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Currently viewing: Parva 1 - Chapter 1.100 (30 verses)
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Chapter 1.100

ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा संवेशयन्ती शयने शनकैर्वाक्यमब्रवीत्
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ततः | सत्यवती | काले | वधूं | स्नाताम् | ऋतौ | तदा
संवेशयन्ती | शयने | शनकैर् | वाक्यम् | अब्रवीत्
कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे आगमिष्यति
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कौसल्ये | देवर + त्वद् | ऽस्ति | सो | ऽद्य | त्वद् + अनुप्रविश्
अप्रमत्ता | प्रतीक्ष् + एनद् | निशीथे | आगमिष्यति
श्वश्र्वास्तद्वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे साचिन्तयत्तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुंगवान्
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श्वश्रू + तद् | वचनं | श्रुत्वा | शयाना | शयने | शुभे
तद् + चिन्तय् | तदा | भीष्मम् | अन्य + च | कुरु + पुंगव
ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृषिः दीप्यमानेषु दीपेषु शयनं प्रविवेश
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ततो | ऽम्बिकायां | प्रथमं | नियुक्तः | सत्य + वाच् | ऋषिः
दीप्यमानेषु | दीपेषु | शयनं | प्रविवेश | ह
तस्य कृष्णस्य कपिला जटा दीप्ते लोचने बभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत्
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तस्य | कृष्णस्य | कपिला | जटा | दीप्ते | च | लोचने
बभ्रूणि | च + एव | श्मश्रूणि | दृष्ट्वा | देवी | न्यमीलयत्
संबभूव तया रात्रौ मातुः प्रियचिकीर्षया भयात्काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षितुम्
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प्रत्यजानात् | तदा | राजन् | पितुः | प्रिय + चिकीर्षा
भयात् | काशि + सुता | तं | तु | न + शक् | अभिवीक्षितुम्
ततो निष्क्रान्तमासाद्य माता पुत्रमथाब्रवीत् अप्यस्यां गुणवान्पुत्र राजपुत्रो भविष्यति
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ततो | निष्क्रान्तम् | आसाद्य | माता | पुत्रम् | अथ + ब्रू
इदम् + तु | दिवसे | पुत्रो | युवराजो | भविष्यति
निशम्य तद्वचो मातुर्व्यासः परमबुद्धिमान् प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना संप्रचोदितः
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निशम्य | तद् | वचो | मातुर् | व्यासः | परम + बुद्धिमत्
प्रवच् + अतीन्द्रिय + ज्ञान | विधिना | सम्प्रचोदितः
नागायुतसमप्राणो विद्वान्राजर्षिसत्तमः महाभागो महावीर्यो महाबुद्धिर्भविष्यति
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नाग + अयुत + सम + प्राण | विद्वान् | राजन् + ऋषि + सत्तम
महाभागो | महत् + वीर्य | महत् + बुद्धि | भविष्यति
तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महाबलाः किं तु मातुः वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति
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तस्य | च + अपि | शतं | पुत्रा | भवितारो | न | संशयः
किं | तु | मातुः | स | वैगुण्याद् | अन्ध | एव | भविष्यति
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाब्रवीत् नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन
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तद् | वचनं | श्रुत्वा | स्वर्गाद् | भ्रंश् + इति | च + ब्रू
न + अन्ध | कुरूणां | नृपतिर् | अनुरूप + तपोधन
ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि
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अस्य | वंशस्य | गोप्तारं | सतां | शोक + विनाशन
द्वितीयं | कुरु + वंश | राजानं | दातुम् | अर्हसि
तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महातपाः सापि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम्
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स | तथा + इति | प्रतिज्ञाय | निश्चक्राम | महत् + तपस्
तद् + अपि | कालेन | कौसल्या | सुषुवे | ऽन्धं | तम् | आत्मजम्
पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः ऋषिमावाहयत्सत्या यथापूर्वमनिन्दिता
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पुनर् | एव | तु | सा | देवी | परिभाष्य | स्नुषां | ततः
ऋषिम् | आवाहयत् | सत्या | यथापूर्वम् | अनिन्दिता
ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत अम्बालिकामथाभ्यागादृषिं दृष्ट्वा सापि तम् विषण्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत
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ततस् + तद् + एव | विधिना | महत् + ऋषि + तद् | अपद्यत
अम्बालिकाम् | अथ + अभ्यागा | ऋषिं | दृष्ट्वा | च | तद् + अपि | तम्
विषण्णा | पाण्डु + संकाश | समपद्यत | भारत
