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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.143 (38 verses)
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Chapter 1.143

स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वं वै भ्रातृनिषेवितम्
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स्मरन्ति | वैरं | रक्षांसि | मायाम् | आश्रित्य | मोहिनीम्
हिडिम्बे | व्रज | पन्थानं | त्वं | वै | भ्रातृ + निषेव्
क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः शरीरगुप्त्याभ्यधिकं धर्मं गोपय पाण्डव
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क्रुद्धो | ऽपि | पुरुष + व्याघ्र | भीम | मा | स्म | स्त्रियं | वधीः
शरीर + गुप्ति + अभ्यधिक | धर्मं | गोपय | पाण्डव
वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति
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वध + अभिप्राय | आयान्तम् | वध् + त्वद् | महत् + बल
रक्षस् + तद् | भगिनी | किं | नः | क्रुद्धा | करिष्यति
हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः युधिष्ठिरं कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत्
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हिडिम्बा | तु | ततः | कुन्तीम् | अभिवाद्य | कृताञ्जलिः
युधिष्ठिरं | च | कौन्तेयम् | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
आर्ये जानासि यद्दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे
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आर्ये | जानासि | यद् | दुःखम् | इह | स्त्रीणाम् | अनङ्ग + ज
तद् | इदं | माम् | अनुप्राप्तं | भीमसेन + कृ | शुभे
सोढं तत्परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखाय वै
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सोढं | तत् | परमं | दुःखं | मया | काल + प्रतीक्षा
सो | ऽयम् | अभ्यागतः | कालो | भविता | मे | सुखाय | वै
मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्मं स्वजनं तथा वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे
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मया | हि + उत्सृज् | सुहृदः | स्वधर्मं | स्व + जन | तथा
वृतो | ऽयं | पुरुष + व्याघ्र + त्वद् | पुत्रः | पतिः | शुभे
वरेणापि तथानेन त्वया चापि यशस्विनि तथा ब्रुवन्ती हि तदा प्रत्याख्याता क्रियां प्रति
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वर + अपि | तथा + इदम् | त्वया | च + अपि | यशस्विनि
तथा | ब्रुवन्ती | हि | तदा | प्रत्याख्याता | क्रियां | प्रति
त्वं मां मूढेति वा मत्वा भक्ता वानुगतेति वा भर्त्रानेन महाभागे संयोजय सुतेन ते
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त्वं | मां | मुह् + इति | वा | मत्वा | भक्ता | वा + अनुगम् + इति | वा
भर्तृ + इदम् | महाभागे | संयोजय | सुतेन | ते
तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् पुनश्चैवागमिष्यामि विश्रम्भं कुरु मे शुभे
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तम् | उपादाय | गच्छेयं | यथेष्टं | देव + रूपिन्
पुनर् + च + एव + आगम् | विश्रम्भं | कुरु | मे | शुभे
अहं हि मनसा ध्याता सर्वान्नेष्यामि वः सदा वृजिने तारयिष्यामि दुर्गेषु नरर्षभान्
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अहं | हि | मनसा | ध्याता | सर्वान् | नेष्यामि | वः | सदा
वृजिने | तारयिष्यामि | दुर्गेषु | च | नर + ऋषभ
पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रां गतिमभीप्सतः यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम्
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पृष्ठेन | वो | वहिष्यामि | शीघ्रां | गतिम् | अभीप्सतः
यूयं | प्रसादं | कुरुत | भीमसेनो | भजेत | माम्
आपदस्तरणे प्राणान्धारयेद्येन येन हि सर्वमादृत्य कर्तव्यं तद्धर्ममनुवर्तता
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आपद् + तरण | प्राणान् | धारयेद् | येन | येन | हि
सर्वम् | आदृत्य | कर्तव्यं | तद् | धर्मम् | अनुवर्तता
आपत्सु यो धारयति धर्मं धर्मविदुत्तमः व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते
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आपत्सु | यो | धारयति | धर्मं | धर्म + विद् | उत्तमः
व्यसनं | हि + एव | धर्मस्य | धर्मिणाम् | आपद् | उच्यते
पुण्यं प्राणान्धारयति पुण्यं प्राणदमुच्यते येन येनाचरेद्धर्मं तस्मिन्गर्हा विद्यते
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पुण्यं | प्राणान् | धारयति | पुण्यं | प्राण + द | उच्यते
येन | यद् + आचर् | धर्मं | तस्मिन् | गर्हा | न | विद्यते
एवमेतद्यथात्थ त्वं हिडिम्बे नात्र संशयः स्थातव्यं तु त्वया धर्मे यथा ब्रूयां सुमध्यमे
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एवम् | एतद् | यथा + अह् | त्वं | हिडिम्बे | न + अत्र | संशयः
स्थातव्यं | तु | त्वया | धर्मे | यथा | ब्रूयां | सुमध्यमे
स्नातं कृताह्निकं भद्रे कृतकौतुकमङ्गलम् भीमसेनं भजेथास्त्वं प्रागस्तगमनाद्रवेः
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स्नातं | कृ + आह्निक | भद्रे | कृ + कौतुक + मङ्गल
भीमसेनं | भज् + त्वद् | प्राग् | अस्त + गमन | रवेः
अहःसु विहरानेन यथाकामं मनोजवा अयं त्वानयितव्यस्ते भीमसेनः सदा निशि
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अहःसु | विहृ + इदम् | यथाकामं | मनस् + जव
अयं | त्व् | आनी + त्वद् | भीमसेनः | सदा | निशि
तथेति तत्प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा भीमसेनमुपादाय ऊर्ध्वमाचक्रमे ततः
