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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.117 (33 verses)
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Chapter 1.117

पाण्डोरवभृथं कृत्वा देवकल्पा महर्षयः ततो मन्त्रमकुर्वन्त ते समेत्य तपस्विनः
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पाण्डोर् | अवभृथं | कृत्वा | देव + कल्प | महत् + ऋषि
ततो | मन्त्रम् | अकुर्वन्त | ते | समेत्य | तपस्विनः
हित्वा राज्यं राष्ट्रं महात्मा महातपाः अस्मिन्स्थाने तपस्तप्तुं तापसाञ्शरणं गतः
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हित्वा | राज्यं | च | राष्ट्रं | च | स | महात्मा | महत् + तपस्
अस्मिन् | स्थाने | तपस् + तप् | तापस + शरण | गतः
जातमात्रान्पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह प्रदायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः
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स | जन् + मात्र | पुत्र + च | दार + च | भवताम् | इह
प्रदा + उपनिधि | राजा | पाण्डुः | स्वर्गम् | इतो | गतः
ते परस्परमामन्त्र्य सर्वभूतहिते रताः पाण्डोः पुत्रान्पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम्
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सर्वे | धर्म + अर्थ + कुशल | सर्वे | भूत + हित | रताः
पाण्डोः | पुत्रान् | पुरस्कृत्य | नगरं | नागसाह्वयम्
उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः भीष्माय पाण्डवान्दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि
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उदार + मनस् | सिद्धा | गमने | चक्रिरे | मनः
भीष्माय | पाण्डवान् | दातुं | धृतराष्ट्राय | च + एव | हि
तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरं चैव तापसाः
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तस्मिन्न् | एव | क्षणे | सर्वे | तान् | आदाय | प्रतस्थिरे
पाण्डोर् | दार + च | पुत्र + च | शरीरं | च + एव | तापसाः
सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत
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सुखिनी | सा | पुरा | भूत्वा | सततं | पुत्र + वत्सल
प्रपन्ना | दीर्घम् | अध्वानं | संक्षिप्तं | तद् | अमन्यत
सा नदीर्घेण कालेन संप्राप्ता कुरुजाङ्गलम् वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी
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सा | न + दीर्घ | कालेन | सम्प्राप्ता | कुरुजाङ्गलम्
वर्धमान + पुर + द्वार | आससाद | यशस्विनी
तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा श्रुत्वा नागपुरे नॄणां विस्मयः समजायत
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तं | चारण + सहस्र | मुनीनाम् | आगमं | तदा
श्रुत्वा | नागपुरे | नॄणां | विस्मयः | समजायत
मुहूर्तोदित आदित्ये सर्वे धर्मपुरस्कृताः सदारास्तापसान्द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः
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मुहूर्त + उदि | आदित्ये | सर्वे | धर्म + पुरस्कृ
स + दार + तापस | द्रष्टुं | निर्ययुः | पुर + वासिन्
स्त्रीसंघाः क्षत्रसंघाश्च यानसंघान्समास्थिताः ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्ब्राह्मणानां योषितः
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स्त्री + संघ | क्षत्र + संघ + च | यान + संघ | समास्थिताः
ब्राह्मणैः | सह | निर्जग्मुर् | ब्राह्मणानां | च | योषितः
तथा विट्शूद्रसंघानां महान्व्यतिकरोऽभवत् कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन्धर्मबुद्धयः
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तथा | विश् + शूद्र + संघ | महान् | व्यतिकरो | ऽभवत्
न | कश्चिद् | अकरोद् | ईर्ष्याम् | अभवन् | धर्म + बुद्धि
तथा भीष्मः शांतनवः सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता विदुरः स्वयम्
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तथा | भीष्मः | शांतनवः | सोमदत्तो | ऽथ | बाह्लिकः
प्रज्ञाचक्षुस् + च | राजर्षिः | क्षत्ता | च | विदुरः | स्वयम्
सा सत्यवती देवी कौसल्या यशस्विनी राजदारैः परिवृता गान्धारी विनिर्ययौ
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ततः | सत्यवतीं | भीष्मः | कौसल्यां | च | यशस्विनीम्
राजन् + दार | परिवृता | गान्धारी | च | विनिर्ययौ
धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमाः भूषिता भूषणैश्चित्रैः शतसंख्या विनिर्ययुः
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धृतराष्ट्रस्य | दायादा | दुर्योधन + पुरोगम
भूषिता | भूषण + चित्र | शत + संख्या | विनिर्ययुः
तान्महर्षिगणान्सर्वाञ्शिरोभिरभिवाद्य उपोपविविशुः सर्वे कौरव्याः सपुरोहिताः
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तान् | महत् + ऋषि + गण | सर्वाञ् | शिरोभिर् | अभिवाद्य | च
उपोपविविशुः | सर्वे | कौरव्याः | स + पुरोहित
तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य उपोपविविशुः सर्वे पौरजानपदा अपि
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तथा + एव | शिरसा | भूमि + अभिवादय् | प्रणम्य | च
उपोपविविशुः | सर्वे | कौरव्याः | स + पुरोहित
तमकूजमिवाज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा भीष्मो राज्यं राष्ट्रं महर्षिभ्यो न्यवेदयत्
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तम् | इव + आज्ञा | जन + ओघ | सर्वशस् + तदा
भीष्मो | राज्यं | च | राष्ट्रं | च | महत् + ऋषि | न्यवेदयत्
तेषामथो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी महर्षिमतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत्
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तेषाम् | अथो | वृद्धतमः | प्रत्युत्थाय | जटाजिनी
महत् + ऋषि + मत | आज्ञाय | महत् + ऋषि | इदम् | अब्रवीत्
यः कौरव्यदायादः पाण्डुर्नाम नराधिपः कामभोगान्परित्यज्य शतशृङ्गमितो गतः
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यः | स | कौरव्य + दायाद | पाण्डुर् | नाम | नर + अधिप
काम + भोग | परित्यज्य | शतशृङ्गम् | इतो | गतः
ब्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना साक्षाद्धर्मादयं पुत्रस्तस्य जातो युधिष्ठिरः
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ब्रह्मचर्य + व्रत + स्थ | तस्य | दिव्येन | हेतुना
साक्षाद् | धर्माद् | अयं | पुत्र + तद् | जातो | युधिष्ठिरः
तथेमं बलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मनः मातरिश्वा ददौ पुत्रं भीमं नाम महाबलम्
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पितुर् | नियोगाद् | भद्रं | ते | दाश + राजन् | महात्मनः
मातरिश्वा | ददौ | पुत्रं | भीमं | नाम | महत् + बल
पुरुहूतादयं जज्ञे कुन्त्यां सत्यपराक्रमः यस्य कीर्तिर्महेष्वासान्सर्वानभिभविष्यति
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पुरुहूताद् | अयं | जज्ञे | कुन्त्यां | सत्य + पराक्रम
यस्य | कीर्तिर् | महत् + इष्वास | सर्वान् | अभिभविष्यति
यौ तु माद्री महेष्वासावसूत कुरुसत्तमौ अश्विभ्यां मनुजव्याघ्राविमौ तावपि तिष्ठतः
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यौ | तु | माद्री | महत् + इष्वास + सू | कुरु + सत्तम
अश्विभ्यां | मनुज + व्याघ्र + इदम् | तद् + अपि | तिष्ठतः
चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना एष पैतामहो वंशः पाण्डुना पुनरुद्धृतः
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शंतनोर् | धर्म + नित्य | कौरव्यस्य | यशस्विनः
प्रणष्टं | भारतं | वंशं | पाण्डुना | पुनर् | उद्धृतम्
पुत्राणां जन्म वृद्धिं वैदिकाध्ययनानि पश्यतः सततं पाण्डोः शश्वत्प्रीतिरवर्धत
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पुत्राणां | जन्म | वृद्धिं | च | वैदिक + अध्ययन | च
पश्यतः | सततं | पाण्डोः | शश्वत् | प्रीतिर् | अवर्धत
वर्तमानः सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप्य पितृलोकं गतः पाण्डुरितः सप्तदशेऽहनि
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वर्तमानः | सतां | वृत्ते | पुत्र + लाभ | अवाप्य | च
पितृ + लोक | गतः | पाण्डुर् | इतः | सप्तदशे | ऽहनि
तं चितागतमाज्ञाय वैश्वानरमुखे हुतम् प्रविष्टा पावकं माद्री हित्वा जीवितमात्मनः
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तं | चिता + आगम् | आज्ञाय | वैश्वानर + मुख | हुतम्
प्रविष्टा | पावकं | माद्री | हित्वा | जीवितम् | आत्मनः
सा गता सह तेनैव पतिलोकमनुव्रता तस्यास्तस्य यत्कार्यं क्रियतां तदनन्तरम्
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सा | गता | सह | तद् + एव | पति + लोक | अनुव्रता
तद् | च | यत् | कार्यं | क्रियतां | तद् + अनन्तर
इमे तयोः शरीरे द्वे सुताश्चेमे तयोर्वराः क्रियाभिरनुगृह्यन्तां सह मात्रा परंतपाः
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इमे | तयोः | शरीरे | द्वे | सुत + च + इदम् | तयोर् | वराः
क्रियाभिर् | अनुगृह्यन्तां | सह | मात्रा | परंतपाः
प्रेतकार्ये निर्वृत्ते पितृमेधं महायशाः लभतां सर्वधर्मज्ञः पाण्डुः कुरुकुलोद्वहः
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प्रेतकार्ये | च | निर्वृत्ते | पितृमेधं | महत् + यशस्
लभतां | सर्व + धर्म + ज्ञ | पाण्डुः | कुरु + कुल + उद्वह
एवमुक्त्वा कुरून्सर्वान्कुरूणामेव पश्यताम् क्षणेनान्तर्हिताः सर्वे चारणा गुह्यकैः सह
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एवम् | उक्त्वा | कुरून् | सर्वान् | कुरूणाम् | एव | पश्यताम्
क्षण + अन्तर्धा | सर्वे | चारणा | गुह्यकैः | सह
गन्धर्वनगराकारं तत्रैवान्तर्हितं पुनः ऋषिसिद्धगणं दृष्ट्वा विस्मयं ते परं ययुः
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गन्धर्वनगर + आकार | तत्र + एव + अन्तर्धा | पुनः
ऋषि + सिद्ध + गण | दृष्ट्वा | विस्मयं | ते | परं | ययुः