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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.155 (52 verses)
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Chapter 1.155

अमर्षी द्रुपदो राजा कर्मसिद्धान्द्विजर्षभान् अन्विच्छन्परिचक्राम ब्राह्मणावसथान्बहून्
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अमर्षी | द्रुपदो | राजा | कर्मन् + सिध् | द्विजर्षभान्
अन्विच्छन् | परिचक्राम | ब्राह्मण + आवसथ | बहून्
पुत्रजन्म परीप्सन्वै शोकोपहतचेतनः नास्ति श्रेष्ठं ममापत्यमिति नित्यमचिन्तयत्
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पुत्र + जन्मन् | परीप्सन् | वै | स | राजा | तद् | अधारयत्
न + अस् | श्रेष्ठं | मद् + अपत्य | इति | नित्यम् | अचिन्तयत्
जातान्पुत्रान्स निर्वेदाद्धिग्बन्धूनिति चाब्रवीत् निःश्वासपरमश्चासीद्द्रोणं प्रतिचिकीर्षया
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जातान् | पुत्रान् | स | निर्वेदाद् | बन्धून् | इति | च + ब्रू
निःश्वास + परम + च + अस् | द्रोणं | प्रतिचिकीर्षया
प्रभावं विनयं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि क्षात्रेण बलेनास्य चिन्तयन्नान्वपद्यत प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत
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प्रभावं | विनयं | शिक्षां | द्रोणस्य | चरितानि | च
क्षात्रेण | च | बल + इदम् | न + पश् | स | पराजयम्
प्रतिकर्तुं | नृप + श्रेष्ठ | यतमानो | ऽपि | भारत
अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन् ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपतिः
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अभितः | सो | ऽथ | कल्माषीं | गङ्गा + कूल | परिभ्रमन्
ब्राह्मण + आवसथ | पुण्यम् | आससाद | महीपतिः
तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रती द्विजः तथैव नामहाभागः सोऽपश्यत्संशितव्रतौ
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तत्र | न + अस्नातक | कश्चिन् | न | च + अस् | अव्रती | द्विजः
तथा + एव | न + अमहाभाग | सो | ऽपश्यत् | संशित + व्रत
याजोपयाजौ ब्रह्मर्षी शाम्यन्तौ पृषतात्मजः संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ
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याज + उपयाज | ब्रह्मर्षी | शाम्यन्तौ | पृषत + आत्मजा
संधा + अध्ययन | युक्तौ | गोत्र + च + अपि | काश्यपौ
तारणे युक्तरूपौ तौ ब्राह्मणावृषिसत्तमौ तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः
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तारणे | युक्त + रूप | तौ | ब्राह्मणाव् | ऋषि + सत्तम
स | तद् + आमन्त्रय् | सर्व + काम | अतन्द्रितः
बुद्ध्वा तयोर्बलं बुद्धिं कनीयांसमुपह्वरे प्रपेदे छन्दयन्कामैरुपयाजं धृतव्रतम्
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बुद्ध्वा | तयोर् | बलं | बुद्धिं | कनीयांसम् | उपह्वरे
प्रपेदे | छन्दयन् | कामैर् | उपयाजं | धृ + व्रत
पादशुश्रूषणे युक्तः प्रियवाक्सर्वकामदः अर्हयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच सः
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पाद + शुश्रूषण | युक्तः | प्रिय + वाच् | सर्व + काम + द
अर्हयित्वा | यथान्यायम् | उपयाजम् | उवाच | सः
येन मे कर्मणा ब्रह्मन्पुत्रः स्याद्द्रोणमृत्यवे उपयाज कृते तस्मिन्गवां दातास्मि तेऽर्बुदम्
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येन | मे | कर्मणा | ब्रह्मन् | पुत्रः | स्याद् | द्रोण + मृत्यु
उपयाज | कृते | तस्मिन् | गवां | दातास्मि | ते | ऽर्बुदम्
यद्वा तेऽन्यद्द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रियं भवेत् सर्वं तत्ते प्रदाताहं हि मेऽस्त्यत्र संशयः
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यद् | वा | ते | ऽन्यद् | द्विज + श्रेष्ठ | मनसः | सु + प्रिय | भवेत्
सर्वं | तत् | ते | प्रदातृ + मद् | न | हि | मे | अस् + अत्र | संशयः
इत्युक्तो नाहमित्येवं तमृषिः प्रत्युवाच आराधयिष्यन्द्रुपदः तं पर्यचरत्पुनः