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स | तथा + इति | प्रतिज्ञाय | निश्चक्राम | महत् + तपस्
भीमसेनम् | उपादाय | ऊर्ध्वम् | आचक्रमे | ततः
शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा
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शैल + शृङ्ग | रम्येषु | देवता + आयतन | च
मृग + पक्षिन् + विघुष् | रमणीयेषु | सर्वदा
कृत्वा परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम्
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कृत्वा | च | परमं | रूपं | सर्व + आभरण + भूषय्
संजल्पन्ती | सुमधुरं | रमयामास | पाण्डवम्
तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमसानुषु सरःसु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु
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तथा + एव | वन + दुर्ग | पुष्पित + द्रुम + सानु
रेमिरे | रमणीयेषु | पर्वतेषु | वनेषु | च
नदीद्वीपप्रदेशेषु वैडूर्यसिकतासु सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु
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नदी + द्वीप + प्रदेश | वैडूर्य + सिकता | च
सुतीर्थ + वन + तोय | तथा | गिरि + नदी | च
सगरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु पत्तनेषु रम्येषु महाशालवनेषु
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सगरस्य | प्रदेशेषु | मणि + हेमन् + चि | च
स | वनेषु | च | रम्येषु | शैल + प्रस्रवण | च
देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु
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देव + अरण्य | पुण्येषु | तथा | पर्वत + सानु
गुह्यकानां | निवासेषु | तापस + आयतन | च
सर्वर्तुफलपुष्पेषु मानसेषु सरःसु बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम्
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सर्व + ऋतु + फल + पुष्प | मानसेषु | सरःसु | च
संजल्पन्ती | सुमधुरं | रमयामास | पाण्डवम्
रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलम्
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रमयन्ती | ततो | भीमं | तत्र | तत्र | मनस् + जव
प्रजज्ञे | राक्षसी | पुत्रं | भीमसेनान् | महत् + बल
विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं विभीषणम् भीमरूपं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम्
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महत् + वृक्ष + गल + स्कन्ध | शङ्कु + कर्ण | विभीषणः
भीम + रूप | सुताम्र + उष्ठ | तीक्ष्ण + दंष्ट्र | महत् + बल
महेष्वासं महावीर्यं महासत्त्वं महाभुजम् महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम्
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महत् + इष्वास | महत् + वीर्य | महासत्त्वं | महत् + भुज
महत् + जव | महत् + काय | महत् + माया | अरिंदमम्
अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम् यः पिशाचानतीवान्यान्बभूवाति मानुषान्
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अमानुषं | मानुष + ज | भीम + वेग | महत् + बल
यः | पिशाचान् | अतीव + अन्य | भू + अति | स | मानुषान्
बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशां पते सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद्बली
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बालो | ऽपि | यौवनं | प्राप्तो | मानुषेषु | विशां | पते
सर्व + अस्त्र | परं | वीरः | प्रकर्षम् | अगमद् | बली
सद्यो हि गर्भं राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिणः
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सद्यो | हि | गर्भं | राक्षस्यो | लभन्ते | प्रसवन्ति | च
काम + रूप + धर + च + एव | भवन्ति | बहु + रूपिन्
प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात्स पितुस्तदा मातुश्च परमेष्वासस्तौ नामास्य चक्रतुः
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प्रणम्य | विकचः | पाद + ग्रह् | स | पितृ + तदा
मातृ + च | परम + इष्वास + तद् | च | नामन् + इदम् | चक्रतुः
घटभासोत्कच इति मातरं सोऽभ्यभाषत अभवत्तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म
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घट + भास + उत्कच | इति | मातरं | सो | ऽभ्यभाषत
अभवत् | तेन | नामन् + इदम् | घटोत्कच | इति | स्म | ह
अनुरक्तश्च तानासीत्पाण्डवान्स घटोत्कचः तेषां दयितो नित्यमात्मभूतो बभूव सः
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अनुरञ्ज् + च | तान् | आसीत् | पाण्डवान् | स | घटोत्कचः
तेषां | च | दयितो | नित्यम् | आत्मन् + भू | बभूव | सः
संवाससमयो जीर्ण इत्यभाषत तं ततः हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत
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संवास + समय | जीर्ण | इति + भाष् | तं | ततः
हिडिम्बा | समयं | कृत्वा | स्वां | गतिं | प्रत्यपद्यत
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितॄनिति घटोत्कचः आमन्त्र्य राक्षसश्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम्
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कृत्य + काल | उपस्थास्ये | पितॄन् | इति | घटोत्कचः
आमन्त्र्य | राक्षस + श्रेष्ठ | प्रतस्थे | च + उत्तर | दिशम्
हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य विनाशाय महात्मनः
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स | हि | सृष्टो | मघवता | शक्ति + हेतु | महात्मना
कर्ण + अप्रतिवीर्य | विनाशाय | महात्मनः