभ्यः | पृथग् | दाता | शतं | शतम्
देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यगन्धा मनोगमाः क्षीणाः क्षीणा भवन्त्येते हीयन्ते रंहसः
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देव + गन्धर्व + वाह + तद् | दिव्य + गन्ध | मनस् + गम
क्षीणाः | क्षीणा | भू + एतद् | न | हीयन्ते | च | रंहसः
पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिबर्हणे दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि
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पुरा | कृतं | महत् + इन्द्र | वज्रं | वृत्र + निबर्हण
दशधा | शतधा | च + एव | तद् + शृ | वृत्र + मूर्धन्
ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते लोके यत्साधनं किंचित्सा वै वज्रतनुः स्मृता
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ततो | भागीकृतो | देवैर् | वज्र + भाग | उपास्यते
लोके | यत् | साधनं | किंचित् | सा | वै | वज्र + तनु | स्मृता
वज्रपाणिर्ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः
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वज्र + पाणि | ब्राह्मणः | स्यात् | क्षत्रं | वज्र + रथ | स्मृतम्
वैश्या | वै | दान + वज्र + च | कर्मन् + वज्र | यवीयसः
वज्रं क्षत्रस्य वाजिनो अवध्या वाजिनः स्मृताः रथाङ्गं वडवा सूते सूताश्चाश्वेषु ये मताः
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वज्रं | क्षत्रस्य | वाजिन् + अवध्य | वाजिनः | स्मृताः
रथाङ्गं | वडवा | सूते | सूत + च + अश्व | ये | मताः
कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः इमे गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति ते हयाः
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काम + वर्ण | काम + जव | कामतः | समुपस्थिताः
इमे | गन्धर्व + ज | कामं | पूरयिष्यन्ति | ते | हयाः
यदि प्रीतेन वा दत्तं संशये जीवितस्य वा विद्या वित्तं श्रुतं वापि तद्गन्धर्व कामये
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यदि | प्रीतेन | वा | दत्तं | संशये | जीवितस्य | वा
विद्या | वित्तं | श्रुतं | वा + अपि | न | तद् | गन्धर्व | कामये
संयोगो वै प्रीतिकरः संसत्सु प्रतिदृश्यते जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते
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संयोगो | वै | प्रीति + कर | संसत्सु | प्रतिदृश्यते
तस्य | तस्य | प्रसादेन | पुत्र + त्वद् | भविष्यति
त्वत्तो ह्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् तथैव सख्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ
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त्वत्तो | हि + मद् | ग्रहीष्यामि | अस्त्रम् | आग्नेयम् | उत्तमम्
तथा + एव | सख्यं | बीभत्सो | चिराय | भरत + ऋषभ
त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान्संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ सखे तद्ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद्भयं त्यजेत्
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त्वत्तो | ऽस्त्रेण | वृ + अश्व | संयोगः | शाश्वतो | ऽस्तु | नौ
सखे | तद् | ब्रूहि | गन्धर्व | यद् | भयं | त्यजेत्