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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.150 (27 verses)
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Chapter 1.150

करिष्य इति भीमेन प्रतिज्ञाते तु भारत आजग्मुस्ते ततः सर्वे भैक्षमादाय पाण्डवाः
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करिष्य | इति | भीमेन | प्रतिज्ञाते | तु | भारत
आगम् + तद् | ततः | सर्वे | भैक्षम् | आदाय | पाण्डवाः
आकारेणैव तं ज्ञात्वा पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः रहः समुपविश्यैकस्ततः पप्रच्छ मातरम्
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उवाच | तं | सत्य + धृति | कुन्ती + पुत्र | युधिष्ठिरः
रहः | समुपविश् + एक + ततस् | पप्रच्छ | मातरम्
किं चिकीर्षत्ययं कर्म भीमो भीमपराक्रमः भवत्यनुमते कच्चिदयं कर्तुमिहेच्छति
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तथा | मन्यु + परी + अङ्ग | भीमो | भीम + पराक्रम
भवती + अनुमत | कच्चिद् | अयं | कर्तुम् | इह + इष्
ममैव वचनादेष करिष्यति परंतपः ब्राह्मणार्थे महत्कृत्यं मोष्काय नगरस्य
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मद् + एव | वचनाद् | एष | करिष्यति | परंतपः
ब्राह्मण + अर्थ | महत् | कृत्यं | मोक्षाय | नगरस्य | च
किमिदं साहसं तीक्ष्णं भवत्या दुष्कृतं कृतम् परित्यागं हि पुत्रस्य प्रशंसन्ति साधवः
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किम् | इदं | साहसं | तीक्ष्णं | भवत्या | दुष्कृतं | कृतम्
परित्यागं | हि | पुत्रस्य | न | प्रशंसन्ति | साधवः
कथं परसुतस्यार्थे स्वसुतं त्यक्तुमिच्छसि लोकवृत्तिविरुद्धं वै पुत्रत्यागात्कृतं त्वया
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कथं | पर + सुत + अर्थ | स्व + सुत | त्यक्तुम् | इच्छसि
लोक + वृत्ति + विरुध् | वै | पुत्र + त्याग | कृतं | त्वया
यस्य बाहू समाश्रित्य सुखं सर्वे स्वपामहे राज्यं चापहृतं क्षुद्रैराजिहीर्षामहे पुनः
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यस्य | बाहू | समाश्रित्य | सुखं | सर्वे | स्वपामहे
राज्यं | च + अपहृ | क्षुद्रैर् | आजिहीर्षामहे | पुनः
यस्य दुर्योधनो वीर्यं चिन्तयन्नमितौजसः शेते वसतीः सर्वा दुःखाच्छकुनिना सह
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यस्य | दुर्योधनो | वीर्यं | चिन्तयन्न् | अमित + ओजस्
न | शेते | वसतीः | सर्वा | दुःख + शकुनि | सह
यस्य वीरस्य वीर्येण मुक्ता जतुगृहाद्वयम् अन्येभ्यश्चैव पापेभ्यो निहतश्च पुरोचनः
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यस्य | वीरस्य | वीर्येण | मुक्ता | जतु + गृह | वयम्
अन्य + च + एव | पापेभ्यो | निहन् + च | पुरोचनः
यस्य वीर्यं समाश्रित्य वसुपूर्णां वसुंधराम् इमां मन्यामहे प्राप्तां निहत्य धृतराष्ट्रजान्
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यस्य | बाहू | समाश्रित्य | सुखं | सर्वे | स्वपामहे
इमां | मन्यामहे | प्राप्तां | निहत्य | धृतराष्ट्र + ज
तस्य व्यवसितस्त्यागो बुद्धिमास्थाय कां त्वया कच्चिन्न दुःखैर्बुद्धिस्ते विप्लुता गतचेतसः
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तस्य | व्यवसा + त्याग | बुद्धिम् | आस्थाय | कां | त्वया
कच्चिन् | न | दुःखैर् | बुद्धि + त्वद् | विप्लुता | गम् + चेतस्
युधिष्ठिर संतापः कार्यः प्रति वृकोदरम् चायं बुद्धिदौर्बल्याद्व्यवसायः कृतो मया
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युधिष्ठिर | न | संतापः | कार्यः | प्रति | वृकोदरम्
न | च + इदम् | बुद्धि + दौर्बल्य | व्यवसायः | कृतो | मया
इह विप्रस्य भवने वयं पुत्र सुखोषिताः तस्य प्रतिक्रिया तात मयेयं प्रसमीक्षिता एतावानेव पुरुषः कृतं यस्मिन्न नश्यति
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इह | विप्रस्य | भवने | वयं | पुत्र | सुख + वस्
तस्य | प्रतिक्रिया | तात | मद् + इदम् | प्रसमीक्षिता
एतावान् | पुरुष + तात | कृतं | यस्मिन् | न | नश्यति
दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तं तदा जतुगृहे महत् हिडिम्बस्य वधाच्चैव विश्वासो मे वृकोदरे