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इति + वच् | न + मद् | इति + एवम् | तम् | ऋषिः | प्रत्युवाच | ह
आराधयिष्यन् | द्रुपदः | स | तं | पर्यचरत् | पुनः
ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं द्विजोत्तमः उपयाजोऽब्रवीद्राजन्काले मधुरया गिरा
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ततः | संवत्सर + अन्त | द्रुपदं | स | द्विजोत्तमः
उपयाजो | ऽब्रवीद् | राजन् | काले | मधुरया | गिरा
ज्येष्ठो भ्राता ममागृह्णाद्विचरन्वननिर्झरे अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम्
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ज्येष्ठो | भ्राता | मद् + ग्रह् | विचरन् | वन + निर्झर
अपरिज्ञात + शौच | भूमौ | निपतितं | फलम्
तदपश्यमहं भ्रातुरसांप्रतमनुव्रजन् विमर्शं संकरादाने नायं कुर्यात्कथंचन
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तद् | अपश्यम् | अहं | भ्रातुर् | असांप्रतम् | अनुव्रजन्
विमर्शं | संकर + आदान | न + इदम् | कुर्यात् | कथंचन
दृष्ट्वा फलस्य नापश्यद्दोषा येऽस्यानुबन्धिकाः विविनक्ति शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत्
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दृष्ट्वा | फलस्य | न + पश् | दोषा | ये
विविनक्ति | न | शौचं | यः | सो | अन्यत्र + अपि | कथं | भवेत्
संहिताध्ययनं कुर्वन्वसन्गुरुकुले यः भैक्षमुच्छिष्टमन्येषां भुङ्क्ते चापि सदा सदा कीर्तयन्गुणमन्नानामघृणी पुनः पुनः
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संहिता + अध्ययन | कुर्वन् | वसन् | गुरु + कुल | च | यः
भैक्षम् | उच्छिष्टम् | अन्येषां | भुङ्क्ते | च + अपि | सदा | सदा
कीर्तयन् | गुणम् | अन्नानाम् | अघृणी | च | पुनः | पुनः
तमहं फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा तं वै गच्छस्व नृपते त्वां संयाजयिष्यति
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तम् | अहं | फल + अर्थिन् | मन्ये | भ्रातरं | तर्क + चक्षुस्
तं | वै | गच्छस्व | नृपते | स | त्वां | संयाजयिष्यति
जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन् उपयाजवचः श्रुत्वा नृपतिः सर्वधर्मवित् अभिसंपूज्य पूजार्हमृषिं याजमुवाच
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जुगुप्समानो | नृपतिर् | मनस् + इदम् | विचिन्तयन्
उपयाज + वचस् | श्रुत्वा | नृपतिः | सर्व + धर्म + विद्
अभिसंपूज्य | पूजा + अर्ह | ऋषिं | याजम् | उवाच | ह
अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो द्रोणवैराभिसंतप्तं त्वं ह्लादयितुमर्हसि
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अयुतानि | दा + अष्टन् | गवां | याजय | मां | विभो
द्रोण + वैर + अभिसंतप् | त्वं | ह्लादयितुम् | अर्हसि
हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाप्यनुत्तमः तस्माद्द्रोणः पराजैषीन्मां वै सखिविग्रहे
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स | हि | ब्रह्मन् + विद् | श्रेष्ठो | ब्रह्मास्त्रे | च + अपि + अनुत्तम
तस्माद् | द्रोणः | पराजैषीन् | मां | वै | स | सखी + विग्रह
क्षत्रियो नास्ति तुल्योऽस्य पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः कौरवाचार्यमुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः
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क्षत्रियो | न + अस् | तुल्यो | ऽस्य | पृथिव्यां | कश्चिद्
तत्र | संसञ्ज् + मनस् | भरद्वाजस्य | धीमतः
द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यतेऽप्रतिमं महत्
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द्रोणस्य | शर + जाल | प्राणिन् + देह + हर | च
षष् + अरत्नि | धनुस् + च + इदम् | दृश्यते | ऽप्रतिमं | महत्
हि ब्राह्मणवेगेन क्षात्रं वेगमसंशयम् प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः
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स | हि | ब्राह्मण + वेग | क्षात्रं | वेगम् | असंशयम्
ततो | महेन्द्रम् | आसाद्य | भारद्वाजो | महत् + तपस्
क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रसह्यं नरैर्भुवि
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क्षत्र + उच्छेद | विहितो | जामदग्न्य | इव + आस्था