तां भीतां पाण्डुसंकाशां विषण्णां प्रेक्ष्य पार्थिव व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत्
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तां | भीतां | पाण्डु + संकाश | विषण्णां | प्रेक्ष्य | पार्थिव
शर्मिष्ठायाः | सुतं | द्रुह्युम् | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
यस्मात्पाण्डुत्वमापन्ना विरूपं प्रेक्ष्य मामपि तस्मादेष सुतस्तुभ्यं पाण्डुरेव भविष्यति
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यस्मात् | पाण्डु + त्व | आपन्ना | विरूपं | प्रेक्ष्य | माम् | अपि
तस्माद् | एष | सुत + त्वद् | पाण्डुर् | एव | भविष्यति
नाम चास्य तदेवेह भविष्यति शुभानने इत्युक्त्वा निराक्रामद्भगवानृषिसत्तमः
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नाम | च + इदम् | तद् | एव + इह | भविष्यति | शुभ + आनन
इति + वच् | स | निराक्रामद् | भगवान् | ऋषि + सत्तम
ततो निष्क्रान्तमालोक्य सत्या पुत्रमभाषत शशंस पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पाण्डुताम्
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ततो | निष्क्रान्तम् | आसाद्य | माता | पुत्रम् | अथ + ब्रू
शशंस | स | पुनर् | मात्रे | तस्य | बालस्य | पाण्डु + ता
तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत तथेति महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत
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तं | माता | पुनर् | एव + अन्य | एकं | पुत्रम् | अयाचत
तथा + इति | च | महत् + ऋषि + तद् | मातरं | प्रत्यभाषत
ततः कुमारं सा देवी प्राप्तकालमजीजनत् पाण्डुं लक्षणसंपन्नं दीप्यमानमिव श्रिया तस्य पुत्रा महेष्वासा जज्ञिरे पञ्च पाण्डवाः
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ततः | कुमारं | सा | देवी | प्राप् + काल | अजीजनत्
पाण्डुं | लक्षण + सम्पद् | दीप्यमानम् | इव | श्रिया
तस्य | पुत्रा | महत् + इष्वास | जज्ञिरे | पञ्च | पाण्डवाः
ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजयत् सा तु रूपं गन्धं महर्षेः प्रविचिन्त्य तम् नाकरोद्वचनं देव्या भयात्सुरसुतोपमा
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ऋतु + काल | ततो | ज्येष्ठां | वधूं | तस्मै | न्ययोजयत्
सा | तु | रूपं | च | गन्धं | च | महत् + ऋषि | प्रविचिन्त्य | तम्
न + कृ | वचनं | देव्या | भयात् | सुर + सुता + उपम
ततः स्वैर्भूषणैर्दासीं भूषयित्वाप्सरोपमाम् प्रेषयामास कृष्णाय ततः काशिपतेः सुता
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ततः | स्वैर् | भूषणैर् | दासीं | भूषय् + अप्सरस् + उपम
प्रेषयामास | कृष्णाय | ततः | काशि + पति | सुता
दासी ऋषिमनुप्राप्तं प्रत्युद्गम्याभिवाद्य संविवेशाभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार
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तम् | आगतं | प्रयत्नेन | प्रत्युद्गम् + अभिवादय् | च
संविश् + अभ्यनुज्ञा | सत्कृ + उपचर् | ह
कामोपभोगेन तु तस्यां तुष्टिमगादृषिः तया सहोषितो रात्रिं महर्षिः प्रीयमाणया
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काम + उपभोग | तु | स | तस्यां | तुष्टिम् | अगाद् | ऋषिः
तया | सह + वस् | रात्रिं | महत् + ऋषि | प्रीयमाणया
उत्तिष्ठन्नब्रवीदेनामभुजिष्या भविष्यसि अयं ते शुभे गर्भः श्रीमानुदरमागतः धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतां वरः
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उत्तिष्ठन्न् | अब्रवीद् | एनाम् | अभुजिष्या | भविष्यसि
अयं | च | ते | शुभे | गर्भः | श्रीमान् | उदरम् | आगतः
धर्म + आत्मन् | सर्व + लोक | सत्य + वाच् | इति | विश्रुतः
जज्ञे विदुरो नाम कृष्णद्वैपायनात्मजः धृतराष्ट्रस्य भ्राता पाण्डोश्चामितबुद्धिमान्
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स | जज्ञे | विदुरो | नाम | कृष्णद्वैपायन + आत्मज
धृतराष्ट्रस्य | च | भ्राता | पाण्डु + च + अमित + बुद्धिमत्
धर्मो विदुररूपेण शापात्तस्य महात्मनः माण्डव्यस्यार्थतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः
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धर्मो | विदुर + रूप | शापात् | तस्य | महात्मनः
माण्डव्य + अर्थ + तत्त्व + ज्ञ | काम + क्रोध + विवर्जय्
धर्मस्यानृणो भूत्वा पुनर्मात्रा समेत्य तस्यै गर्भं समावेद्य तत्रैवान्तरधीयत
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स | धर्म + अनृण | भूत्वा | पुनर् | मात्रा | समेत्य | च
एतद् | आख्याय | सा | देवी | तत्र + एव + अन्तर्धा
एवं विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रे द्वैपायनादपि जज्ञिरे देवगर्भाभाः कुरुवंशविवर्धनाः
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विचित्रवीर्य + क्षेत्र | यः | समुत्पादयेत् | प्रजाः
जज्ञिरे | देव + गर्भ + आभ | कुरु + वंश + विवर्धन