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दृष्ट्वा | भीष्मस्य | विक्रान्तं | तदा | जतु + गृह | महत्
हिडिम्बस्य | वध + च + एव | विश्वासो | मे | वृकोदरे
बाह्वोर्बलं हि भीमस्य नागायुतसमं महत् येन यूयं गजप्रख्या निर्व्यूढा वारणावतात्
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बाह्वोर् | बलं | हि | भीमस्य | नाग + अयुत + सम | महत्
येन | यूयं | गज + प्रख्या | निर्व्यूढा | वारणावतात्
वृकोदरबलो नान्यो भूतो भविष्यति योऽभ्युदीयाद्युधि श्रेष्ठमपि वज्रधरं स्वयम्
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वृकोदर + बल | न + अन्य | न | भूतो | न | भविष्यति
यो | ऽभ्युदीयाद् | युधि | श्रेष्ठम् | अपि | वज्रधरं | स्वयम्
जातमात्रः पुरा चैष ममाङ्कात्पतितो गिरौ शरीरगौरवात्तस्य शिला गात्रैर्विचूर्णिता
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जन् + मात्र | पुरा | च + एतद् | मद् + अङ्क | पतितो | गिरौ
कथं | तु | तेन | पतता | शिला | गात्रैर् | विचूर्णिता
तदहं प्रज्ञया स्मृत्वा बलं भीमस्य पाण्डव प्रतीकारं विप्रस्य ततः कृतवती मतिम्
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तद् | अहं | प्रज्ञया | स्मृत्वा | बलं | भीमस्य | पाण्डव
प्रतीकारं | च | विप्रस्य | ततः | कृतवती | मतिम्
नेदं लोभान्न चाज्ञानान्न मोहाद्विनिश्चितम् बुद्धिपूर्वं तु धर्मस्य व्यवसायः कृतो मया
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न + इदम् | लोभान् | न | च + अज्ञान | न | च | मोहाद् | विनिश्चितम्
न | च + इदम् | बुद्धि + दौर्बल्य | व्यवसायः | कृतो | मया
अर्थौ द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यतः प्रतीकारश्च वासस्य धर्मश्च चरितो महान्
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अर्थौ | द्वि + अपि | निष्पन्नौ | युधिष्ठिर | भविष्यतः
भुक्तं | प्रिय + अवाप् | धर्म + च | चरितो | मया
यो ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुर्यादर्थेषु कर्हिचित् क्षत्रियः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयादिति मे श्रुतम्
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यो | ब्राह्मणस्य | साहाय्यं | कुर्याद् | अर्थेषु | कर्हिचित्
क्षत्रियः | स | शुभ + लोक | प्राप्नुयाद् | इति | मे | श्रुतम्
क्षत्रियः क्षत्रियस्यैव कुर्वाणो वधमोक्षणम् विपुलां कीर्तिमाप्नोति लोकेऽस्मिंश्च परत्र
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क्षत्रियः | क्षत्रिय + एव | कुर्वाणो | वध + मोक्षण
विपुलां | कीर्तिम् | आप्नोति | लोके | इदम् + च | परत्र | च
वैश्यस्यैव तु साहाय्यं कुर्वाणः क्षत्रियो युधि सर्वेष्वपि लोकेषु प्रजा रञ्जयते ध्रुवम्
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वैश्य + एव | तु | साहाय्यं | कुर्वाणः | क्षत्रियो | युधि
स | सर्व + अपि | लोकेषु | प्रजा | रञ्जयते | ध्रुवम्
शूद्रं तु मोक्षयन्राजा शरणार्थिनमागतम् प्राप्नोतीह कुले जन्म सद्रव्ये राजसत्कृते
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शूद्रं | तु | मोक्षयन् | राजा | शरण + अर्थिन् | आगतम्
प्राप् + इह | कुले | जन्म | स + द्रव्य | राजन् + सत्कृ
एवं भगवान्व्यासः पुरा कौरवनन्दन प्रोवाच सुतरां प्राज्ञस्तस्मादेतच्चिकीर्षितम्
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एवं | स | भगवान् | व्यासः | पुरा | कौरव + नन्दन
प्रोवाच | सुतरां | प्राज्ञस् | तस्माद् | एतद् + चिकीर्ष्
उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद्बुद्धिपूर्वकम् आर्तस्य ब्राह्मणस्यैवमनुक्रोशादिदं कृतम् ध्रुवमेष्यति भीमोऽयं निहत्य पुरुषादकम्
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उपपन्नम् | इदं | मातृ + त्वद् | यद् | बुद्धि + पूर्वक
आर्तस्य | ब्राह्मण + एवम् | अनुक्रोशाद् | इदं | कृतम्
ध्रुवम् | एष्यति | भीमो | ऽयं | निहत्य | पुरुषादकम्
यथा त्विदं विन्देयुर्नरा नगरवासिनः तथायं ब्राह्मणो वाच्यः परिग्राह्यश्च यत्नतः
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यथा | तु + इदम् | न | विन्देयुर् | नरा | नगर + वासिन्
तथा + इदम् | ब्राह्मणो | वाच्यः | परिग्रह् + च | यत्नतः