तस्य | हि + अस्त्र + बल | घोरम् | अप्रसह्यं | नरैर् | भुवि
ब्राह्ममुच्चारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः समेत्य दहत्याजौ क्षत्रं ब्रह्मपुरःसरः ब्रह्मक्षत्रे विहिते ब्रह्मतेजो विशिष्यते
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ब्राह्मम् | उच्चारय् + तेजस् | हु + आहुति | इव + अनल
समेत्य | स | दह् + आजि | क्षत्रं | ब्रह्मन् + पुरःसर
ब्रह्मन् + क्षत्र | च | विहिते | ब्रह्मन् + तेजस् | विशिष्यते
सोऽहं क्षत्रबलाद्धीनो ब्रह्मतेजः प्रपेदिवान् द्रोणाद्विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम्
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सो | ऽहं | क्षत्र + बल + हा | ब्रह्मन् + तेजस् | प्रपेदिवान्
द्रोणाद् | विशिष्टम् | आसाद्य | भवन्तं | ब्रह्मन् + वित्तम
द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् तत्कर्म कुरु मे याज निर्वपाम्यर्बुदं गवाम्
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द्रोण + अन्तक | अहं | पुत्रं | लभेयं | युधि | दुर्जयम्
तत् | कर्म | कुरु | मे | याज | निर्वप् + अर्बुद | गवाम्
तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत् गुर्वर्थ इति चाकाममुपयाजमचोदयत् याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा सः
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तथा + इति + वच् | तु | तं | याजो | याज्य + अर्थ | उपकल्पयत्
गुरु + अर्थ | इति | च + अकाम | उपयाजम् | अचोदयत्
याजो | द्रोण + विनाश | प्रतिजज्ञे | तथा | च | सः
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै
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ततो | महेन्द्रम् | आसाद्य | भारद्वाजो | महत् + तपस्
आचख्यौ | कर्म | वैतानं | तदा | पुत्र + फल | वै
पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः इष्यते यद्विधो राजन्भविता ते तथाविधः
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स | च | पुत्रो | महत् + वीर्य | महत् + तेजस् | महत् + बल
इष्यते | यद्विधो | राजन् | भविता | ते | तथाविधः
भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसंधाय भूमिपः आजह्रे तत्तथा सर्वं द्रुपदः कर्मसिद्धये
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भारद्वाजस्य | हन्तारं | सो | ऽभिसंधाय | भूमिपः
आजह्रे | तत् | तथा | सर्वं | द्रुपदः | कर्मन् + सिद्धि
याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाह्वापयत्तदा प्रैहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम्
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याज + तु | हवन + अन्त | देवीम् | तदा
प्रैहि | मां | राज्ञि | पृषति | मिथुनं | त्वाम् | उपस्थितम्
अवलिप्तं मे मुखं ब्रह्मन्पुण्यान्गन्धान्बिभर्मि सुतार्थेनोपरुद्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिये
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अवलिप्तं | मे | मुखं | ब्रह्मन् | पुण्यान् | गन्धान् | बिभर्मि | च
सुत + अर्थ + उपरुध् + अस् | तिष्ठ | याज | मम | प्रिये
याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजेन मन्त्रितम् कथं कामं संदध्यात्सा त्वं विप्रैहि तिष्ठ वा
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याजेन | श्रपितं | हव्यम् | उपयाजेन | मन्त्रितम्
कथं | कामं | न | संदध्यात् | सा | त्वं | विप्रैहि | तिष्ठ | वा
एवमुक्ते तु याजेन हुते हविषि संस्कृते उत्तस्थौ पावकात्तस्मात्कुमारो देवसंनिभः
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एवम् | उक्ते | तु | याजेन | हुते | हविषि | संस्कृते
उत्तस्थौ | पावकात् | तस्मात् | कुमारो | देव + संनिभ
ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम् बिभ्रत्सखड्गः सशरो धनुष्मान्विनदन्मुहुः
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ज्वाला + वर्ण | घोर + रूप | किरीटी | वर्म | च + उत्तम
बिभ्रत् | स + खड्ग | स + शर | धनुष्मान् | विनदन् | मुहुः
सोऽध्यारोहद्रथवरं तेन प्रययौ तदा ततः प्रणेदुः पाञ्चालाः प्रहृष्टाः साधु साध्विति
