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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.116 (31 verses)
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Chapter 1.116

दर्शनीयांस्ततः पुत्रान्पाण्डुः पञ्च महावने तान्पश्यन्पर्वते रेमे स्वबाहुबलपालितान्
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दर्शनीय + ततस् | पुत्रान् | पाण्डुः | पञ्च | महत् + वन
तान् | पश्यन् | पर्वते | रेमे | स्व + बाहु + बल + पालय्
सुपुष्पितवने काले कदाचिन्मधुमाधवे भूतसंमोहने राजा सभार्यो व्यचरद्वनम्
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सु + पुष्पित + वन | काले | कदाचिन् | मधु + माधव
भूत + सम्मोहन | राजा | स + भार्या | व्यचरद् | वनम्
पलाशैस्तिलकैश्चूतैश्चम्पकैः पारिभद्रकैः अन्यैश्च बहुभिर्वृक्षैः फलपुष्पसमृद्धिभिः
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पलाश + तिलक + चूत + चम्पक | पारिभद्रकैः
अन्य + च | बहुभिर् | वृक्षैः | फल + पुष्प + समृद्धि
जलस्थानैश्च विविधैः पद्मिनीभिश्च शोभितम् पाण्डोर्वनं तु संप्रेक्ष्य प्रजज्ञे हृदि मन्मथः
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जलस्थान + च | विविधैः | पद्मिनी + च | शोभितम्
पाण्डोर् | वनं | तु | सम्प्रेक्ष्य | प्रजज्ञे | हृदि | मन्मथः
प्रहृष्टमनसं तत्र विहरन्तं यथामरम् तं माद्र्यनुजगामैका वसनं बिभ्रती शुभम्
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प्रहृष् + मनस् | तत्र | विहरन्तं | यथा + अमर
तं | माद्री + अनुगम् + एक | वसनं | बिभ्रती | शुभम्
समीक्षमाणः तु तां वयःस्थां तनुवाससम् तस्य कामः प्रववृधे गहनेऽग्निरिवोत्थितः
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समीक्षमाणः | स | तु | तां | वयःस्थां | तनु + वासस्
तस्य | कामः | प्रववृधे | गहने | ऽग्निर् | इव + उत्था
रहस्यात्मसमां दृष्ट्वा राजा राजीवलोचनाम् शशाक नियन्तुं तं कामं कामबलात्कृतः
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रहस् + आत्मन् + सम | दृष्ट्वा | राजा | राजीव + लोचन
न | शशाक | नियन्तुं | तं | कामं | काम + बलात्कृत
तत एनां बलाद्राजा निजग्राह रहोगताम् वार्यमाणस्तया देव्या विस्फुरन्त्या यथाबलम्
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तत | एनां | बलाद् | राजा | निजग्राह | रहोगताम्
वारय् + तद् | देव्या | विस्फुरन्त्या | यथाबलम्
तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्वबुध्यत माद्रीं मैथुनधर्मेण गच्छमानो बलादिव
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स | तु | काम + परी + आत्मन् | तं | शापं | न + अनुबुध्
माद्रीं | मैथुन + धर्म | गच्छमानो | बलाद् | इव
जीवितान्ताय कौरव्यो मन्मथस्य वशं गतः शापजं भयमुत्सृज्य जगामैव बलात्प्रियाम्
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जीवितान्ताय | कौरव्यो | मन्मथस्य | वशं | गतः
शाप + ज | भयम् | उत्सृज्य | गम् + एव | बलात् | प्रियाम्
तस्य कामात्मनो बुद्धिः साक्षात्कालेन मोहिता संप्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रनष्टा सह चेतसा
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तस्य | काम + आत्मन् | बुद्धिः | साक्षात् | कालेन | मोहिता
सम्प्रमथ् + इन्द्रिय + ग्राम | प्रनष्टा | सह | चेतसा
तया सह संगम्य भार्यया कुरुनन्दन पाण्डुः परमधर्मात्मा युयुजे कालधर्मणा
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तपस् + तप् | सुत + अर्थ | स + भार्या | कुरु + नन्दन
पाण्डुः | परम + धर्म + आत्मन् | युयुजे | कालधर्मणा
ततो माद्री समालिङ्ग्य राजानं गतचेतसम् मुमोच दुःखजं शब्दं पुनः पुनरतीव
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ततो | माद्री | समालिङ्ग्य | राजानं | गम् + चेतस्
मुमोच | दुःख + ज | शब्दं | पुनः | पुनर् | अतीव | ह
सह पुत्रैस्ततः कुन्ती माद्रीपुत्रौ पाण्डवौ आजग्मुः सहितास्तत्र यत्र राजा तथागतः
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सह | पुत्र + ततस् | कुन्ती | माद्री + पुत्र | च | पाण्डवौ
आजग्मुः | सहित + तत्र | यत्र | राजा | तथागतः
ततो माद्र्यब्रवीद्राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः
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ततो | माद्री + ब्रू | राजन्न् | आर्ता | कुन्तीम् | इदं | वचः
एक + एव | त्वम् | इह + आगम् | स्था + अत्र + एव | दारकाः
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवावार्य दारकान् हताहमिति विक्रुश्य सहसोपजगाम
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तद् + श्रु | वचनं | तद् + तत्र + एव + आवारय् | दारकान्
