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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.112 (34 verses)
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Chapter 1.112

एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम्
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एवम् | उक्ता | महत् + राज | कुन्ती | पाण्डुम् | अभाषत
कुरूणाम् | ऋषभं | वीरं | तदा | भूमिपतिं | पतिम्
मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचन
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न | माम् | अर्हसि | धर्म + ज्ञ | त्यक्तुं | भक्ताम् | अनागसम्
धर्म + पत्नी | अभिरतां | त्वयि | राजीव + लोचन
त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि
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सत्यम् | एतन् | महत् + बाहु | यथा | वदसि | भारत
वीर | वीर्य + उपपद् | धर्मतो | जनयिष्यसि
स्वर्गं मनुजशार्दूल गच्छेयं सहिता त्वया अपत्याय मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन
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स्वर्गं | मनुज + शार्दूल | गच्छेयं | सहिता | त्वया
अपत्याय | च | मां | गच्छ | त्वम् | एव | कुरु + नन्दन
ह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् त्वत्तः प्रतिविशिष्टश्च कोऽन्योऽस्ति भुवि मानवः
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न | हि + मद् | मनस् + अपि + अन्य | गच्छेयं | त्वद् | ऋते | नरम्
त्वत्तः | प्रतिविशिष् + च | को | ऽन्यो | ऽस्ति | भुवि | मानवः
इमां तावद्धर्म्यां त्वं पौराणीं शृणु मे कथाम् परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम्
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इमां | च | तावद् | धर्म्यां | त्वं | पौराणीं | शृणु | मे | कथाम्
परिश्रुतां | विशाल + अक्ष | कीर्तयिष्यामि | याम् | अहम्
व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोर्वंशविवर्धनः
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व्युषिताश्व | इति | ख्यातो | बभूव | किल | पार्थिवः
पुरा | परम + धर्मिष्ठ | पूरोर् | वंश + विवर्धन
तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महात्मनि उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्राः सह महर्षिभिः
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तद् + च | यजमाने | वै | धर्म + आत्मन् | महात्मनि
उपगम् + ततस् | देवाः | स + इन्द्र | सह | महत् + ऋषि
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः
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अमाद्यद् | इन्द्रः | सोमेन | दक्षिणाभिर् | द्विजातयः
व्युषिताश्वस्य | राजर्षि + ततस् | यज्ञे | महात्मनः
व्युषिताश्वस्ततो राजन्नति मर्त्यान्व्यरोचत सर्वभूतान्यति यथा तपनः शिशिरात्यये
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व्युषिताश्व + ततस् | राजन्न् | अति | मर्त्यान् | व्यरोचत
सर्व + भूत + अति | यथा | तपनः | शिशिर + अत्यय
विजित्य गृहीत्वा नृपतीन्राजसत्तमः प्राच्यानुदीच्यान्मध्यांश्च दक्षिणात्यानकालयत्
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स | विजित्य | गृहीत्वा | च | नृपतीन् | राजन् + सत्तम
प्राच्यान् | उदीच्यान् | मध्य + च | दक्षिणात्यान् | अकालयत्
अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान् बभूव हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वितः
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अश्वमेधे | महत् + यज्ञ | स्वयम्भु + विधा | पुरा
बभूव | स | हि | राजन् + इन्द्र | दशन् + नाग + बल + अन्वित
अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जनाः व्युषिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम् अपालयत्सर्ववर्णान्पिता पुत्रानिवौरसान्
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अपि + अत्र | गाथां | गायन्ति | ये | पुराण + विद् | जनाः
व्युषिताश्वः | समुद्रान्तां | विजि + इदम् | वसुंधराम्
अपालयत् | सर्व + वर्ण | पिता | पुत्रान् | इव + औरस
यजमानो महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो ददौ धनम् अनन्तरत्नान्यादाय आजहार महाक्रतून् सुषाव बहून्सोमान्सोमसंस्थास्ततान
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यजमानो | महत् + यज्ञ | ब्राह्मणेभ्यो | ददौ | धनम्
अनन्त + रत्न + आदा | आजहार | महत् + क्रतु
सुषाव | च | बहून् | सोमान् | सोम + संस्था + तन् | च
आसीत्काक्षीवती चास्य भार्या परमसंमता भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि
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ममता | नाम | तद् + अस् | भार्या | परम + सम्मन्
तस्य | कन्या | पृथा | नाम | रूप + असदृश | भुवि
कामयामासतुस्तौ तु परस्परमिति श्रुतिः तस्यां कामसंमत्तो यक्ष्माणं समपद्यत
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कामयामासतुस् | तौ | तु | परस्परम् | इति | श्रुतिः
विचित्रवीर्य + तरुण | यक्ष्माणं | समपद्यत
तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् तस्मिन्प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्यास्य भृशदुःखिता