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सो | ऽध्यारोहद् | रथ + वर | तेन | च | प्रययौ | तदा
ततः | प्रणेदुः | पाञ्चालाः | प्रहृष्टाः | साधु | साधु + इति
भयापहो राजपुत्रः पाञ्चालानां यशस्करः राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय वै इत्युवाच महद्भूतमदृश्यं खेचरं तदा
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भय + अपह | राजन् + पुत्र | पाञ्चालानां | यशस्करः
राज्ञः | शोक + अपह | जात | एष | द्रोण + वध | वै
इति + वच् | महद् | भूतम् | अदृश्यं | खेचरं | तदा
कुमारी चापि पाञ्चाली वेदिमध्यात्समुत्थिता सुभगा दर्शनीयाङ्गी वेदिमध्या मनोरमा
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कुमारी | च + अपि | पाञ्चाली | वेदि + मध्य | समुत्थिता
सुभगा | दर्शनीय + अङ्ग | वेदि + मध्य | मनोरमा
श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा मानुषं विग्रहं कृत्वा साक्षादमरवर्णिनी
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चन्द्र + आनन | पद्म + नेत्र | नील + कुञ्चय् + मूर्धज
मानुषं | विग्रहं | कृत्वा | साक्षाद् | अमर + वर्णिन्
नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रवायति या बिभर्ति परं रूपं यस्या नास्त्युपमा भुवि
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नीलोत्पल + सम | गन्धो | यस्याः | क्रोशात् | प्रवायति
या | बिभर्ति | परं | रूपं | यस्या | न + अस् + उपम | भुवि
तां चापि जातां सुश्रोणीं वागुवाचाशरीरिणी सर्वयोषिद्वरा कृष्णा क्षयं क्षत्रं निनीषति
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तां | च + अपि | जातां | सुश्रोणीं | वाग् | वच् + अशरीरिन्
सर्व + योषित् + वर | कृष्णा | क्षयं | क्षत्रं | निनीषति
सुरकार्यमियं काले करिष्यति सुमध्यमा अस्या हेतोः क्षत्रियाणां महदुत्पत्स्यते भयम्
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सुर + कार्य | इयं | काले | करिष्यति | सुमध्यमा
अस्या | हेतोः | क्षत्रियाणां | महद् | उत्पत्स्यते | भयम्
तच्छ्रुत्वा सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसंघवत् चैतान्हर्षसंपूर्णानियं सेहे वसुंधरा
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तद् + श्रु | सर्व + पाञ्चाल | साधु | साधु + इति | च + ब्रू
न | च + एतद् | हर्ष + सम्पृ | इयं | सेहे | वसुंधरा
तौ दृष्ट्वा पृषती याजं प्रपेदे वै सुतार्थिनी वै मदन्यां जननीं जानीयातामिमाविति
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तौ | दृष्ट्वा | पृषती | याजं | प्रपेदे | वै | सुत + अर्थिन्
न | वै | मद् | अन्यां | जननीं | जानीयाताम् | इदम् + इति
तथेत्युवाच तां याजो राज्ञः प्रियचिकीर्षया तयोश्च नामनी चक्रुर्द्विजाः संपूर्णमानसाः
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प्रत्यजानात् | तदा | राजन् | पितुः | प्रिय + चिकीर्षा
तद् + च | नामनी | चक्रुर् | द्विजाः | सम्पृ + मानस
धृष्टत्वादतिधृष्णुत्वाद्धर्माद्द्युत्संभवादपि धृष्टद्युम्नः कुमारोऽयं द्रुपदस्य भवत्विति
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धृष्ट + त्व | अतिधृष्णु + त्व | धर्माद् | द्युत् + सम्भव | अपि
धृष्टद्युम्नः | कुमारो | ऽयं | द्रुपदस्य | भू + इति
कृष्णेत्येवाब्रुवन्कृष्णां कृष्णाभूत्सा हि वर्णतः तथा तन्मिथुनं जज्ञे द्रुपदस्य महामखे
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कृष्णा + इति + एव + ब्रू | कृष्णां | कृष्ण + भू | सा | हि | वर्णतः
अयोनिज + त्व | कृष्णाया | द्रुपदस्य | महत् + मख
धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं विवेशनम् उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान्
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धृष्टद्युम्न + तु | पाञ्चालान् | सिंहनादेन | नादयन्
ततो | द्रुपदम् | आसाद्य | भारद्वाजः | प्रतापवान्
अमोक्षणीयं दैवं हि भावि मत्वा महामतिः तथा तत्कृतवान्द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात्
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अमोक्षणीयं | दैवं | हि | भावि | मत्वा | महामतिः
तथा | तत् | कृतवान् | द्रोण | आत्मन् + कीर्ति + अनुरक्षण