हन् + मद् | इति | विक्रुश्य | सहस् + उपगम् | ह
दृष्ट्वा पाण्डुं माद्रीं शयानौ धरणीतले कुन्ती शोकपरीताङ्गी विललाप सुदुःखिता
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दृष्ट्वा | पाण्डुं | च | माद्रीं | च | शयानौ | धरणी + तल
कुन्ती | शोक + परी + अङ्ग | विललाप | सु + दुःखित
रक्ष्यमाणो मया नित्यं वीरः सततमात्मवान् कथं त्वमभ्यतिक्रान्तः शापं जानन्वनौकसः
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रक्ष्यमाणो | मया | नित्यं | वीरः | सततम् | आत्मवान्
कथं | त्वम् | अभ्यतिक्रान्तः | शापं | जानन् | वनौकसः
ननु नाम त्वया माद्रि रक्षितव्यो जनाधिपः सा कथं लोभितवती विजने त्वं नराधिपम्
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ननु | नाम | त्वया | माद्रि | रक्षितव्यो | जनाधिपः
सा | कथं | लोभितवती | विजने | त्वं | नर + अधिप
कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् तं विचिन्तयतः शापं प्रहर्षः समजायत
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कथं | दीनस्य | सततं | त्वाम् | आसाद्य | रहोगताम्
अचिन्तयित्वा | तद् + शाप | प्रहर्षः | समजायत
धन्या त्वमसि बाह्लीकि मत्तो भाग्यतरा तथा दृष्टवत्यसि यद्वक्त्रं प्रहृष्टस्य महीपतेः
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धन्या | त्वम् | असि | बाह्लीकि | मत्तो | भाग्यतरा | तथा
दृश् + अस् | यद् | वक्त्रं | प्रहृष्टस्य | महीपतेः
विलोभ्यमानेन मया वार्यमाणेन चासकृत् आत्मा वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा
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विलोभ्यमानेन | मया | वार्यमाणेन | च + असकृत्
आत्मा | न | वारितो | ऽनेन | सत्यं | दिष्टं | चिकीर्षुणा
अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम अवश्यं भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय
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अहं | ज्येष्ठा | धर्मपत्नी | ज्येष्ठं | धर्म + फल | मम
अवश्यं | भाविनो | भावान् | मा | मां | माद्रि | निवर्तय
अन्वेष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान्रक्षस्व दारकान्
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अन्वि + इह | भर्तारम् | अहं | प्रेत + वश | गतम्
उत्तिष्ठ | त्वं | विसृज् + एनद् | इमान् | रक्षस्व | दारकान्
अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् हि तृप्तास्मि कामानां तज्ज्येष्ठा अनुमन्यताम्
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अहम् | एव + अनुया | भर्तारम् | अपलायिनम्
न | हि | तृप् + अस् | कामानां | तद् + ज्येष्ठ | अनुमन्यताम्
मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद्भरतसत्तमः तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने
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मां | च + अभिगम् | क्षीणो | ऽयं | कामाद् | भरत + सत्तम
तम् | उच्छिन्द्याम् | अस्य | कामं | कथं | नु | यम + सादन
चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेषं सुतेषु ते वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा हि माम्
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न | च + अपि + मद् | वर्तयन्ती | निर्विशेषं | सुतेषु | ते
वृत्तिम् | आर्ये | चरिष्यामि | स्पृशेद् | एनस् + तथा | हि | माम्
तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् मां हि कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः
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तस्मान् | मे | सुतयोः | कुन्ति | वर्तितव्यं | स्व + पुत्र + वत्
मां | हि | कामयमानो | ऽयं | राजा | प्रेत + वश | गतः
राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु
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राज्ञः | शरीरेण | सह | मद् + अपि + इदम् | कलेवरम्
दग्धव्यं | सुप्रतिच्छन्नम् | एतद् | आर्ये | प्रियं | कुरु
दारकेष्वप्रमत्ता भवेथाश्च हिता मम अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन
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दारक + अप्रमत्त | च | भू + च | हिता | मम
अतो | ऽन्यन् | न | प्रपश्यामि | संदेष्टव्यं | हि | किंचन
इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् मद्रराजात्मजा तूर्णमन्वारोहद्यशस्विनी
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इति + वच् | तं | चिता + अग्नि + स्थ | धर्मपत्नी | नर + ऋषभ
मद्र + राजन् + आत्मजा | तूर्णम् | अन्वारोहद् | यशस्विनी