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तद् + अचिर | कालेन | गम् + अस्त | इव + अंशुमन्त्
तस्मिन् | प्रेते | मनुष्य + इन्द्र | भार्या + इदम् | भृश + दुःखित
अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम् भद्रा परमदुःखार्ता तन्निबोध नराधिप
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अपुत्रा | पुरुष + व्याघ्र | विलप् + इति | नः | श्रुतम्
भद्रा | परम + दुःख + आर्त | तन् | निबोध | नर + अधिप
नारी परमधर्मज्ञ सर्वा पुत्रविनाकृता पतिं विना जीवति या सा जीवति दुःखिता
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नारी | परम + धर्म + ज्ञ | सर्वा | पुत्र + विनाकृत
पतिं | विना | जीवति | या | न | सा | जीवति | दुःखिता
पतिं विना मृतं श्रेयो नार्याः क्षत्रियपुंगव त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम्
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पतिं | विना | मृतं | श्रेयो | नार्याः | क्षत्रिय + पुंगव
त्वद् + गति | गन्तुम् | इच्छामि | प्रसीदस्व | नयस्व | माम्
त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नयस्व माम्
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त्वया | हीना | क्षणम् | अपि | न + मद् | जीवितुम् | उत्सहे
प्रसादं | कुरु | मे | ब्रह्मञ् | जरा + इदम् | मा | विशेत | माम्
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि समेषु विषमेषु त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तिनम्
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पृष्ठतो | ऽनुगमिष्यामि | समेषु | विषमेषु | च
त्वाम् | अहं | नर + शार्दूल | गच्छन्तम् | अनिवर्तिनम्
छायेवानपगा राजन्सततं वशवर्तिनी भविष्यामि नरव्याघ्र नित्यं प्रियहिते रता
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छाया + इव + अनपग | राजन् | सततं | वश + वर्तिन्
भविष्यामि | नर + व्याघ्र | नित्यं | प्रिय + हित | रता
अद्य प्रभृति मां राजन्कष्टा हृदयशोषणाः आधयोऽभिभविष्यन्ति त्वदृते पुष्करेक्षण
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अद्य | प्रभृति | मां | राजन् | कष्टा | हृदय + शोषण
आधयो | ऽभिभविष्यन्ति | त्वद् | ऋते | पुष्कर + ईक्षण
अभाग्यया मया नूनं वियुक्ताः सहचारिणः संयोगा विप्रयुक्ता वा पूर्वदेहेषु पार्थिव
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अभाग्यया | मया | नूनं | वियुक्ताः | सहचारिणः
संयोगा | विप्रयुक्ता | वा | पूर्व + देह | पार्थिव
तदिदं कर्मभिः पापैः पूर्वदेहेषु संचितम् दुःखं मामनुसंप्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम्
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तद् | इदं | कर्मभिः | पापैः | पूर्व + देह | संचितम्
दुःखं | माम् | अनुसंप्राप्तं | राजन् + त्वद् + विप्रयोग + ज
अद्य प्रभृत्यहं राजन्कुशप्रस्तरशायिनी भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वद्दर्शनपरायणा
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अद्य | प्रभृति + मद् | राजन् | कुश + प्रस्तर + शायिन्
भू + असुख + आविश् | त्वद् + दर्शन + परायण
दर्शयस्व नरव्याघ्र साधु मामसुखान्विताम् दीनामनाथां कृपणां विलपन्तीं नरेश्वर
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दर्शयस्व | नर + व्याघ्र | साधु | माम् | असुख + अन्वित
दीनाम् | अनाथां | कृपणां | विलपन्तीं | नरेश्वर
एवं बहुविधं तस्यां विलपन्त्यां पुनः पुनः तं शवं संपरिष्वज्य वाक्किलान्तर्हिताब्रवीत्
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अथ + अपर | महत् + इष्वास | सत्यवत्यां | पुनः | प्रभुः
तं | शवं | सम्परिष्वज्य | वाक् | किल + अन्तर्धा + ब्रू
उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि
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उत्तिष्ठ | भद्रे | गच्छ | त्वं | दा + इह | वरं | तव
जनय् + अपत्य | त्वद् + मद् | चारु + हासिन्
आत्मीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम् अष्टमीं वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह
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आत्मीये | च | वरारोहे | शयनीये | चतुर्दशीम्
अष्टमीं | वा | ऋतु + स्ना | संविशेथा | मया | सह
एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा
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एवम् | उक्ता | तु | सा | देवी | तथा | चक्रे | पतिव्रता
यथोक्तम् | एव | तद् | वाक्यं | भद्रा | पुत्र + अर्थिन् | तदा
सा तेन सुषुवे देवी शवेन मनुजाधिप त्रीञ्शाल्वांश्चतुरो मद्रान्सुतान्भरतसत्तम
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सा | तेन | सुषुवे | देवी | शवेन | मनुज + अधिप
त्रीञ् | शाल्व + चतुर् | मद्रान् | सुतान् | भरत + सत्तम
तथा त्वमपि मय्येव मनसा भरतर्षभ शक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगबलान्वयात्
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तथा | त्वम् | अपि | मद् + एव | मनसा | भरत + ऋषभ
शक्तो | जनयितुं | पुत्र + तपस् + योग + बल + अन्वय