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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.103 (17 verses)
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Chapter 1.103

गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् अत्यन्यान्पृथिवीपालान्पृथिव्यामधिराज्यभाक्
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गुणैः | समुदितं | सम्यग् | इदं | नः | प्रथितं | कुलम्
अति + अन्य | पृथिवी + पाल | पृथिव्याम् | अधिराज्य + भाज्
रक्षितं राजभिः पूर्वैर्धर्मविद्भिर्महात्मभिः नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम्
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रक्षितं | राजभिः | पूर्वैर् | धर्म + विद् | महात्मभिः
न + उत्साद | गम् + च + इदम् | कदाचिद् | इह | नः | कुलम्
मया सत्यवत्या कृष्णेन महात्मना समवस्थापितं भूयो युष्मासु कुलतन्तुषु
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मया | च | सत्यवत्या | च | कृष्णेन | च | महात्मना
समवस्थापितं | भूयो | युष्मासु | कुल + तन्तु
वर्धते तदिदं पुत्र कुलं सागरवद्यथा तथा मया विधातव्यं त्वया चैव विशेषतः
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वर्धते | तद् | इदं | पुत्र | कुलं | सागर + वत् | यथा
तथा | मया | विधातव्यं | त्वया | च + एव | विशेषतः
श्रूयते यादवी कन्या अनुरूपा कुलस्य नः सुबलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य
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श्रूयते | यादवी | कन्या | अनुरूपा | कुलस्य | नः
सुबल + आत्मजा | च + एव | तथा | मद्र + ईश्वर | च
कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च सर्वशः उचिताश्चैव संबन्धे तेऽस्माकं क्षत्रियर्षभाः
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कुलीना | रूपवत् + च | नाथवत् + च | सर्वशः
उचित + च + एव | संबन्धे | ते | ऽस्माकं | क्षत्रिय + ऋषभ
मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर संतानार्थं कुलस्यास्य यद्वा विदुर मन्यसे
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मन्ये | वरय् + तद् | इति + मद् | धीमतां | वर
संतान + अर्थ | कुल + इदम् | यद् | वा | विदुर | मन्यसे
भवान्पिता भवान्माता भवान्नः परमो गुरुः तस्मात्स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम्
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भवान् | पिता | भवान् | माता | भवान् | नः | परमो | गुरुः
तस्मात् | स्वयं | कुल + इदम् | विचार्य | कुरु | यद् + हित
अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारीं सुबलात्मजाम् आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा
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अथ | शुश्राव | विप्रेभ्यो | यादवस्य | महीपतेः
आराध्य | वर + द | देवं | भग + नेत्र + हर | हरम्
गान्धारी | किल | पुत्राणां | शतं | लेभे | वरं | शुभा
इति श्रुत्वा तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत
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इति | श्रुत्वा | च | तत्त्वेन | भीष्मः | कुरु + पितामह
ततो | गान्धार + राज | प्रेषयामास | भारत
अचक्षुरिति तत्रासीत्सुबलस्य विचारणा कुलं ख्यातिं वृत्तं बुद्ध्या तु प्रसमीक्ष्य सः ददौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारीं धर्मचारिणीम्
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इति | तत्र + अस् | सुबलस्य | विचारणा
कुलं | ख्यातिं | च | वृत्तं | च | बुद्ध्या | तु | प्रसमीक्ष्य | सः
ददौ | तां | धृतराष्ट्राय | गान्धारीं | धर्म + चारिन्
गान्धारी त्वपि शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा भारत
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गान्धारी | तु + अपि | शुश्राव | धृतराष्ट्रम्
आत्मानं | दित्सितं | च + इदम् | पित्रा | मात्रा | च | भारत
ततः सा पट्टमादाय कृत्वा बहुगुणं शुभा बबन्ध नेत्रे स्वे राजन्पतिव्रतपरायणा नात्यश्नीयां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चया
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ततः | सा | पट्टम् | आदाय | कृत्वा | बहु + गुण | शुभा
बबन्ध | नेत्रे | स्वे | राजन् | पति + व्रत + परायण
न + अत्यश् | पतिम् | अहम् | इति + एवम् | कृ + निश्चय
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् स्वसारं परया लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान्
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ततो | गान्धार + राज | प्रेषयामास | भारत
स्वसारं | परया | लक्ष्म्या | युक्ताम् | आदाय | कौरवान्
दत्त्वा भगिनीं वीरो यथार्हं परिच्छदम् पुनरायात्स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः
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दत्त्वा | स | भगिनीं | वीरो | यथार्हं | च | परिच्छदम्
पुनर् | आयात् | स्व + नगर | भीष्मेण | प्रतिपूजितः
गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत
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गान्धारी + अपि | वरारोहा | शील + आचार + विचेष्टित
तुष्टिं | कुरूणां | सर्वेषां | जनयामास | भारत
वृत्तेनाराध्य तान्सर्वान्पतिव्रतपरायणा वाचापि पुरुषानन्यान्सुव्रता नान्वकीर्तयत्
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वृत्त + आराधय् | तान् | सर्वान् | पति + व्रत + परायण
वाच् + अपि | पुरुषान् | अन्यान् | सुव्रता | न + अनुकीर्तय्